पुलिस के एक बड़े अफसर हमारे अखबार में कई बार लिखते हैं। इससे सरकार में बैठे कई लोग खासे परेशान हो गए हैं कि इस आदमी को और कुछ काम नहीं है क्या, जो लिखते रहता है। कुछ लोगों ने सरकार के सबसे ऊपर के लोगों को कहा कि नक्सली मुद्दे पर इस अफसर के लिखने से उनको पुलिस की रणनीति पता लग जा रही है इसलिए उनको लिखने से रोका जाए। कुछ का कहना था कि सरकार में जब और लोग नक्सली मुद्दे पर बोलने से बचते हैं तो इस अफसर को इतने खुलासे से क्यों लिखना चाहिए। मैंने सुझाया कि लोकतंत्र में जनता को जानने का हक है कि सरकार क्या कर रही है तो उनका कहना था कि अब तो सूचना का अधिकार लागू हो गया है जो सरकार के दिमाग पर लागू नहीं है, इसलिए जिसको जो जानना हो, कागजों की फाइलों की कॉपियां मांग लें।
राजनीति और सरकार में लिखना-पढऩा काफी कम हो गया है इसलिए हफ्ते में एक घंटे में एक लेख लिख लेने वाले से भी लोग यह धोखा खा जाते हैं कि वह लिखने के अलावा हफ्ते भर और कुछ करता ही नहीं। फिर चाहे ऐसा लिखने वाला अफसर या नेता रोज शाम कुछ घंटे दारू पीते बैठे, रिश्वत खाते न बैठे। ऐसे कमजोरियों से मानो किसी के काम पर कोई फर्क ही नहीं पड़ता, महज लिखने-पढऩे से पड़ता है।
सिर्फ सरकार या राजनीति में नहीं, पढ़े-लिखे लोगों के पेशे, अखबारनवीसी में भी गंभीर पढऩा-लिखना फैशन के बाहर है। कम लोग हैं जो पढ़ते हैं। पढऩे का एक नुकसान यह होता है कि लिखने में सावधानी बढ़ती है, गलतियां घटती हैं और इससे उत्पादकता एकदम कम हो जाती है। बिना जानकारी लिखने वाले अधिक लिख लेते हैं (वैसे मैं खासा अधिक लिखता हूं) क्योंकि उनके सामने बाधा-दौड़ की रोक की तरह के बैरियर नहीं लगे रहते।
लेकिन यहां बात सरकार और राजनीतिक की चल रही थी जहां पढऩे और लिखने के वक्त की बरबादी माना जाता है और यह सोच लिया जाता है कि इसके पास कोई और काम नहीं है। सत्ता को चलाने के लिए काबिलीयत और तजुर्बे को पूरी तरह गैरजरूरी मान लिया गया है। संजय, राजीव, सोनिया, राहुल, बिलावल, राबड़ी, कोई भी सत्ता चला सकता है। सरकार में कुछ विभागों को अधिक महत्वपूर्ण मान लिया जाता है उनके बारे में कभी आला अफसरों से बात होती है तो कोई भी सामाजिक यथार्थ, गांधीवाद, पे्रमचंद या गरीबी के अर्थशास्त्र को पढऩे समझाने की जरूरत नहीं समझाता। सरकार मानो समाज से ऊपर, कुछ फासले से काम करने वाली मशीनरी है जिसको चलाने के लिए उस पेशे की स्थापित तरकीबें मानो काफी हैं और समाज की समझ की कोई जरूरत नहीं है।
लिखने को तो बहुत से लोग आपत्तिजनक मानते ही हैं, पढऩे को भी उतने ही लोग गैर जरूरी मानते हैं। पढऩा मानों एक वामपंथी काम है जिससे सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को दूर रहना चाहिए, नेताओं को भी। नेताओं में लगीाग सभी को यह अति आत्मविश्वास रहता है कि वे जमीन से इनते जुड़े हुए हैं कि उन्हें कुछ और पढऩे की जरूरत नहीं है। काफी लोग पढऩे को एक किताबी बोझ मानते हैं और डूबने की गारंटी भी। उनके पास एक मिसाल रेडिमेड रहता है कि फलां सांसद या विधायक को देखे, बहुत पढ़ता-लिखता था, चुनाव में निपट गया।
काफी लोगों या यह रोना रहता है कि पढऩे का वक्त ही कहां मिलता है? देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पूरी दुनिया का पढ़कर, पूरी दुनिया के बारे में लिखने का वक्त भी रहता था और सभी मुख्यमंत्रियों को शायद हर महीने वे चि_ïी भी लिखते थे। गांधी तो गांव-गांव के पटवारी-पंच तक की चि_िïयों के जवाब लिखते थे। लेकिन आज की राजनीति में, सरकार चलाने में इसे बोझ मान लिया गया है।
ऐसे माहौल में लिखने-पढऩे वाले अफसर बिना इरादे भी बहुत से दूसरे लोगों को बेइज्जत कर देते हैं। लेकिन क्या इससे डरकर लोग लिखना-पढऩा ही बंद कर दें? या यह सफाई देते फिरें कि उनके पढऩें और लिखने में सरकारी नौकरी वाला हिस्सा नहीं लगता। निजी जिंदगी में जिस तरह से कोई कीर्तन करता है, कोई संगीत सुनता है, कोई पेंटिंग करता है, वैसे ही कोई लिखता-पढ़ता है। लेकिन कुछ चुनिंदा लोग ही लिख-पढ़ पाते हैं इसलिए वे बाकी लोगों में दहशत पैदा करते हैं।
छत्तीसगढ़ के एक नामी-गिरामी वकील कनक तिवारी से हम दो बरस से अपने लिए लिखने को कह रहे थे, वे अब मेहरबान हुए। हमने उनको कांगे्रस विचारधारा से जुड़ा हुआ तो उन्होंने साफ किया कि वे नेहरू की विचारधारा से जुड़े हुए हैं, कांगे्रस से नहीं। इस बारीक फर्क को देखना हो तो देश के सबसे अधिक पढ़े-लिखे नेताओं में से सबसे महान जवाहरलाल नेहरू को देखना होगा और आज उनकी पार्टी पर वकील अनपढ़ों को। आज कांगे्रस में कोई लिखने-पढऩे की बात भी नहीं करता और विचारों को लेकर ऐसी पहाड़ सी दुविधा इस पार्टी में है कि पार्टी पांच दिनों तक पराठे की तरह पलटी खाती रही कि सोनिया ने मौत का सौदागर मोदी को कहा था या नहीं। नेहरू को शायद अपनी पूरी जिंदगी में बात न पलटनी पड़ी हो।
लेकिन बात कनक तिवारी की हो रही थी। जिन मुद्दों पर वे लिख रहे हैं उनसे उनकी वकालत का कोई लेना देना नहीं है और एक लेख के लिए पढऩे और लिखने के समय में वे लाख-पचास हजार रूपए की वकालत कर लेते। लेकिन रोजी-रोटी से ऊपर भी इंसान की जरूरत होती है, खासकर अगर आप सोचते-विचारते हों, रचना करते हों, आपमें कल्पनाएं हों और आपके सरोकार हों।
बहुत से लोगों को ऐसे शोधकर्ता सिरफिरे लगते हैं जो सात समंदर पार से आकर हिन्दुस्तान के जंगल-पहाड़, गांव-नदी तक जाकर कोई रिसर्च करते हैं। पंछी देखने के लिए जो लोग दूरबीन लिए जंगल या सरोवर किनारे लंबे घंटे बैठे रहते हैं, उनके दिमाग पर कई लोग तरस भी खाते हैं और उनको बदनसीब समझते हैं।
मैं लोगों को उकसाता हूं कि अपनी पसंद या नापसंदगी को लिखें। नाम से न लिख सकते हों तो बिना नाम के लिखें, लेकिन कम ही लोग ऐसा करते हैं। बहुत से लोगों को देखकर मुझे लगता है कि ये जिस जगह पर हैं, जितनी बातें आज इनके सामने आती हैं, उस अनुभव के बाद वे लोगों के लिए कुछ विचारोत्तेजक बातें लिख सकते हैं जिनसे बात आगे तक जाए, लोगों के बीच बात-चीत और बहस शुरू हो और लोकतंत्र विकसित हो। आज पेशेवर लिखने वालों की एक छोटी बिरादरी ऐसी है जो (मेरी तरह) बहुत सा लिखते हैं, लेकिन बहुत बड़ी एक मौन बिरादरी हाथ बांधे कुछ दूर खड़े हैं, महज पढ़ते हुए, जो कि बहुत सी नई बहस छेड़ सकती है।
सच तो यह है कि इस पत्रिका को शुरू करने के पहले जिस अखबार 'छत्तीसगढ़Ó को हमने शुरू किया, उसके बारे में पहले दिमाग में था कि इसे समाचार-पत्र की जगह विचार-पत्र बनाया जाए। लेकिन फिर कुछ करीबी जानकार लोगों ने हौसला काबू में किया कि इतने विचार आएंगे कहां से और उन्हें पढ़ेगा कौन? इन दो बरसों में वह अकाल दोनों तरफ कुछ कम होते दिख रहा है और आगे की बात तो आने वाला वक्त की बताएगा।
-सुनील कुमार
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