इकत्तीस दिसंबर को बाहर किसी दावत में जाने का कभी मिजाज नहीं रहा। लोग नशे में, या बिना नशे के भी, जिस तरह जानी-अनजानी भीड़ के बीच नाच-गा लेते हैं। उनकी उस क्षमता को देखकर मुझे हैरानी होती है। लेकिन मेरी किस्म का कुछ सख्त पसंद नापसंद वाला इंसान ऐसी ही हैरानी का हकदार होता हे, नए साल की पूर्व संध्या पर भी। जिन लोगों के स्वभाव में लचीलापन अधिक होता है, जो एक शाम को महज एक शाम की तरह जीते हैं, वे हर बात का, हर मजे का अधिक लुत्फ उठा पाते हैं।
ऐसे में गलती एक ही हो गई कि मैं टेलीविजन के भरोसे बैठ गया। देश की एक बहुत बड़ी मनोरंजन और जश्न का मौका होता है। लोग उम्मीद करते हैं कि उनको एक से बढ़कर एक कार्यक्रम देखने मिलेंगे। लेकिन यह देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया कि एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, दर्जन भर से अधिक समाचार और मनोरंजन चैनलों पर दो-दो साल पुराने फूहड़ और पिटे हुए लतीफों की पुरानी रिकॉर्डिंग जोड़-जोड़कर दिखाई जा रही थी, एक ही दिन पहले शाम-रात को दिखाया जा चुका मंच का एक कार्यक्रम दिखाया जा रहा था, दसियों बार देखी या दिखाई जा चुकी एक फिल्म दिखाई जा रही थी और कुछ शहरों में चल रहे कार्यक्रमों का बहुत धुंधला जीवंत प्रसारण चल रहा था।
टेलीविजन के सौ पचास चैनल मिलकर भी जब एक शाम को मनोरंजक न कर पाएं तो उसे क्या कहा जाए? सुगम संगीत, गजलों या शास्त्रीय संगीत का, लोकसंगीत का, कोई चैनल नहीं? कोई साफ-सुथरा और ताजा मनोरंजन नहीं! यह टेलीविजन नाम के सूचना और मनोरंजन उद्योग का बाजारूकरण भी नहीं है क्योंकि बाजार तो बिकने लायक कुछ परोसता है। यह हलवाई तो दो बरस पुरानी सूखी बालूशाही सजाकर बैठा था जिन पर फफूंद अलग से लगा था।
छत्तीसगढ़ की राजधानी में, करीब दस लाख की आबादी के बीच भी एक भी ऐसा सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं था जिसमें साधारण या शांत स्वभाव के लोग परिवार सहित बैठकर सरल संगीत सुन सकते। सरकार को भी समारोह वाले ऐसे दिन के लिए किसी अच्छे कार्यक्रम की कल्पना नहीं होती। फिर पूरे शहर के लिए एक बड़े कार्यक्रम को छोड़ भी दें, बाहरी कलाकारों को छोड़ भी दें, स्थानीय कलाकारों वाले कुछ कार्यक्रम तो शहर को दर्जन-दो दर्जन सभाभवनों में हो ही सकते थे। बहुत कम लागत वाले ऐसे कार्यक्रम आस-पास की बस्तियों में रहने वाले मध्यम वर्गीय लोगों के काम के हो सकते थे, लेकिन वह भी नहीं हुआ। ऐसी कोई कोशिश भी होते नहीं दिखी।
कल चार-छह घंटे टेलीविजन चैनलों से संघर्ष करने के बाद यह मलाल रहा कि किसी अच्छी फिल्म की सीडी ही लाकर रखी होती तो मनोरंजन के उन घंटों का इस्तेमाल हो जाता।
देश के मनोरंजन और समाचार चैनलों की हालत बहुत खराब है। और अखबारी पन्नों पर इनको कितना कोसा जाए? एक किस्म का मीडिया दूसरे किस्म के मीडिया पर गैर जरूरी रफ्तार से या किसी बदनीयत से हमला कर रहा है, ऐसा लगने लगेगा। लेकिन मैं मीडिया की थोड़ी सी समझ रखने के कारण सोचता हूं कि सालभर पहले से नववर्ष की पूर्व संध्या का आना तो तय रहता है। फिर भी सैकड़ों करोड़ की लागत वाले ये चैनल कोई मौलिक, दिलचस्प और मनोरंजक कार्यक्रम तैयार नहीं कर पाते! जिस सालाना शाम विज्ञापनों से लदे इन चैनलों में आपस में कड़ा मुकाबला होना था, तो एक से बढ़कर एक पिटे हुए साबित हो रहे थे। निजी चैनलों से तो अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वे सनसनी, अपराध कथाओं, चुम्बन कथाओं, भविष्यवाणियों और फूहड़ हंसी में लगे हुए हैं। दूरदर्शन को ही संगीत का ऐसा चौबीस घंटों का चैनल शुरू करना चाहिए जिस पर लोकसंगीत, सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत लगातार दिखाया जाता रहे। साफ-सुथरे मनोरंजन की गुंजाइश कम हो चली है और दर्शक स्तरहीन कार्यक्रमों में से ही किसी-किसी को छांटने में मजबूर हो जाते हैं।
एक तरफ सरकार या तो ऐसा चैनल शुरू नहीं कर पा रही या फिर उसे केबल वाले दिखाते नहीं हैं। दूसरी तरफ जनता के बीच भी खुद की पहल से ऐसे कार्यक्रम कम हो चले हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बोझ से दबे मंचों पर कोई कार्यक्रम होना और टिकना वैसे भी मुश्किल रहता है॥ टीवी की चकाचौंध के सामने स्थानीय कार्यक्रम फीके ही लगेंगे। लेकिन इन सबका मतलब क्या यह नहीं होगा कि सितारों की झिलमिल के आगे प्रतिमाओं को कहीं खड़े होने की जगह मिलेगी?
टीवी पर अच्छे कार्यक्रमों की कमी और स्थानीय मंचों पर स्थानीय प्रतिमाओं के लिए गुंजाइश की कमी, इन दोनों को देखें तो इनके हित आपस में टकराते भी लगते हैं। लेकिन इस टकराव में तब तक कोई बुराई नहीं है जब तक दोनों में उत्कृष्टïता का मुकाबला चलता रहे। आज पहली बात तो यह कि उत्कृष्टïता रह नहीं गई और मुकाबला प्रतिमा-प्रदर्शन का नहीं रह गया, अब वह एसएमएस जुटाने का रह गया है। ऐसे गलत मुकाबले के दौर में सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उसे कुछ अच्छे चैनल शुरू करने, उनका प्रसारण या उन्हें दिखाना इस तरह से करना होगा कि उनसे लोगों को कुछ बेहतर मिले। घटिया सामानों के मेले से देश के लोग जो भी खाकर निकलेंगे, वह घटिया ही हो होगा।
रेडियो पर तो एक सैटेलाईट रेडियो सर्विस पर संगीत के कई तरह के कार्यक्रम सुनने मिल जाते हैं, लेकिन टीवी तो सच में ही ईडियट बनाकर छोड़ेगा।
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