अपने आस-पास देखकर कभी-कभी हैरान होता हूँ कि लोग बिना काम किए या कम काम करके किस तरह रह लेते हैं। बदनाम हो चुकी सरकारी नौकरी के लिए तो यह आम बात मानी जाती है कि सुरक्षित कुर्सी पर पहुंच जाने के बाद काफी लोग काम नहीं करते, लेकिन निजी काम में, अपनी निजी जिंदगी में भी लोग दिखते हैं जो बिना काम किए, या पर्याप्त काम किए बिना भी चैन से रह लेते हैं।
हो सकता है कि मुझे काम करने की लत कुछ अधिक बुरी हो और छुट्टिïयों की आदत जरा भी न हो, लेकिन अधिक काम करना कम काम करने से मुझे फिर भी बेहतर लगता है। मैं यह भी पाता हूँ कि जरूरत से अधिक काम करने वाले उतने बीमार नहीं होते जितने कि जरूरत से कम काम करने वाले होते हैं। शायद इंसान का तन-मन कुदरत ने कड़ी मेहनत के मुताबिक ढाला है और जब लोग बहुत आराम मतलब जिंदगी गुजारते हैं तो वे तरह-तरह की बीमारियां पा लेते हैं क्योंकि मिहनत से ताकतवर होने वाला शरीर का बचाव तंत्र कमजोर हो जाता है।
लेकिन काम न करने के अलग-अलग कई तरह के दर्जों को मैं परले दर्जे का संक्रामक पाता हूँ। आरामतलब, आलसी, कामचोर, निकम्मा या निठल्ला, जितने किस्म के भी विशेषण इस्तेमाल होते हैं, वे बेहद असर करने वाले होते हैं। जिस तरह सर्दी, आंखों का कंजक्टीवाइटिस या एचआईवी फैलते हैं, उसी तरह ये तमाम विशेषण भी आस-पास तेजी से असर करते हैं। किसी को कमरतोड़ मेहनत करते देख खुद भी मेहनत करने की राह सौ में से एक को ही सूझेगी, लेकिन किसी नालायक, निकम्मे या कामचोर के आस-पास के लोगों में से शायद आधे से अधिक लोग उसके साथ गप्प मारने, क्रिकेट या सीरियल देखने या भजिए बनने की तरह तकते बैठ जाएंगे।
अधिक मेहनत और अधिक जिम्मेदारी से काम करने वाले का असर कम होता है लेकिन ऐसा काम करने का कोई सोचे तो उसके इरादे और मकसद को पटरी से उतारने का काम कोई आसानी से कर लेता है। ऐसा करते हुए कम मेहनत का आदी यह भी नहीं सोचता कि वह किसी की जिंदगी को यह किस तरफ मोड़े दे रहा है।
जिम्मेदारी से काम न करने के शौकीन या आदी लोगों का यह असर देखते ही बनता है। मेरे मन में ये तमाम बातें बरसों से एक अजीब सी घुटन अपने आस-पास के लिए पैदा करते आई हैं, इस बीच अमरीका में बसे एक सफल छत्तीसगढ़ी, वेंकटेश शुक्ला को दो दिन पहले इंटरव्यू किया तो उन्हें सफलता के लिए टाईम मैनेजमेंट की जैसी अहमियत बताई उसे सुनकर मुझे खुद पर शर्म आने लगी। सुबह से देर रात तक काम की आदत के बीच रोज एक-दो घंटे तो मैं भी ऐसे बरबाद कर देता हूँ जिनका कोई फायदा, कोई इस्तेमाल नहीं होता। कभी आस-पास के किसी करीबी के आग्रह पर वक्त ऐसे बरबाद कर बैठता हूँ कि जिसका कोई फायदा न उसे होता न मुझे होता। न ही वक्त की ऐसी बरबादी के दौरान मुझे कोई मजा ही आता क्योंकि अपनी मारा-मारी के बीच किसी और के कहे मैं कहीं बैठ जाता हूँ और खासे समय बाद खाली हाथ उठता हूँ।
आज भी मुझे आस-पास कुछ ऐसे लोग दिखते हैं, जो वक्त का पल-पल इस्तेमाल भी करते हैं और आराम या मनोरंजन के लिए रखे गए वक्त का पल-पल मजा भी लेते हैं। जो लोग मेहनत से काम नहीं करते, वो लोग आराम के वक्त का मजा भी नहीं ले पाते।
लेकिन आस-पास देखकर तकलीफ पाने के बीच मैं यह बात भूलने लग जाता हूँ कि अधिक लोग औसत के नीचे की खूबियों वाले रहते हैं और कम ही लोग उन पैमानों पर खरे उतरते हैं जिसकी सीढिय़ों पर ऊपर जाने के लिए मैं लगातार लगे रहता हूँ। लेकिन अलग-अलग देश-प्रदेश, शहर-तबके को देखता हूँ तो लगता है कि खूबियों को पाने के लिए मेहनत और समय के बेहतर इस्तेमाल से ही लोग अपने लिए सामान्य रूप से संभव ऊंचाईयों से ऊपर जाकर असामान्य सफलताएं पा सकते हैं।
निराश मैं उस वक्त होता हूँ जब अधिकांश मां-बाप, परिचित-दोस्त किसी का वक्त खराब करने में तो खासे लापरवाह रहते हैं, लेकिन बेहतरी का रास्ता सुझाने के लिए अपनी जिम्मेदारी के वक्त, बेफिक्र रहकर टीवी देखते भजिया खाने में व्यस्त और मस्त रहते हैं।
एचआईवी जैसे संक्रामक रोग से बचने के लिए तो दुनिया में सावधानियों की बात खूब फैलाई जाती है लेकिन निकम्मेपन और कामचोर के संक्रमण से बचने के चौकन्नेपन की तरफ से लोग पूरी तरह बेपरवाह और बेफिक्र रहते हैं। सफल समाज और असफल समाज के बीच मुझे एक बड़ा फर्क दिखाई पड़ता है लोगों के जीने के अंदाज का। जिन बिरादरियों में नौजवान पीढ़ी रोज घंटों पान ठेलों पर, चाय ठेलों पर दिखती है, कैरम खेलते या सीढी पर लूडो खेलते दिखती है, रोजाना चबूतरों पर बैठे गप-शप और चाट-कचौरी में शाम गुजारती है, वह बिरादरी कहां से आगे बढ़ेगी? आज हाल यह है कि ऐसे गैजरूरी, जंग लगाने वाले कामों में उम्र गुजारने पर आमादा पीढ़ी से सरकार भी खुश है कि झंडा-बैनर लेकर उसकी देहरी पर धरना देने के बजाय यह पीढ़ी साल में सौ से कम दिन, रोज दो घंटे से कम कॉलेज में रहे और बाकी वक्त बरबाद करती रहे। कम से कम अगले चुनाव तक। लेकिन क्या निकम्मों-निठल्लों को आस-पास के सफल-मेहनतकश बिल्कुल ही नहीं दिखते?
-सुनील कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें