बिनायक सेन के मनोनयन के बाद देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की जरूरत क्या है?

बिनायक सेन के मनोनयन के बाद देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की जरूरत क्या है?
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार पहली बार केंद्र सरकार के साथ एक टकराव लेकर आमने-सामने खड़ी है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश के दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्रियों के केंद्र से आए दिन के टकराव से अपने-आपको अलग रखते हुए राज्य के हित में दिल्ली से अच्छे संबंध रखते आए थे लेकिन बिनायक सेन के मामले ने उन्हें नाराज कर दिया है। पिछले चार दिनों में अगर देश के चुनावों को लेकर हमें लगातार लिखना नहीं होता तो इस जगह पर हम बिनायक सेन को योजना आयोग की एक कमेटी में लेने के खिलाफ लिख चुके होते, लेकिन चुनावों को लेकर लिखना अधिक जरूरी था।

निचली अदालत से राजद्रोह के एक मामले में उन्हें उम्र कैद हुई है और आज उनका कानूनी दर्जा एक सजा पाए हुए व्यक्ति का है जिसने कि ऊपरी अदालत में इसके खिलाफ अपील की है और जमानत पर जो जेल के बाहर है। इस दर्जे के साथ बिनायक सेन को योजना आयोग की एक ऐसी कमेटी में सलाह देने के लिए रखा गया है जो देश की स्वास्थ्य नीति बनाने का काम करेगी। इसके लिए यह तर्क दिया गया है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके में लंबे समय तक गरीबों का इलाज किया है और उनका यह अनुभव देश की स्वास्थ्य नीति बनाने में काम आएगा। डॉ. बिनायक सेन ने दल्लीराजहरा के इलाके में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के बनाए हुए मजदूरों के अस्पताल में बहुत काम किया था और बाद में रायपुर जिले के गरियाबंद इलाके में भी वे गांव के लोगों का इलाज करने जाते थे। यह काम कितना बड़ा था या कितना महत्वपूर्ण था इसके बारे में उन्हीं के समर्थकों द्वारा जारी जानकारी आज मौजूद है और उसे अगर पूरा सच भी मान लेते हैं तो भी उनका काम एक चिकित्सक की तरह का काम था। हम नहीं जानते कि सवा करोड़ से अधिक आबादी के इस देश में जहां पर कि डेढ़ सौ जिले ऐसे हैं जो कि अति पिछड़े हुए हैं, वहां पर कोई और चिकित्सक गरीबों का इलाज कर रहा है या नहीं, लेकिन इतना अंदाज लगा सकते हैं कि देश भर में कुछ दर्जन तो और भी समर्पित चिकित्सक होंगे जो गरीबों का, गांव के लोगों का इलाज कर रहे होंगे। ऐसे में अदालत से सजा पाए हुए और जेल से जमानत पर छूटे हुए डॉ. बिनायक सेन को योजना आयोग की कमेटी में रखना देश की स्वास्थ्य नीति के लिए कोई ऐसी मजबूरी नहीं दिख रही थी कि एक रॉकेट वैज्ञानिक के बिना देश का रॉकेट अंतरिक्ष में न जा सके। यह बहुत जाहिर तौर पर एक ऐसा फैसला है जिसमें बिनायक सेन के दिल्ली में मौजूद समर्थकों ने योजना आयोग का बेजा इस्तेमाल करते हुए बिनायक को ऊंचा दिखाने और छत्तीसगढ़ सरकार को नीचा दिखाने के लिए उन्हें इस तरह पेश किया है और मनोनीत किया है मानो वे अपने किस्म के देश में अकेले ही व्यक्ति रहे हों।

योजना आयोग के बैनर तले जिन लोगों ने भी यह काम किया है उन्होंने पूरी केंद्र सरकार या योजना आयोग से एक सवाल पूछने का मौका इस देश की जनता को दिया है कि क्या ऊंची अदालत का फैसला आने के पहले ही इस देश की एक छोटी अदालत के फैसले को उसी अंदाज में कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए जिस अंदाज में नक्सली अपनी तथाकथित जनसुनवाई के बाद काटे हुए सिरों को फेंक देते हैं? अगर बिनायक सेन के खिलाफ गए निचली अदालत के फैसले को बिना अगली अदालती कार्रवाई के ही इस देश के बिनायक-समर्थक खारिज कर देना चाहते हैं तो फिर लोकतंत्र की बाकी संस्थाओं के तमाम काम भी उसी तरह खारिज कर देने चाहिए और इस देश को नक्सलियों के हवाले कर देना चाहिए। योजना आयोग का यह आदेश छत्तीसगढ़ सरकार को और छत्तीसगढ़ की जनता को इसलिए नीचा नहीं दिखा सकता कि यह एक अलोकतांत्रिक, अमानवीय और बदनीयती से भरा हुआ आदेश है। इसमें देश की एक सरकारी या संवैधानिक संस्था ने देश की दूसरी संवैधानिक संस्था को अप्रासंगिक साबित करते हुए देश के उन करोड़ों लोगों के जख्मों पर नमक भी छिड़का है जो कि नक्सली हिंसा से घायल हैं और जिन्होंने निचली अदालत से बिनायक सेन को राजद्रोह की सजा पाते देखा है। हम यहां पर इस निचली अदालत के फैसले की खूबी-खामी को आंकने का काम नहीं कर रहे हैं क्योंकि इसके लिए भारतीय लोकतंत्र में एक अदालती सिलसिला बना हुआ है और बिनायक सेन उसका पूरा इस्तेमाल करने का हक रखते हैं, कर रहे हैं। इसलिए उनके साथ हमारी पूरी शुभकामना है कि अगर वे बेकसूर हैं तो अदालत से बाइज्जत बरी होकर बाहर आएं और जिस दिन इस देश में ऐसे लोगों को मुआवजे की गुंजाइश देश के कानून में हो जाए उस दिन वे दूसरे लाखों बेकसूर विचाराधीन कैदियों की तरह छूटने पर मुआवजा भी पाएं। लेकिन तब तक लोकतांत्रिक भारत की मौजूदा न्याय-व्यवस्था का तौर-तरीका और उसकी रफ्तार ही बिनायक सेन को बर्दाश्त करना होगा क्योंकि इस देश की बची सवा करोड़ से अधिक आबादी भी उसी को बर्दाश्त कर रही है। हम इस बहुत खराब, बहुत धीमी, बहुत बेअसर ही सही, लेकिन आज की भारतीय न्याय-व्यवस्था को नक्सलियों की जुबान की जनसुनवाई से बेहतर मानते हैं।

योजना आयोग ने यह एक बहुत ही घटिया काम किया है जिससे लोकतंत्र पर उसकी आस्था की कमी दिखती है। इस आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं और उनके पसंदीदा मोंटेक सिंह अहलूवालिया इसके उपाध्यक्ष हैं। ऐसे में इस देश की एक अदालत के फैसले के लिए इस तरह की हिकारत दिखाकर तो प्रधानमंत्री की अगुवाई वाले इस आयोग ने एक खराब काम किया ही है, देश के नक्सल प्रभावित इलाकों की जनता को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने यह संदेश दिया है कि चाहे कोई नक्सलियों के साथ देशद्रोह का कुसूरवार क्यों न हो, उसके बिना यह देश नहीं चल सकता। इस देश में 2006 के आंकड़ों के मुताबिक 6 लाख 68 हजार 131 डॉक्टर हैं। क्या मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया यह बताएंगे कि इनमें से क्या एक भी ऐसा नहीं है जिसने कि गरीबों के बीच काम किया हो? इसी छत्तीसगढ़ में बिना किसी अपराध में फंसा, बिना सजा पाया हुआ एक ऐसा पद्मश्री डॉक्टर है जिसने पूरी जिंदगी यहीं काम किया है और जिसे इसी मनमोहन सिंह सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। सजायाफ्ता और सम्मानित के बीच का कोई फर्क मनमोहन सिंह सरकार की नजर में नहीं है, अगर पौने सात लाख (और अब तक शायद यह आंकड़ा और बहुत बढ़ चुका होगा) डॉक्टरों में से कोई भी ऐसा नहीं है जिसने गांव में या गरीबों के बीच काम किया हो तो फिर यह इस देश के डॉक्टरों के लिए भी शर्म से डूब मरने की बात है। हम इसे सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जिम्मेदारी की बात मानते हैं और इसका पूरे देश में एक लोकतांत्रिक विरोध होना चाहिए क्योंकि अगर इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे का कोई सम्मान होना ही नहीं है तो फिर इस राज्य के लोग योजना आयोग में क्यों जाएं? आमतौर पर सबसे शांत रहने वाले मुख्यमंत्री ने अगर केंद्र सरकार को यह कड़ा संदेश दिया है तो मनमोहन सिंह इससे बहुत अधिक कड़े जवाब के ही आज हकदार हैं। दिल्ली में कुछ दर्जन नक्सल हिमायती सामाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव में अगर मनमोहन सिंह की सरकार और उनका योजना आयोग इस देश की न्याय-व्यवस्था को इस तरह खारिज कर रहा है तो इसके खिलाफ एक जनहित याचिका पर शायद सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका की भूमिका सरकार को याद दिला सकता है।

चलते-चलते हम यह भी कहना चाहेंगे कि बिनायक सेन अपने-आपको बार-बार लोकतांत्रिक या शायद गांधीवादी भी कहते हैं। इस मनोनयन पर उन्होंने खुशी जाहिर की है, हम यह भी जानना चाहेंगे कि इस देश में न्यायपालिका के दिए हुए फैसले के खारिज हो जाने के पहले तक वे लोकतंत्र और गांधीवाद के पैमाने पर अपने आपको कहां पर पाते हैं? क्या सजा को भुगतते हुए या उससे गुजरते हुए उन्हें ऐसा कोई मनोनयन मंजूर करना चाहिए था?


16 मई 2011

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