25 जुलाई 2011
नार्वे में दो दिन पहले एक कट्टर संकीर्णतावादी, माक्र्सवाद विरोधी, इस्लाम विरोधी, गोरे-यूरोपियन-ईसाई नौजवान ने जिस तरह एक लंबा घोषणापत्र लिखने के बाद नब्बे से अधिक लोगों को मार डाला उससे पश्चिम में कट्टरपंथ के एक नए सैलाब की तरफ लोगों का ध्यान गया है। यह कोई नई बात नहीं है और ऐसी घटनाएं बीच-बीच में उन तमाम देशों में सामने आती हैं जहां पर लोकतंत्र की विचारधारा उदारता के नए पैमाने गढऩे में लगी रहती हैं। यह उदारता हालांकि एक पश्चिमी सोच के अनुकूल उदारता ही रहती है लेकिन वह है तो उदारता ही। और मानो इस उदारता के अनुपात में ही उसके साथ-साथ कट्टरता भी जवाब देने के अंदाज में बढ़ते जा रही है। दो-चार दिन पहले ही जर्मनी में हिटलर के एक सहयोगी की कब्र को खोदा गया और उसकी हड्डियां निकालकर, उन्हें जलाकर उसकी राख को फेंक दिया गया और उस कब्र को मिटा दिया गया। इसके पीछे तर्क यह था कि जर्मनी में पनप और बढ़ रहे नवनाजीवाद के हिंसक समर्थक इस कब्र को तीर्थ की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और उससे जर्मनी में राजनीतिक उदारता की हवा खराब हो रही थी। अमरीका की तमाम गुंडागर्दी को अनदेखा न करते हुए भी हम यहां पर इस बात की चर्चा करना चाहेंगे कि उसने ओसामा बिन लादेन की कब्र कहीं बनने नहीं दी ताकि उसके प्रशंसक वहां पर कोई तीर्थ न बना डालें।
योरप और अमरीका में लगातार लोकतंत्र के तहत सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा दिया गया। पूरी दुनिया से आए हुए लोगों के धर्मों को जगह दी गई और कहीं-कहीं पर सरकारों के कुछ ऐसे फैसले भी रहे जो किसी धर्म के लोगों को हमले की तरह लगे लेकिन वे हमले थे नहीं। जैसे फ्रांस ने हाल ही में बुर्के पर रोक लगाने का फैसला लिया और इसे मुसलमानों ने अपने धार्मिक अधिकारों और अपनी संस्कृति पर हमला माना। लेकिन फ्रांस का तर्क मुस्लिम महिला के बुनियादी मानवाधिकारों का था जो कि बुर्के में कैद दिखते थे। इस पर बहस अभी चल ही रही है कि नार्वे में इस ताजा हमलावर ने पन्द्रह सौ पेज के अपने नफरत के घोषणापत्र में सांस्कृतिक विविधता, इस्लाम और माक्र्सवाद पर हमले को सही ठहराया है। यह नफरत कुछ जगहों पर हिंसा की हद तक दिखती है और बहुत सी जगहों पर संकीर्णतावादी, सांस्कृतिक शुद्धतावादी, और दक्षिणपंथी कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की चुनावी जीत की शक्ल में अहिंसक सी दिखती है। एक के बाद एक बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर कट्टरवादी लोग या उनके करीब समझे जाने वाले लोग चुनाव जीत रहे हैं।
हम दुनिया के भविष्य के लिए आतंक और हिंसा को उतना खतरनाक नहीं मानते जितना कि कट्टरवादी अहिंसक लोगों को मानते हैं। ऐसा इसलिए कि किसी भी देश में हिंसक अपराधियों को पकड़कर पूरी जिंदगी के लिए जेल में डालने का इंतजाम हो सकता है लेकिन जब ऐसी विचारधारा के करीब के राजनीतिक दल जनता के वोट पाकर सत्ता में आते हैं तो फिर वे हिटलर की तरह जीतकर संसद में पहुंचे हुए लोग भी होते हैं और उनकी जीत का एक मतलब यह भी निकाल लिया जाता है कि जनता ने उनकी हिंसा पर मंजूरी की मोहर लगा दी है। लेकिन अपनी इस सोच के साथ भी हम यह चर्चा करना चाहेंगे कि क्या दुनिया की अलग-अलग लोकतांत्रिक और उदारवादी शासन-व्यवस्था और समाज में रहते हुए लोग क्या अनिवार्य रूप से लोकतांत्रिक और उदारवादी हो सकते हैं? क्या इंसान का मिजाज ऐसा हो सकता है कि वे धर्म, जाति, रंग, संस्कृति और इलाके के भेदभाव को नीचे रखकर लोकतंत्र की समानतावादी, बहुलतावादी उदारता को ऊपर मान सकें? यह बात कुछ मुश्किल दिखती है। एक तरफ तो जब यह लगता है कि दुनिया उदारता की तरफ बढ़ रही है तब दूसरी तरफ यह भी दिखता है कि भौतिक विकास के साथ भी, उसके बाद भी, संपन्नता और शिक्षा के बाद भी कट्टरता, धर्मांधता और नफरत में कमी नहीं आ रही है। इसका एक मतलब यह भी है कि तमाम किस्म की पढ़ाई-लिखाई और तमाम किस्म के कामकाज मिलकर भी लोगों को लोकतंत्र की बुनियादी सोच न समझा पा रहे हैं और न उससे सहमत करा पा रहे हैं। आज भी हिन्दुस्तान में ऐसा सोचने वाले और बोलने वाले लोग मिल जाते हैं जो खुलकर कहते हैं कि जब पाकिस्तान बन गया तो यहां के मुसलमान वहां चले क्यों नहीं गए? इसी किस्म की सांप्रदायिक और नस्लवादी नफरत दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में कई लोगों के बारे में हमेशा ही कायम रहती है।
अब सवाल यह है कि इस नौबत का इलाज क्या है? कोई आसान रास्ता यहां पर नहीं दिखता, सिवाय इसके कि एक तरफ तो लोगों में विविधता के लिए सहनशीलता बढ़ती चले, और दूसरी तरफ इस विविधता के भीतर रहते हुए अलग-अलग तबकों के लोग अपनी पहचान को एक गैरजरूरी आक्रामकता के साथ, जिद के साथ सड़कों पर फैलाने से परहेज करें। विविधता की सारी सोच उस वक्त नाकामयाब हो जाती है जब लोग विविधता के बीच अपनी-अपनी पहचान सबसे ऊपर रखने पर अड़े रहते हैं और अपने अधिकारों को दूसरों के अधिकारों के ऊपर लादने को अपनी लोकतांत्रिक आजादी मान लेते हैं। यह सिलसिला बदलना आसान इसलिए नहीं है कि नफरत में लोगों को जोड़कर रखने का मजबूत गोंद रहता है। जब किसी तर्क की बात की जाती है, इंसाफ की बात की जाती है तो उसमें धर्मांधता, कट्टरता और नफरत की तरह की उत्तेजना नहीं होती। बिना सनसनी वाले अमनचैन के तर्क पिछड़ जाते हैं। दुनिया के देशों की राजनीतिक व्यवस्था, शासन व्यवस्था और समाज की उदारता में मदद की जिम्मेदारी पूरी किए बिना अगर कोई तबका सिर्फ अपने अधिकारों का दावा करते हुए उन्माद के नारे लगाते रहेगा तो उसके खिलाफ जगह-जगह एक ऐसी हिंसा खड़ी हो सकेगी जिसे कि संविधान में रखी गई उदारता भी नहीं बचा पाएगी। धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रदर्शन एक तरफ तो हर तबके का अधिकार है लेकिन दूसरी तरफ इंसानों की बिरादरी ऐसे प्रदर्शन को बर्दाश्त करने के लिए तैयार भी नहीं है। इसलिए किस तरह इस प्रदर्शन को कम रखा जा सकता है और किस तरह बर्दाश्त को बढ़ाया जा सकता है इस धीमे सिलसिले को जारी रखने के बारे में सोचना चाहिए।
नार्वे में दो दिन पहले एक कट्टर संकीर्णतावादी, माक्र्सवाद विरोधी, इस्लाम विरोधी, गोरे-यूरोपियन-ईसाई नौजवान ने जिस तरह एक लंबा घोषणापत्र लिखने के बाद नब्बे से अधिक लोगों को मार डाला उससे पश्चिम में कट्टरपंथ के एक नए सैलाब की तरफ लोगों का ध्यान गया है। यह कोई नई बात नहीं है और ऐसी घटनाएं बीच-बीच में उन तमाम देशों में सामने आती हैं जहां पर लोकतंत्र की विचारधारा उदारता के नए पैमाने गढऩे में लगी रहती हैं। यह उदारता हालांकि एक पश्चिमी सोच के अनुकूल उदारता ही रहती है लेकिन वह है तो उदारता ही। और मानो इस उदारता के अनुपात में ही उसके साथ-साथ कट्टरता भी जवाब देने के अंदाज में बढ़ते जा रही है। दो-चार दिन पहले ही जर्मनी में हिटलर के एक सहयोगी की कब्र को खोदा गया और उसकी हड्डियां निकालकर, उन्हें जलाकर उसकी राख को फेंक दिया गया और उस कब्र को मिटा दिया गया। इसके पीछे तर्क यह था कि जर्मनी में पनप और बढ़ रहे नवनाजीवाद के हिंसक समर्थक इस कब्र को तीर्थ की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और उससे जर्मनी में राजनीतिक उदारता की हवा खराब हो रही थी। अमरीका की तमाम गुंडागर्दी को अनदेखा न करते हुए भी हम यहां पर इस बात की चर्चा करना चाहेंगे कि उसने ओसामा बिन लादेन की कब्र कहीं बनने नहीं दी ताकि उसके प्रशंसक वहां पर कोई तीर्थ न बना डालें।
योरप और अमरीका में लगातार लोकतंत्र के तहत सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा दिया गया। पूरी दुनिया से आए हुए लोगों के धर्मों को जगह दी गई और कहीं-कहीं पर सरकारों के कुछ ऐसे फैसले भी रहे जो किसी धर्म के लोगों को हमले की तरह लगे लेकिन वे हमले थे नहीं। जैसे फ्रांस ने हाल ही में बुर्के पर रोक लगाने का फैसला लिया और इसे मुसलमानों ने अपने धार्मिक अधिकारों और अपनी संस्कृति पर हमला माना। लेकिन फ्रांस का तर्क मुस्लिम महिला के बुनियादी मानवाधिकारों का था जो कि बुर्के में कैद दिखते थे। इस पर बहस अभी चल ही रही है कि नार्वे में इस ताजा हमलावर ने पन्द्रह सौ पेज के अपने नफरत के घोषणापत्र में सांस्कृतिक विविधता, इस्लाम और माक्र्सवाद पर हमले को सही ठहराया है। यह नफरत कुछ जगहों पर हिंसा की हद तक दिखती है और बहुत सी जगहों पर संकीर्णतावादी, सांस्कृतिक शुद्धतावादी, और दक्षिणपंथी कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की चुनावी जीत की शक्ल में अहिंसक सी दिखती है। एक के बाद एक बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर कट्टरवादी लोग या उनके करीब समझे जाने वाले लोग चुनाव जीत रहे हैं।
हम दुनिया के भविष्य के लिए आतंक और हिंसा को उतना खतरनाक नहीं मानते जितना कि कट्टरवादी अहिंसक लोगों को मानते हैं। ऐसा इसलिए कि किसी भी देश में हिंसक अपराधियों को पकड़कर पूरी जिंदगी के लिए जेल में डालने का इंतजाम हो सकता है लेकिन जब ऐसी विचारधारा के करीब के राजनीतिक दल जनता के वोट पाकर सत्ता में आते हैं तो फिर वे हिटलर की तरह जीतकर संसद में पहुंचे हुए लोग भी होते हैं और उनकी जीत का एक मतलब यह भी निकाल लिया जाता है कि जनता ने उनकी हिंसा पर मंजूरी की मोहर लगा दी है। लेकिन अपनी इस सोच के साथ भी हम यह चर्चा करना चाहेंगे कि क्या दुनिया की अलग-अलग लोकतांत्रिक और उदारवादी शासन-व्यवस्था और समाज में रहते हुए लोग क्या अनिवार्य रूप से लोकतांत्रिक और उदारवादी हो सकते हैं? क्या इंसान का मिजाज ऐसा हो सकता है कि वे धर्म, जाति, रंग, संस्कृति और इलाके के भेदभाव को नीचे रखकर लोकतंत्र की समानतावादी, बहुलतावादी उदारता को ऊपर मान सकें? यह बात कुछ मुश्किल दिखती है। एक तरफ तो जब यह लगता है कि दुनिया उदारता की तरफ बढ़ रही है तब दूसरी तरफ यह भी दिखता है कि भौतिक विकास के साथ भी, उसके बाद भी, संपन्नता और शिक्षा के बाद भी कट्टरता, धर्मांधता और नफरत में कमी नहीं आ रही है। इसका एक मतलब यह भी है कि तमाम किस्म की पढ़ाई-लिखाई और तमाम किस्म के कामकाज मिलकर भी लोगों को लोकतंत्र की बुनियादी सोच न समझा पा रहे हैं और न उससे सहमत करा पा रहे हैं। आज भी हिन्दुस्तान में ऐसा सोचने वाले और बोलने वाले लोग मिल जाते हैं जो खुलकर कहते हैं कि जब पाकिस्तान बन गया तो यहां के मुसलमान वहां चले क्यों नहीं गए? इसी किस्म की सांप्रदायिक और नस्लवादी नफरत दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में कई लोगों के बारे में हमेशा ही कायम रहती है।
अब सवाल यह है कि इस नौबत का इलाज क्या है? कोई आसान रास्ता यहां पर नहीं दिखता, सिवाय इसके कि एक तरफ तो लोगों में विविधता के लिए सहनशीलता बढ़ती चले, और दूसरी तरफ इस विविधता के भीतर रहते हुए अलग-अलग तबकों के लोग अपनी पहचान को एक गैरजरूरी आक्रामकता के साथ, जिद के साथ सड़कों पर फैलाने से परहेज करें। विविधता की सारी सोच उस वक्त नाकामयाब हो जाती है जब लोग विविधता के बीच अपनी-अपनी पहचान सबसे ऊपर रखने पर अड़े रहते हैं और अपने अधिकारों को दूसरों के अधिकारों के ऊपर लादने को अपनी लोकतांत्रिक आजादी मान लेते हैं। यह सिलसिला बदलना आसान इसलिए नहीं है कि नफरत में लोगों को जोड़कर रखने का मजबूत गोंद रहता है। जब किसी तर्क की बात की जाती है, इंसाफ की बात की जाती है तो उसमें धर्मांधता, कट्टरता और नफरत की तरह की उत्तेजना नहीं होती। बिना सनसनी वाले अमनचैन के तर्क पिछड़ जाते हैं। दुनिया के देशों की राजनीतिक व्यवस्था, शासन व्यवस्था और समाज की उदारता में मदद की जिम्मेदारी पूरी किए बिना अगर कोई तबका सिर्फ अपने अधिकारों का दावा करते हुए उन्माद के नारे लगाते रहेगा तो उसके खिलाफ जगह-जगह एक ऐसी हिंसा खड़ी हो सकेगी जिसे कि संविधान में रखी गई उदारता भी नहीं बचा पाएगी। धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रदर्शन एक तरफ तो हर तबके का अधिकार है लेकिन दूसरी तरफ इंसानों की बिरादरी ऐसे प्रदर्शन को बर्दाश्त करने के लिए तैयार भी नहीं है। इसलिए किस तरह इस प्रदर्शन को कम रखा जा सकता है और किस तरह बर्दाश्त को बढ़ाया जा सकता है इस धीमे सिलसिले को जारी रखने के बारे में सोचना चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें