लिखना मुनासिब नहीं सिर्फ सोचना ठीक...

24 फरवरी 08


विज्ञान को लेकर भविष्य की कल्पनाएं जितना मुझे रोमांचित करती हैं, शायद औरों को भी उतना ही उत्तेजित करती होंगी, शायद कुछ अधिक। एक ताजा अंदाजा एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ का यह आया है कि अगले इक्कीस बरसों में मशीन मानव आज के इंसान जितना काबिल हो जाएगा। इस विशेषज्ञ का कहना है कि सन् 2029 तक मशीनों का मशीनी हिस्सा और उनके सोचने, समझने, भावनाएं महसूस करने का भीतरी दिल-दिमाग, इंसान के तन-मन के टक्कर के हो जाएंगे। इसी अनुमान के साथ यह भी जुड़ा है कि पिछली पूरी सदी में जितना तकनीकी विकास हुआ है, इस आधी सदी में उससे बत्तीस गुना अधिक प्रगति हो जाएगी। इसी रिपोर्ट में एक अनुमान यह है कि 2030 तक शरीरों में लगाई गई मशीनें इंसानी सेहत और उसकी क्षमता को बढ़ा देेंगे, जिनमें सोचने की, विश्लेषण करने की क्षमता भी रहेगी।
कुछ महीने हुए मैंने ऐसी ही एक वैज्ञानिक भविष्यवाणी पर लिखा था जिसमें 2050 तक इंसान और मशीनों की शादी का अंदाज लगाया गया था। अब ये नई भविष्यवाणी फिर मुझे कुछ सोचने का मौका दे रही है, इसी बीच पश्चिम के एक देश से आई यह खबर तो है ही कि वैज्ञानिकों ने तीन ऐसे एम्ब्रियो तैयार कर लिए हैं जो एक पिता और दो माताओं से लिए गए हिस्सों को मिलाकर बनाए गए हैं और इनमें से अनुवांशिकी (जेनेटिक्स) से आ जाने वाली बीमारियों को हटा दिया गया है। इनसे वे जब चाहें बच्चे बनाना शुरू कर सकते हैं, जो सही मायनों में डिजाइनर बच्चे होंगे।
आज ही दोपहर कॉलेज की एक लड़की की बात हो रही थी जिसका पर्चा इंटरनेट की मेहरबानी से बहुत अच्छा बना था। उसके विषय की अच्छी किताबें हैं ही नहीं और वह इंटरनेट पर जानकारी ढूंढकर बेहतर तैयारी कर पाई थी। यह तो बाहर से मदद करने वाली टेक्नालॉजी हुई, चश्मे की तरह की, जिससे आप अधिक दूर तक, अधिक बारीक, देख सकते हैं। जिन लोगों को ये चश्मे नहीं मिलते और नजरें कमजोर रहती हैं, वे बराबरी नहीं कर पाते। इसी तरह बिजली रहने और न रहने का फर्क पड़ता है।
लेकिन मैं तो उस टेक्नालॉजी और मशीन की बात सोच रहा हूँ जो बदन के भीतर घुसकर इंसान की मदद करेंगी। आज भी आँखों में लगने वाले लेंस, नकली दांत, कान के भीतर सुनाई बढ़ाने के उपकरण, दिल की धड़कन ठीक रखने वाला पेस मेकर, कटे हाथ-पैर की जगह काम करने वाले नकली, लेकिन स्नायुतंत्र से जोड़े जा चुके अंग, नकली दिल, हड्डिïयों के नकली जोड़ तो चलन में हैं ही। आज ही ऐसे इंसुलिन पंप बदन के भीतर लगना आम हो गया है जो डायबिटीज के मरीजों के खून में ग्लूकोज का स्तर खुद बनाए रखते हैं। कुछ और दवाईयां भी शरीर के भीतर ही लग जाती हैं।
लेकिन आगे की कल्पना मैं करता हूँ तो दिमाग से चलने वाला रिमोट कन्ट्रोल, जो फोन करने से लेकर कार को नियंत्रित करने का काम करेगा। आंखों ही आंखें में बहुत भारी भरकम तस्वीरें, आवाज एक दूसरे को उसी तरह देना जिस तरह से आज एक मोबाइल फोन दूसरे को दे देता है। आंखों से देखे गए पन्नों को उसी तरह दिमाग में याद रख लेने की तकनीक जैसे कि कोई फोटो कॉपी मशीन या कम्प्यूटर स्कैनर रख लेते हैं। किसी सुने हुए संगीत, देखी हुई फिल्म को उसी तरह दिमाग की बढ़ाई गई हार्डडिस्क में स्टोर कर लेना, जिस तरह आज कोई ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डर करते हैं। दूर तक देखने वाले लेंस और बहुत बारीक पढ़ लेने वाले लेंस, अंधेरी रात में देख लेने वाले लेंस भी शायद आने वाली आँखें में लग सकें। खिलाडिय़ों की, फौजियों की ताकत बढ़ाने के लिए हो सकता है कि बदन के ऐसे जोड़ लगने लगें जिनसे किसी भी तरह की उछल-कूद, दौड़-भाग, तोड़-मरोड़ हो सके। हो सकता है कि कुछ नए कल-पुर्जों से लोग ऊंची और लंबी छलांग लगा सकें, आज की कार्टून फिल्मों की तरह।
व्यस्त शहरी से लेकर पर्वतरोही या फौजी तक, बहुत से पेशे के लोगों के लिए आज के इन्सुलिन पम्पों की तरह ऐसे भोजन पम्प पन जाएं जो महीने या साल भर तक बदन की सारी जरूरतों को तय किए गए वक्त पर दिन में कई बार छोड़ते रहें। इनसे खाने और निगलने दोनों का काम टाला जा सकेगा और शायद यही लंबी अंतरिक्ष यात्राओं की आज की एक जरूरत भी है। कोई दूसरी मशीन इसी दौरान बदन के पाचनतंत्र को धोखा देकर व्यस्त भी रख सकती है।
आज जिस तरह छुपे हुए माइक्रोफोन या खुफिया कैमरों से लोगों की रिकॉर्डिंग हो जाती है, कल शायद लोग दूसरों के दिल दिमाग की बातों में झांकने की तकनीक से लैस हो जाएं। किसी से निगाहें चार हुईं और दिल को भांप लिया। तब शायद ऐसे चश्मों का चलन होने लगे जो ऐसी ताका-झांकी को रोक सके, और फिर शायद आंखों में ही ऐसे फिल्टर लगने लगें- विजन गार्ड!!
कानों में शायद ऐसे फिल्टर लगने लगें जो गैर जरूरी आवाजों को दिमाग के कहे मुताबिक रोक दें। दिमाग के कहे मुताबिक नाक बदबू को फिल्टर करने रोक दे। दिमाग में शायद ऐसी झूठ पकडऩे वाली माइक्रोचिप्स लग सकें जो बताती चलें कि सामने वाले की बातों में क्या-क्या झूठ है और इससे मुकाबला करने के लिए आवाज में फेरबदल करने वाले चिप्स लगने लगें जिनसे आपका कहा झूठ भी सच लगने लगे।
आवाज को सुरीला या मोटा बनाना शायद आसान हो जाए और आने वाले टीवी-संगीत-मुकाबिलों में मानव, मशीन-मानव और मशीन, ऐसे तीन वर्ग बन जाएं और फिर इनमें आपस का मुकाबला भी हो।
इन कल्पनाओं में से दिल-दिमाग के भीतर काम करने वाली तकनीक शायद देर से विकसित हो, लेकिन बाकी बातें शायद पांच-दस बरस में होने लगें। वियाग्रा जैसी गोलियों की जगह शायद इंसुलिन पम्प की तरह बदन के भीतर ही कोई दूसरा पम्प लग जाए और अमीरी और गरीबी की यौन क्षमताओं में जमीन आसमान का फर्क होने लगे। लेकिन फिर लोगों को शायद मशीन मुक्त होने के प्रमाण-पत्र मिलने लगें, जैसे आज रासायनिक खाद, कीटनाशक से मुक्त ऑर्गेनिक फसल को मिलते हैं या जैसे जेनिटिक-फेरबदल से मुक्त फल, सब्जी, मांस को मिलते हैं, या जैसे शर्बत को रसायन-मुक्त होने के मिलते हैं। खालिस और शुद्घ, मशीन रहित इंसान बिस्तर से लेकर मैदान तक कुछ कम क्षमता वाला रहेगा, लेकिन वह प्राकृतिक रहेगा और छोटे आकार के ऑर्गेनिक फल-सब्जी की तरह उसकी एक अलग कदर होगी।
लोग अपने ही दिमाग में बैठा दी गई हार्डडिस्क से पसंद का संगीत भीतर ही भीतर सुन लेंगे, पसंद की फिल्म भीतर ही भीतर देख लेंगे, जीभ के बिना ही दिमाग में ही रसमलाई का स्वाद ले लेंगे और किसी पुरानी स्पर्श-स्मृति से बार-बार, जब चाहे साथी को छूने का मजा भी ले लेंगे। तो क्या नौ रस, सोलह श्रृंगार, छप्पन भोग अपनी जरूरत, अपना महत्व खोते चलेंगे? क्या लोग पसंद के मुताबिक स्वाद, स्पर्श, ध्वनि, दृश्य को घर बैठे बस सोचकर डाऊनलोड कर लेंगे और हर इस्तेमाल के हिसाब से भुगतान करेंगे?
क्या दुनिया के सबसे खूबसूरत सबसे चर्चित, सबसे सफल लोग अपने यौन संबंधों की, देहसुख की अनुभूतियों की रिकॉर्डिंग बेचने लगेंगे? जिनको खरीदकर लोग वैसे ही साथी के साथ का देह सुख पा सकेंगे? अकेले ही दिमाग के भीतर...। आज जिस तरह वयस्क मनोरंजन, उत्तेजना और देह सुख के लिए फिल्में, खिलौने और नकली देह मिलती हैं, क्या अगले बीस बरसों में यह सब दिमाग के भीतर ही होने का सामान बन जाएगा?
तो फिर बिना किसी दूसरे इंसान के जब इतना कुछ हो सकेगा तो सामाजिक संबंधों का क्या होगा? निजी संबंध और सामाजिक संबंध कितने रह जाएंगे? अमीरी और गरीबी के बीच की खाई कहां पहुंचेगी?
सब कुछ मैं अकेले ही क्यों सोचूं? इस चर्चा की कुछ ऐसी बातों के बारे में अधिक खुलासे से न सोचूं जिनके बारे में लिखना यहां मुनासिब न होगा।
-सुनील कुमार

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