मीडिया का मर्डोकीकरण

8 जुलाई 2011
ब्रिटेन के सबसे ज्यादा बिकने वाले इतवारी अखबार 'न्यूज ऑफ द वल्र्डÓ का इस इतवार आखिरी दिन होगा। एक सौ अड़सठ बरस तक चलने के बाद जैसी बुरी मौत इस अखबार की हुई है, वैसी अखबार के कारोबार में कम ही होती है। इस अखबार की कोई अधिक इज्जत कभी नहीं थी और यह लोगों की जिंदगी में ताकझांक करने, सनसनीखेज खबरें छापने और विवाद खड़े करने के लिए मशहूर या बदनाम जो भी कहें था। यह रूपर्ट मर्डोक नाम के एक बड़े मीडिया मालिक का अखबार था जिसे कि योरप के बहुत से उदारवादी लोग मीडिया माफिया भी मानते हैं। मर्डोक का नाम मीडिया में भारी कामयाबी के बावजूद एक ईमानदार तबके में गाली की तरह लिया जाता है और माना जाता है कि इस धंधेबाज ने पत्रकारिता के सारे उसूल खत्म करके सिर्फ कामयाबी को अकेला उसूल बना रखा है। ऐसा कारोबारी जब रातों-रात यह तय कर ले कि उसे 168 बरस पुराना अपना सबसे कामयाब एक अखबार बंद करना है तो उसके पीछे की वजह यहां पर चर्चा के लायक तो हैं ही।
न्यूज ऑफ द वल्र्ड ने पिछले बरसों में लगातार लोगों के टेलीफोन से जुड़े उनके वॉइस मेल बॉक्स में सेंध लगाकर घुसपैठ की, और वहां से निजी जानकारी लेकर बड़ी-बड़ी सनसनीखेज खबरें बनाईं। यह बात कुछ समय पहले से चर्चा में थी लेकिन अभी जब ब्रिटेन को यह पता लगा कि यह हैकिंग उन शहीदों या उनके परिवारों के फोन के वॉइस मेल बॉक्स में भी की गई जो कि देश के लिए जान दे चुके हैं, तो देश उबल पड़ा। इसके अलावा एक ऐसी छोटी लड़की के फोन को भी हैक करने का आरोप इस अखबार पर लगा है जिसकी बाद में हत्या हो गई। ऐसी हरकतों के चलते इस अखबार के संपादक-रिपोर्टर को पहले भी कैद हो चुकी है लेकिन अभी जब इसकी हरकतें शहीदों के परिवारों के निजी जीवन में घुसपैठ तक पहुंच गई तो ब्रिटेन में सरकार हिल गई, संसद विचलित हो गई और इस अखबार के खिलाफ कार्रवाई की मांग जोर पकड़कर जनता को हिला गई। नतीजा यह हुआ कि पुलिस की जांच, अदालती मुकदमे और बहुत संभव मानी जा रही सजा, इन सबसे बचने के लिए इस अखबार के मैनेजमेंट ने इसे एक पल में बंद करने का फैसला लिया और इसका आखिरी अंक एक समाजसेवी के अंदाज में निकाला जा रहा है।
खुदरा सामान के बाजार में जिस तरह वालमार्ट एक गंदा शब्द माना जाता है उसी तरह योरप में मर्डोक को एक गाली माना जाता है। वहां के समझदार और सामाजिक सरोकार वाले जिम्मेदार तबके के बीच पत्रकारिता में गिरावट को मर्डोकीकरण कहा जाता है। जब किसी धंधे को पूरी तरह से बाजारू बनाकर पूरी तरह से अनैतिक कर दिया जाए तो वह उसका मर्डोकीकरण हुआ। अंगे्रजी पढऩे वाले कुछ पाठकों को एक अपराध-उपन्यास याद होगा जिसमें लेखक इरविंग वालेस ने ऑलमाइटी (ईश्वर या ईश्वर सरीखा सर्वशक्तिमान) की एक कल्पना की थी। इसमें एक अखबार का मालिक कुछ कानूनी शर्तों को पूरा करने के लिए एक सीमित समय में अखबार का प्रसार इतना बढ़ाने के लिए मजबूर रहता है जितना कि किसी कारोबारी तरीके से नहीं किया जा सकता इसलिए वह अंतरराष्ट्रीय अपराधियों और हत्यारों को भाड़े पर लेता है और जगह-जगह बड़े अपराध करवाता है जिसकी की पूरी खबर उसी के अखबार के पास सबसे पहले होती है क्योंकि अखबार का मालिक ही साजिश तैयार करता है। इस तरह उन खबरों को लगातार छापकर वह दुनिया में सबसे अधिक सनसनीखेज और चर्चित अखबार बन जाता है। आज मीडिया के धंधे में न सिर्फ पश्चिमी देशों में बल्कि हिन्दुस्तान में भी यह रूख कायम हो चुका है और एक-दूसरे से आगे बढऩे के गलाकाट मुकाबले में अखबार और टीवी चैनल सभी किस्म के उसूल और सभी किस्म की ईमानदारी से परे महज बाजारू-कारोबारी बनकर रह गए हैं। इसलिए हमने बीच-बीच में कुछ मौकों पर चुनावों के लिए खरीदे गए समाचार और विचार की चर्चा भी की और इस रूख को कोसा भी था। लेकिन यह सिलसिला बाजार के किसी भी दूसरे सामान के मुकाबले की तरह बढ़ते ही चल रहा है और इसके कम होने का कोई आसार नहीं दिख रहा है बल्कि जिस तरह पश्चिम में मीडिया को लेकर नीति-सिद्धांत की कुछ चर्चा वहां के मीडिया में हो भी जाती है, वैसी भी हिन्दुस्तान में अब नहीं होती। हिन्दुस्तान का मीडिया मीडिया पर चर्चा से पुराने जमाने की उस धंधे की नसीहत पर चलते हुए बचता है जिसमें सुझाया गया है कि कुत्ता कुत्ते को नहीं काटता। लेकिन आज रूपर्ट मर्डोक की इस खबर से हमें कुछ चर्चा का मौका मिला है। जो पश्चिमी मीडिया, मीडिया को चर्चा के लायक मानता है वहीं पर मीडिया का एक बड़ा हिस्सा निजी जीवन में हमलावर दखल करते हुए लोगों को रात-दिन नंगा करने का काम भी करता है। इसलिए हम उस चर्चा को बहुत अधिक काम का नहीं मानते क्योंकि उससे कई खामियां तो बिल्कुल भी नहीं सुधरती हैं। इस मुद्दे पर आज हम बहुत सी खबरें छाप रहे हैं और उनको पढ़कर पाठक सही और गलत के बारे में अपनी राय बना सकते हैं। अगर भारत के मीडिया-ग्राहक एक बेहतर और जिम्मेदार समाचार-विचार चाहते हैं तो उन्हें अच्छे और बुरे के बारे में अपनी राय बनानी चाहिए, अच्छे को आगे बढ़ाना चाहिए और बुरे का बहिष्कार करना चाहिए। ऐसा न होने पर भारतीय मीडिया का मर्डोकीकरण तो हो ही रहा है।





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