सानिया मिर्जा


सानिया मिर्जा ने अभी एक बात कही जो नक्सली धमाकों से लेकर राष्टï्रपति की अटकलों के बीच में दब गई। सानिया की खबर तो ठीक से छपी, लेकिन उस खबर के भीतर वह महीन सी बात दबनी ही थी। अखबार का पहला पन्ना फलसफों के लिए तो होता नहीं। उसने अपने भावी जीवन साथी के बारे में कहा- वह मुझे वैसे ही प्यार करे जैसी कि मैं हूँ, न कि जो मैं हूँ।
जैसी और जो का यह फर्क दरअसल किसी प्रवचन या व्याख्यान में खुलासे के लायक है, खबर के लायक नहीं। रोजमर्रा की जिंदगी में जगह-जगह इस दुविधा का सामना करना पड़ता है। किसी व्यक्ति के बुनियादी काम पर उसकी छवि हावी होने लगती है और वह भी ऐसी छवि जो कि उसके बुनियादी काम पर टिकी नहीं होती। एक पद्घकार अगर रक्तदान को बढ़ावा देने के काम में लगता है तो लोग उसे बहुत अच्छा पत्रकार मान लेते हैं। जबकि वह एक अच्छा इंसान तो है, अच्छा समाजसेवी भी है लेकिन पत्रकार वह कितना अच्छा है यह तो उसकी पत्रकारिता से पता लगेगा। मैं रक्तदान के पर्चे के नंबरों से किसी को पत्रकारिता के पर्चे में अव्वल करार देने को एक मानवीय गलती मानता हूँ। यह फर्क करना लोगों को आना चाहिए।
कुछ हिचकिचाते हुए भी मैं एक और ऐसी मिसाल सामने रखना चाहूँगा जिसमें एक भ्रष्टï अफसर बड़ा काबिल है और एक ईमानदार अफसर बड़ा निकम्मा। ऐसे में अच्छा अफसर किसे माना जाए? क्योंकि भ्रष्टï अधिकारी कुछ फीसदी खुद कमाने के लिए काम भी करता है, काम करेगा तो ही उसे रिश्वत मिलेगी। दूसरी तरफ ईमानदार निकम्मा इस डर से किसी काम को नहीं छूता कि उस पर कोई आरोप न लग जाए बेईमानी का। ऐसे में जो और जैसा की कसौटी पर कसकर देखें कि आप किसे पसंद करेंगे और तय कर लें तो मुझे भी बताएं।
एक और मामला चुनाव के वक्त आता है जब एक खराब पार्टी से अच्छा प्रत्याशी और अच्छी पार्टी से खराब प्रत्याशी आमने-सामने मैदान में होते हैं। मतदान के सामने एक बड़ा सा सवालिया निशान खड़े हो जाता है कि पार्टी देखे या प्रत्याशी? गुरु गोविंद दोनों खड़े जैसी दुविधा लेकिन राह दिखाने वाले कोई नहीं कि पहले गुरु के पैर छुए या गोविंद के।
दरअसल जो और जैसा का फर्क संभव नहीं है। हम आम खाते हुए उसके सिर्फ स्पर्श को महसूस करें, उसके स्वाद को नहीं, यह नहीं हो सकता। उसका नर्म गीलापन, उसकी खुशबू, इन सबको कैसे अलग किया जा सकता है एक-दूसरे से? गांधी की चर्चा होने पर उनके प्रशंसक जब उनके सेक्स प्रयोगों की चर्चा से कतराते हैं तो मानो महात्मा का एक म कम हो जाता है। चीजों को न एक दूसरे पर हावी होने देना चाहिए, न ही अपने फैसले ऐसी बातों पर टिकाने चाहिए जो प्रासंगिक या अहमियत रखती न हों। लेकिन यह तो मेरी मसीहाई सलाह है जिस पर चलना मेरे लिए भी कभी-कभी (असल में अक्सर) मुश्किल होता हे। ऐसे में सानिया मिर्जा के पहलू में लेटा नौजवान कैसे सिर्फ उसकी नथ देखेगा और उसके रैकेट के वार उसके दिमाग से निकल जाएंगे।
जैसे-जैसे कोई ऊपर जाते जाता है यह मामला और जटिल होते जाता है। जैसे लता मंगेशकर, आशा भोंसले को महज छोटी बहन मान ले? कैसे सितार वादक रविशंकर अन्नपूर्णा को महज बीवी मानकर उसके बाकी हुनर को अनदेखा करे? कैसे अमिताभ और जया के बीच अभिमान खड़ा न हो? जो भी जैसे-जैसे महत्वपूर्ण 'जैसाÓ बनते जाता है, उसके इर्द-गिर्द दीवारों और खाईयों का खतरा बढ़ते जाता है।
कोई युवती अपने से बहुत सुंदर युवती को आस-पास रखकर तब तक बहुत खुश नहीं होता जब तक दोनों का मामला पहले से तय न हो चुका हो और एक-दूसरे से खतरा न बचा हो। जब किसी लड़की का साथी उससे अधिक खूबसूरत लड़की पर से आंखें ही नहीं हटा पाता तो जो और जैसी की बात धरी रह जाती है।
मानवीय स्वभाव है कि खुद को जो जैसा मिल गया उससे मन नहीं भरता। मैं शुरू की बात से कुछ हटकर एक बात पर आ रहा हूँ कि जो जैसी है उसे कोई सारी बातों को अनदेखा भी करके चाह ले तो क्या यह चाहत पूरी जिंदगी रह सकती है? जिंदगी का बाकी सैलाब तो अपने हाथ में होता नहीं? और ऐसे में जब एक 'जोÓ किसी दूसरे 'जोÓ से अलग ऊंचाईयों की दौड़ में लगे रहता है तो फिर बहुत कम हाथ में होता है। यही वजह है कि सितारे मिलते हैं तो काफी मामलों में टूटकर जा गिरते हैं।
जैसे पर हावी जो के चलते मामला आसान नहीं रहता। यह चाहत किसी की जरूर हो सकती है कि कोई उसके सिर्फ एक पहलू को प्यार करे, लेकिन सानिया हो या कोई और कैसे कोई आधेतन या आधे मन को घर छोड़कर जा सकता है? ऐसे ही कोई कैसे किसी की आधी  शख्सियत को चाह सकता है?
सानिया की हसरत बहुत से सफल लोगों की हसरत हो सकती है लेकिन सफलता अपनी कीमत लेकर आती है और हरजाना लेकर जाती है। जिंदगी में सब कुछ एक साथ अक्सर नहीं मिल पाता। मेरी शुभकामनाएं हैं, सानिया के साथ कि उसे उसकी हसरत के मुताबिक छह फीट से अधिक ऊंचा नौजवान मिले जो उसे टेनिस के बल्ले के बिना देख सके, सानिया की फरमाइश से देश के छह फीट से कम के नौजवानों के लिए बुरी खबर है लेकिन सानिया भी ध्यान रखें कि ऊंचा मर्द जब नीची औरत को देखेगा तो नीची नजर से ही देखेगा! शायद यही वजह है कि दुनिया में मर्द औरत को नीची निगाह से देखते हैं। आगे सानिया अपनी मर्जी की मालिक।

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