पत्रकार, पक्षकार और पक्षकार-पत्रकार


चार दिन पहले छत्तीसगढ़ की एकमात्र मराठी पत्रिका ''इये मराठीचिये नगरीÓÓ की ओर से एक व्याख्यान का आयोजन था। इसके न्यौते में लिखा गया था कि नागपुर के वरिष्ठï पत्रकार एवं प्रखर वक्ता श्री माधव गोविंद वैद्य  ''मीडिया का बदलता परिदृश्य और राष्टï्रवादी पत्रकारिताÓÓ  पर वक्तव्य देंगे।
इस निमंत्रण को दूसरी बार पढऩे के पहले तक मैं सोच रहा था कि कार्यक्रम में जाऊं, लेकिन फिर समझ में आया कि यह संघ परिवार का  वक्तव्य रहने जा रहा है। किसी सुपरिचित विचारधारा को सुनने में क्या दिलचस्पी हो सकती है, इसलिए मैंने जाना रद्द कर दिया। वैसे भी किसी कार्यक्रम में जाने-आने और वहां गैर जरूरी रस्मों को झेलने में खासा वक्त लगता है  और हासिल उतना ही आता है जितना एक टेलीविजन समाचार बुलेटिन में काम का निकलता है।
मैंने अगले दिन खबरों में अपने अंदाज को सही पाया कि ये पत्रकार राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। उनकी वरिष्ठïता का एक जिक्र भी उसमें था कि वे संघ की राष्टï्रीय कार्यकारिणी के आमंत्रित सदस्य थे। 
जिस तरह हर विचारधारा को अपने अस्तित्व का हक है, दक्षिणपंथ या वामपंथ को भी यह हक है। इनको अपने समर्पित मुखपत्रों का भी हक है और हर बड़ा राजनीतिक दल या, वैचारिक संगठन, अपने बयान के रूप में पत्र-पत्रिका प्रकाशित भी करते हैं। दिल्ली में दो बरस पहले संघ के अखबार 'ऑर्गनाइजरÓ के प्रधान संपादक से मुझे घंटों बात करने का मौका भी मिला। कुछ और राजनीतिक दलों की पत्रिकाओं के 'पत्रकारÓ भी कभी-कभार मिलते हैं।
इनको मैं 'पत्रकारÓ इसलिए लिख रहा हूं कि जब मैं पत्रकारों की बात करता हूं तो इनको पक्षकार पाता हूं, पत्रकार नहीं। इनको पैरवीकार भी लिखा जा सकता है लेकिन इनको पत्रकार लिखने के पहले मेरा मन कचोटता है।
या तो इनके अखबार इनकी मैगजीन के साथ, इनके कॉलम के साथ इनके संगठन का जिक्र रहे, या फिर यह खुलासा रहे कि ये किसके प्रवक्ता हैं। इसके बिना उनकी बात को किस रौशनी में देखा या समझा जा सकता है?
यूं तो अखबारों की जिस तरह, तरह-तरह की विचारधारा और नीति हो सकती है, उसी तरह यह भी हो सकता है कि कोई नीति न होना भी एक नीति हो। छत्तीसगढ़ में पहले और पिछले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बार-बार कहा था कि इस राज्य की कोई संस्कृति नीति नहीं होगी। वर्तमान सरकार में संस्कृति नीति में मुख्यमंत्री के किसी दखल के बिना संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने एक टैंकर भगवा रंग लेकर सरकार की सारी संस्कृति नीति का भगवाकरण कर दिया। ऐसे ही अखबारों और पत्रकारों की अपनी नीतियां, विचारधाराएं और प्रतिबद्धता हो सकती है। इनके खुलासे से उनके पाठक या दर्शक उनकी बातों को सही संदर्भ में देख सकते हैं।
प्रतिबद्धता के साथ जो लोग पत्रकारिता करते हैं, उन्हें किस तरह कोई पत्रकार कह सकता है इसे लेकर मेरे मन में अकसर एक बड़ी असुविधा खड़ी होती है। यह असुविधा तब और बढ़ती है जब पत्रकार कहे जाने वाले या समझे जाने वाले ऐसे लोग किसी संगठन या सत्ता का सीधा हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि आई सर्जन या न्यूरो सर्जन की तरह एक विशेष तबका ऐसे लोगों के लिए बनना चाहिए जिन्हें प्रतिबद्ध पत्रकार कहा जाए या समर्पित पत्रकार कहा जाए।
ऐसे लोग अपनी सहूलियत से अपने को वामपंथी-पत्रकार, संघी-पत्रकार भी कह सकते हैं। लेकिन महज पत्रकार लिखने से इनका परिचय पूरा नहीं हो पाता। वैसे ही जैसे किसी टैक्सी का चालक ही जब मालक हो तो उसे मालक-चालक कहा जाता है। अखबार में भी संपादक जब मालिक हो या मालिक संपादक हो तो उसे भी मालक-चालक जैसा एक दर्जा अलग से मिलना चाहिए।
एक समय इस देश में जिंदा श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन में इसके सदस्यों के लिए यह शर्त थी सिर्फ पत्रकारिता से होने वाली आय हो। उस परिभाषा के तहत मालक-चालक तबके के लोग उसमें नहीं जा सकते थे। और शायद उस तबके को तब खुशी भी हुई होगी जब इस आंदोलन दम तोड़ दिया।
प्रतिबद्ध-पत्रकारों की बात जिनको समझ न आए उनको आपातकाल के संस्मरण पढऩे चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने उस समय प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात कही थी। जिसका मतलब था कि अदालतें और जज सरकार, मतलब सत्तारूढ़ दल के प्रति प्रतिबद्ध रहें। आज पाकिस्तान में न्यायपालिका का जो हाल है, वही हाल भारत में लोकतंत्र के इस स्तंभ का कांग्रेस पार्टी करना चाहती थी। उस दौर के अखबार उठाकर देखें तो ढेर-ढेर पत्रकार और मालक-चालक शादी में बिन बुलाई बेडि़नियों की तरह नाच रहे थे।
सेंसरशिप का डंडा जहां नहीं भी चल रहा था, वहां भी अखबार खुद होकर प्रतिबद्ध हो गए थे और विनोबा की गटरमाला की तरह रोज एक सौ आठ बार अनुशासन पर्व लिखकर प्रतिबद्धता दिखाते थे।
ऐसी प्रतिबद्धता पर किसी को पत्रकार कैसे माना जा सकता है? राजनीतिक, वैचारिक, आध्यात्मिक या सामाजिक प्रतिबद्धता जिनके लिखने और संपादन पर स्थायी रूप से हावी हो, उन लोगों को अपने-आपको पक्षकार-पत्रकार या एक्टिविस्ट जर्नलिस्ट या प्रतिबद्ध-पत्रकार जैसा एक लेबल लगा लेना चाहिए।
इसमें कोई बुराई इसलिए नहीं है कि बाजार में तिल का तेल भी है और अलसी का भी, बिनौले का भी है और सूरजमुखी का भी। इस तेल की शिनाख्त अगर उजागर हो तो वह ग्राहक के भले की बात रहती है।
अमरीका ने जब इराक पर हमला किया तो उसकी फौज के साथ जो पत्रकार गए उन्हें इम्बेडेड जर्नलिस्ट (जड़े हुए पत्रकार) कहा गया। जैसे अंगूठी में हीरा जड़ा जाता है और फिर वह वहीं बने रहता है, वैसे ही ये पत्रकार स्थायी रूप से अमरीकी सेना के साथ थे। चूंकि उन्हें दूसरी सेना के करीब जाने या रहने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए उन्हें अमरीकी सेना में जड़ा गया पत्रकार कहा गया। इससे उनके देखे और लिखे का खुलासा होता था कि वे किस तरफ थे।
भारत में भी मुझे पक्षकार-पत्रकार नाम का एक लेबल सही जान पड़ता है ताकि लोग पक्षपात करते हुए भी ईमानदार रह सकें। हर किसी को अपनी प्रतिबद्धता साफ रखनी चाहिए। वामपंथी होने में कोई बुराई नहीं है और न ही दक्षिण पंथी होने में। बुराई है अपने आप को वक्त जरूरत के मुताबिक गलत कतार में खड़ा करने में ताकि काउंटर तक कटोरा लिए तेजी से पहुंचें।
मैं यह भी नहीं कहता कि किसी का राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर ही लेबल पाना जरूरी है, कुछ और किस्म के सरोकार और पक्षपात भी दूसरी कतारें गढ़ सकते हैं। अतिवामपंथी संगठनों को देखें तो उनमें छोटे-छोटे गुटों का जन्म किसी के समर्थक, लेकिन किसी के विरोधी होने के आधार पर हो जाता है।
जैसे अमरीका है, अपनी जमीन पर अपने लोगों के बीच पूरी तरह लोकतांत्रिक, लेकिन अपनी सीमा से बाहर विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, हमलावर, तानाशाह। ऐसे ही कई मालिक मिलेंगे जो अपने नौकरों के शोषण पर फल-फूलकर बाहर मजदूर-अधिकारों के हिमायती हो जाएंगे। ऐसे लोगों के लिए भी कुछ लेबल ढूंढे जा सकते हैं।


-सुनील कुमार

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