11 जुलाई 2011
सुनील कुमार
दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बी.के. गुप्ता ने अभी यह कहा कि महिलाएं देर रात में अकेले न निकलें और वे किसी पुरुष के साथ ही जाएं। इसके खिलाफ वहां सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और पत्रकारों ने बयानों का एक मोर्चा खोल दिया है। सीपीएम की सांसद बृन्दा कारत ने उसे बहुत आपत्तिजनक माना है। उनका कहना है कि दिन के दो हों या रात के दो, यह पुलिस का जिम्मा है कि वह शहर को महिलाओं के लिए सुरक्षित रखे।
बहुत सी दूसरी महिलाओं ने पुलिस के बयान के खिलाफ तरह-तरह की बातें इंटरनेट पर लिखी हैं। किसी ने कहा कि यह एक पुरानी सोच का सुबूत है जिसमें अपराध की शिकार महिला को ही उस पर हमले के लिए जिम्मेदार मान लिया जाता है। किसी ने लिखा कि यह बयान देश की राजधानी में महिलाओं की हिफाजत में सरकार की नाकामयाबी बताता है। एक महिला पत्रकार ने लिखा कि जिनके घरों में कोई दूसरे पुरुष न हो या जिनके पास ड्राइवर न हो वे क्या काम करने बाहर न आए-जाएं? एक महिला पत्रकार ने लिखा कि पुलिस कमिश्नर का यह कहना कि महिला देर रात बिना भाई या ड्राइवर के न जाए तालिबानों के यह कहने की तरह है कि महिला सड़कों पर बिना खून के रिश्ते के पुरुष के कहीं न जाए।
दिल्ली का ही एक दूसरा मामला एक प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी की पत्रकार सुनेत्रा चौधरी ने अपने एक कॉलम में लिखा है। उन्होंने बताया कि 12 बरस ही अपनी कामकाजी जिंदगी के बाद वे अपने संपादक के कहे एक बड़े राजनेता को इंटरव्यू करने की कोशिश कर रही थीं। जब बहुत बार बात करने पर भी इस नेता के स्टाफ के लोगों ने बात नहीं कराई तो यह संवाददाता अपने कैमरामैन के साथ इस नेता तक पहुंची तो आखिर में उससे मुलाकात हुई। उसने इस संवाददाता से कहा-तो तुमने मुझे ढूंढ ही निकाला।
जब उससे इस संवाददाता ने पूछा कि उन्होंने अपने एक विरोधी के खिलाफ जो बहुत ही गंभीर आरोप लगाए हैं, उसमें उन्होंने उसका नाम पहली बार नहीं लिया है?
इस पर उस नेता ने कहा- देखो अगर तुम मेरे साथ हमबिस्तर रहोगी, तो भी रात में मैं अपने दांत किटकिटाते हुए उसका नाम लेकर ही यह कहूंगा।
इस हक्का-बक्का संवाददाता ने किसी तरह अपने काम की बात की और साथ-साथ उसे इस नेता से यह भी सुनना पड़ा कि वह किस तरह एक दूसरे राजनेता की पार्टी में इसलिए जाता है क्योंकि वहां पर बहुत सी औरतें अपनी टांगे और सीना दिखाते हुए मिल जाती हैं और किस तरह वहां एक औरत ने उसके लिए कामसूत्र-डांस किया था... और इसी तरह की बहुत सी कहानियां।
इस पत्रकार ने यह भी लिखा है कि उसकी एक सहयोगी को किस तरह एक कैबिनेट मंत्री के तरफ से लगातार एसएमएस मिलते रहे लेकिन भी उसने किसी शिकायत करने के बजाय चुप रहना बेहतर समझा। सुनेत्रा ने अपना खुद का एक दूसरा अनुभव लिखा है कि कुछ बरस पहले किस तरह उसे एक दूसरे समाचार सूत्र ने एक रिपोर्ट के दौरान यह सुझाया कि यह उसके लिए (सुनेत्रा के लिए) बच्चा पैदा करने का एक सही समय है।
इस पत्रकार के मन में इस बात को लेकर एक दुविधा है कि ऐसे व्यवहार की शिकायत करते हुए क्या वह आगे अपना काम बिना दिक्कत के कर सकती थी?
दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की बात से लेकर इस पत्रकार की आपबीती तक, देश की राजधानी में कामकाजी और आत्मविश्वासी महिलाओं पर छाए रहने वाले खतरे का एक अंदाज लगता है। न कोई सड़कों पर बलात्कारियों से बचा हुआ है और न ही ताकतवर लोगों के घर-दफ्तर के कमरों में उनसे काम के सिलसिले में मिलते हुए। जब दिल्ली की खबर टीवी पर आती है कि किसी लड़की से सड़कों पर दौड़ती गाड़ी में छह घंटे तक कई लोगों ने बलात्कार किया तो लगता है कि बंदूकों की फसल सी दिखने वाली दिल्ली में ऐसा करने वाले लोगों का ऐसा कितना हौसला होता है?
लेकिन बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है। राजस्थान, गोवा, केरल बहुत सी जगहों पर सैलानी लड़कियों और महिलाओं के साथ ऐसा ही सुलूक एक आम बात है। और यह सिर्फ अकेली महिला के साथ होता हो, ऐसा भी नहीं है। केरल में एक समुद्र तट पर मैं अपने साथ की एक महिला दोस्त के साथ घूम रहा था और उसने कोई भड़काऊ कपड़े भी नहीं पहन रखे थे लेकिन वहां के स्थानीय लोग उस पर फिकरे कस रहे थे। जो देश का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा प्रदेश है वहां भी दिल दहलाने वाले कुछ हादसे अभी सामने आए हैं जिनमें एक पिता ने अपनी छोटी सी बच्ची की देह को सौ लोगों को बेच दिया, अब तक शायद उसमें से पौन सौ लोग गिरफ्तार भी हो चुके हैं। ऐसा पिता तो एक बीमार और अपराधी दिमाग वाला रहा होगा लेकिन इन सौ लोगों को क्या कहा जाए?
लेकिन जब मेरे कुछ पत्रकार दोस्त इंटरनेट पर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की बातों के खिलाफ तालिबान जैसे लफ्ज इस्तेमाल कर रहे थे तो मैंने उन्हें यह भी याद दिलाया कि महिलाएं सभी जगह अधिक खतरे झेलती हैं।
मेरा यह मानना है कि किसी भी तरह का पुलिस का इंतजाम बलात्कार जैसी घटनाओं को पूरी तरह रोक नहीं सकता। इसके लिए महिलाओं को, बच्चों को खुद भी सावधान रहने की जरूरत है और चाहे कितना ही नाजायज हो, जो खतरा आज हकीकत में है, उसे देखते-समझते हुए ही लोगों को, खासकर कमजोर तबकों को काम करना होगा। अगर देर रात अकेली घूमती महिला पर खतरा कुछ अधिक है तो उस खतरे के कम हो जाने तक तो ऐसी महिला को ही सावधान रहना होगा। ऐसी साधारण सावधानी सुझाने वाले किसी अफसर की बात को सैद्धांतिक रूप से खारिज करके उसे तालिबानी करार देना ठीक नहीं है। किसी बलात्कार के बाद पुलिस के लिए तो जांच और फिर अपराधी को पकड़कर मुकदमा, यह एक रोजमर्रा की बात है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान तो बलात्कार की शिकार लड़की का होता है और उसे खुद तब तक तो अतिरिक्त सावधानी बरतनी ही होगी जब तक कि हिन्दुस्तान के शहरों की हालत नहीं सुधरती।
सेक्स अपराध किसी लूटपाट या डकैती जैसे अपराधों से परे के होते हैं। ये बलात्कारियों के निजी फैसले पर टिके होते हैं और इनमें से बहुत से मामलों में ऐसे अपराधी पहली बार पुलिस की नजरों में आते हैं। इसके पहले के उनके अपराध या तो दबे रहते हैं या फिर ऐसे पहले अपराध में ही वे पकड़ा जाते हैं। इसलिए किसी पेशेवर अपराधी गिरोह पर नजर रखकर उसे अपराध के पहले रोक लेने जैसी बचाव की कार्रवाई पुलिस सेक्स अपराधों के अधिकतर मामलों में नहीं कर सकती। ऐसे में समाज और लोगों को खुद भी चौकन्ना रहना होगा।
और यह बात सिर्फ सड़कों पर आती-जाती महिलाओं को लेकर नहीं है। यह किसी घर से लेकर किसी दफ्तर तक, या कामकाज की किसी दूसरी जगह पर काम करने वाली महिला तक सबको याद रखने की जरूरत है। यह नसीहत चूंकि महिलाओं को कुछ अधिक दी जा रही है इसलिए इसे पढ़कर कुछ लोगों को यह लग सकता है कि यह एक पुरुषवादी सोच से निकली हुई बात है। इसलिए यहां पर मैं यह साफ कर देना चाहूंगा कि सेक्स अपराधों का अधिक खतरा चूंकि महिलाओं पर रहता है इसलिए इस हकीकत को अनदेखा करके औरत-मर्द की बराबरी के नजरिए से किसी सावधानी की चर्चा नहीं की जा सकती। एक कोई लड़का या आदमी देर रात भी अकेले जा रहा है तो उस पर किसी सेक्स अपराध का वैसा खतरा नहीं रहता जैसा कि किसी लड़की या औरत पर रहता है। इसकी बहुत सीधी-सीधी वजह यह है कि आदमी और औरत के शरीर को कुदरत ने इतना अलग-अलग बनाया है कि लगभग हमेशा आदमी ही औरत की चाह में अधिक रहता है। यही वजह है कि पूरी दुनिया में देह के धंधे में महिलाएं ही अधिक रहती हैं और आदमी कहीं-कहीं गिने-चुने।
इसलिए बराबरी की बात इस सिलसिले में लागू नहीं होती और लड़कियों-महिलाओं को ही अपने-आपको पहचान वालों के हाथों शोषण से लेकर अनजाने अपराधियों के बलात्कार से अपने-आपको बचाने तक, कदम-कदम पर सावधान रहने की जरूरत है। जब तक देश की हालत नहीं सुधरती है तब तक तो लोगों को खुद भी बचना होगा।
मुझे जर्मनी के एक फिल्म समारोह के दौरान वहां गुजारे हुए अपने कुछ दिन या हैं। देर रात हम फिल्में खत्म होने के बाद शहर की सड़कों पर घूमने निकलते थे तो वहां शाम से सुबह तक के किसी भी वक्त पर अकेली लड़की भी साइकिल पर बैग या किताबें लिए कहीं से कहीं आती-जाती दिखती ही रहती थीं। लेकिन समाज के भीतर जब तक औरत के बराबरी के दर्जे के लिए मर्द के मन में एक इज्जत ठीक से जम नहीं जाएगी तब तक तो वह समाज दिल्ली की सड़कों जैसा ही खतरनाक रहेगा।
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