28 मई 2011
कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को किसने आगे बढ़ाया इसे लेकर भाजपा के नेताओं के बीच सीधे-सीधे तीर चलना शुरू हो गए हैं। चूंकि वहां बेल्लारी से सुषमा स्वराज जाकर चुनाव लड़ी थीं और उसमें उन्हें रेड्डी बंधुओं की मदद मिली थी इसलिए बाद में उनका नाम इन कुख्यात भाईयों से जुड़ गया। कर्नाटक में अवैध खुदाई करके अरबपति से खरबपति बनने की यह कहानी बार-बार चारों तरफ सामने आई है और सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले में दखल देकर जांच करवा कर रहा है। इस बीच ऐसे ताकतवर रेड्डी भाईयों में से जब तीन मंत्रिमंडल में हैं तो यह जाहिर है कि वे मुख्यमंत्री के जैसा चाहे वैसा नीचा दिखा सकते हैं। इसलिए नहीं कि वे मंत्रिमंडल में अधिक गिनती में हैं बल्कि इसलिए कि उनके पास इतनी बड़ी दौलत है कि वे भाजपा के लिए बेकाबू हैं। पाठकों को याद होगा कि पिछले बरस जब कर्नाटक में मौजूदा मुख्यमंत्री के खिलाफ इन भाईयों ने एक अभियान छेड़ा था तो वहां के भाजपा विधायक इतनी बड़ी संख्या में इन भाईयों के मेहमान होकर दूसरे राज्य में जाकर बैठे थे और कर्नाटक में उन विधायकों के इलाके बाढ़ से तबाह पड़े हुए थे। हमने बार-बार राजनीतिक दलों के बारे में यह लिखा है कि पैसे की बढ़ती हुई पकड़ भारतीय राजनीति, लोकतंत्र और पूरे देश को इस कदर अपने खूनी शिकंजे में ले चुकी है कि अरबपति-खरबपति विधायक और सांसद अपनी खुद की पार्टी के भीतर जब चाहे तब ऐसी बगावत खड़ी कर सकते हैं जिससे निपटना पार्टी को भारी पड़े। कर्नाटक में भाजपा की सरकार के भीतर की बगावत किस तरह के समझौतों के साथ बची यह सबके सामने है। इन रेड्डी भाईयों की मनमानी के चलते वहां के मुख्यमंत्री भी उनकी अवैध खुदाई का कुछ नहीं बिगाड़ सके और अब एक किस्म से उन्हें अवैध धंधों की जागीरदारी देकर मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री बने हुए हैं और पार्टी वहां पर अपनी सरकार चलने की तसल्ली रखे हुए है।
इस देश में यह एक भयानक हालत है कि राजनीति पर पैसों की पकड़ बढ़ती चली जा रही है और विधानसभाओं और संसद पर इसी तबके का कब्जा बढ़ते चले गया है। अभी दो-तीन दिन पहले ही हमने इन्हीं बातों का जिक्र इसी जगह किया था लेकिन आज भाजपा के भीतरी कलह को लेकर फिर लगभग इन्हीं बातों पर लिखना पड़ रहा है। मुलायम सिंह के राज में अमर सिंह जैसे दलाल का जो बोलबाला रहा, लालू यादव के राज में उनका कुनबा लाठी लिए बिहार को मवेशी की तरह हांकता रहा, आंध्र में वाईएसआर की राजनीतिक विरासत से परे जिस तरह हजारों करोड़ की एक आर्थिक विरासत की खबरें आती हैं, जिस तरह पंजाब में कुनबों के राज में बड़े-बड़े घपले चल रहे हैं, जिस तरह तमिलनाडू की राजनीति में कुनबों की लूटपाट चेन्नई से लेकर दिल्ली तक जारी है, इन सबको देखकर यह लगता है कि भारतीय राजनीति में कुनबापरस्ती के खिलाफ एक खुला आंदोलन चलना चाहिए ताकि एक पीढ़ी की काली कमाई की ताकत लेकर अगली पीढ़ी पूरी राजनीति और पूरे लोकतंत्र को जेब में रखने की ताकत से अपना पेशा शुरू न करे। भारतीय राजनीति में जिन कुछ बातों की जरूरत हमें बहुत बुरी तरह लगती है उसमें से एक तो यह है कि हर पार्टी को यह घोषणा करना चाहिए कि उसकी टिकटों को पाने वालों में से किस आयवर्ग के कितने लोग हैं और पिछले बरसों में, पिछले चुनावों में ये आंकड़े कहां से कहां तक पहुंचे हैं। दूसरी बात यह कि पार्टियों के ऊपर एक दबाव बनाने की जरूरत है ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी की बपौती खत्म हो और राजनीति में कुनबापरस्ती को एक अपराध बताने वाली जनजागरूकता भी खड़ी करनी चाहिए। तीसरी बात यह कि लोकतंत्र के भीतर यूं तो हर किसी को अपने बूते की कमाई करने का हक है लेकिन राजनीतिक दलों की एक ऐसी आचार संहिता रहनी चाहिए जिसमें एक सीमा से अधिक की कमाई वाले अपने नेताओं को टिकट या पार्टी का पद देने के एवज में पार्टी उनसे जनकल्याण के लिए एक टैक्स वसूले और उस पैसे का सार्वजनिक उपयोग करे। यह बात तो जगजाहिर है कि राजनीति की ताकत से लोग अपने धंधों को आगे बढ़ाते हैं, और इसीलिए ऐसे संपन्न नेताओं पर पार्टियों को एक संपन्नता टैक्स लगाना चाहिए जो कि समाज के सबसे अमीर और सबसे गरीब तबके के बीच खाई पाटने का काम भी करेगा। ऐसा करने पर राजनीतिक दल अपने खुद के खर्चों के लिए भी संपन्नता के अलग-अलग स्तरों के लिए संपन्नता टैक्स लगा सकते हैं ताकि पार्टी के बाहर से कालेधन की वसूली बंद हो। जिस तरह एक महिला आरक्षण की बात चल रही है, उसी तरह निम्न आयवर्ग का एक आरक्षण राजनीतिक दलों के भीतर आचार संहिता में शामिल होना चाहिए। ज्यादा अच्छा यह हो कि पार्टियों पर इस बात के लिए सार्वजनिक दबाव बने कि वे अपनी टिकटों में से एक छोटा हिस्सा ही अतिसंपन्न तबके को दे और बाकी टिकटें समाज के ऐसे तबके को दें जिनका गरीबों से कुछ तो वास्ता पड़ता हो।
हमने यह बात भाजपा के भीतर की खींचतान से शुरू की थी लेकिन हम एक पार्टी के भीतर के झगड़ों को यहां पर चर्चा के लायक महत्वपूर्ण नहीं मानते। हमारा मानना है कि ऐसे विवाद के बीच से भी देश को ऐसे पहलू देखने चाहिए जिन पर चर्चा जनता का कुछ भला कर सके। आज हमने यहां ऐसे ही कुछ मुद्दे उठाए हैं जिनको लेकर लोगों के बीच बातचीत हो और इन्हें उसी तरह सार्वजनिक चर्चा और दबाव का सामान बनाया जाए जैसा कि लोकपाल विधेयक को लेकर पिछले महीनों में सामने आया है।
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