11 जुलाई 2011
भारत की सरकारी विमान सेवाओं, इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया को मिलाकर भारत सरकार ने एक तो कर दिया लेकिन इन दोनों का ऐसा बदहाल बनाकर रखा है कि आगे-पीछे इनके बिकने की नौबत अगर आ जाए तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि एनडीए सरकार के वक्त भाजपा की केंद्रीय मंत्री अरूण शौरी मुंबई के एक बड़े सरकारी होटल को बाजार भाव के एक बड़े छोटे से हिस्से के एवज में बेच देने के आरोप से घिरे थे और बाद में वह होटल खरीदने वाले ने दूसरे को वह होटल कई गुना अधिक पर बेच दिया था। सरकारी उपक्रमों के बेचने का यह सिलसिला छत्तीसगढ़ में भी भुगता जहां पर बाल्को को मिट्टी के मोल अनिल अग्रवाल को दे दिया गया।
एक उदार बाजार व्यवस्था के नाम पर सरकार धीरे-धीरे अपने हाथ तमाम किस्म के जरूरी कारोबार से भी खींच ले रही है जिसमें हम टेलीफोन कंपनियों को देख रहे हैं, सड़कों और पुलों को देख रहे हैं, विमान सेवाओं को देख रहे हैं और शहरों में बिजली सप्लाई, पानी सप्लाई जैसी जरूरतों को भी देख रहे हैं। निजीकरण का यह सिलसिला एक तरफ तो सरकारी कारोबार में, सरकारी सेवाओं में छा चुके भारी भ्रष्टाचार, कामचोरी को कम करने में मददगार हुआ क्योंकि निजी कंपनियां एक मुकाबला खड़ा करके सार्वजनिक उपक्रमों को भी काम करने के लिए मजबूर करने लगीं। लेकिन हमने यह भी देखा कि टेलीफोन या बैंक जैसे कुछ क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रम निजी क्षेत्रों के मुकाबले खड़े रहने और बचे रहने में कामयाब रहे। देश का सबसे बड़ा उद्योग, सरकार का इस्पात कारोबार सेल, मंदी के भी पूरे दौर को झेल गया। हम यहां पर एक अर्थशास्त्री की तरह इतनी बारीकी में जाना नहीं चाहते कि सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के बचने या बढऩे के पीछे कौन-कौन सी बातें जिम्मेदार रहीं। लेकिन हम यहां यह चर्चा करना जरूर चाहते हैं कि सरकारी कारखानों या उपक्रमों को एक साजिश के तहत डुबाकर निजी क्षेत्र को सीधा-सीधा फायदा पहुंचाने की सरकारी नीयत पर क्या किया जाना चाहिए?
देश के जानकार तबकों का ऐसा अंदाज है कि सरकार में बैठा एक तबका वहां रहते हुए ही अपनी दूकान को आग लगाकर सड़क के दूसरी तरफ लगी एक निजी दूकान को फायदा पहुंचाने की साजिश में हिस्सेदार करके कैसे कमाता है। हमने यह देश के सबसे बड़े इस्पात कारखाने में देखा है कि किस तरह वहां का मुखिया निजी कारखाने के लोगों को अपनी खूबियां दिखाते चलता है और इसके बाद रातों-रात उठकर वह उस निजी कारखाने का अफसर बन जाता है। इसलिए आज जब सरकारी विमान सेवा इंडियन या एयर इंडिया की तरफ से बार-बार यह खबर आती है कि केंद्र सरकार उसके बकाया हजारों करोड़ का भुगतान नहीं कर रही है और इस वजह से उसे पेट्रोलियम कंपनियां आगे उधार पेट्रोल नहीं दे रही हैं, और इस वजह से वह पायलटों को तनख्वाह नहीं दे पा रही है और वे नौकरी छोड़कर जा रहे हैं, तो लगता है कि इसके पीछे जरूर कोई साजिश होगी। दरअसल इस देश की सरकारों मेें जब-जब अनाप-शनाप भ्रष्टाचार सामने आता है तो लोगों को यह साफ लगता है कि उन सरकारों के बाकी काम में भी ऐसी ही साजिश होगी। मनमोहन सिंह सरकार की साख आज गटर में जाकर कीचड़ में फंसी हुई है। इसलिए हमें यह लगता है कि सरकारी विमान सेवा को बर्बाद करके निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के काम में सत्ता लगी हुई है। देश की सबसे बड़ी ऑडिट संस्था सीएजी ने एयरलाइंस को लेकर सरकार के तौर-तरीकों पर बड़ी आपत्ति की है और यह ध्यान रखने की बात है कि देश के कुछ ताजा सबसे बड़े भ्रष्टाचार सीएजी (कैग) के ही सामने लाए हुए हैं। सीएजी रिपोर्ट के बाद ही टू-जी घोटाला सामने आया और बहुत से दूसरे मामले भी। हम भारत सरकार की एयरलाइंस की बदहाली को मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में सरकारी बस सेवा की बदहाली से जोड़कर देखते हैं। इनका आपस में रिश्ता नहीं है लेकिन जिस तरह राज्य परिवहन निगम को अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त ही नेताओं और अफसरों ने निचोड़कर पी लिया था, उसी तरह आज देश की सरकारी विमान सेवा का हाल दिख रहा है। ऐसे में हमें एक पल के लिए बाबा रामदेव जैसे अलोकतांत्रिक लोगों की एक अलोकतांत्रिक बात भी लुभावनी लगती है कि भ्रष्टाचार के बड़े मामले में मौत की सजा भी होनी चाहिए। हम किसी भी मामले में मौत की सजा के खिलाफ हैं लेकिन एक विचार के रूप में हम सत्ता के सोचे-समझे, साजिश पर टिके भ्रष्टाचार को ऐसी ही सजा के लायक पाते हैं और इससे नीचे अगर पूरी उम्रकैद भी देश को लूटने वाले लोगों को हो तो फिर वह चौदह साल की न होकर मरने तक की होनी चाहिए।
देश भर में जगह-जगह सरकारी अस्पतालों को बदहाल करके निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का काम चल रहा है, सरकारी स्कूल-कॉलेज बदहाल किए जा रहे हैं ताकि निजी स्कूल-कॉलेज आगे बढ़ सकें। ऐसे कारोबार में सत्ता से लेकर मीडिया तक सबको प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी मिलती है। यह सिलसिला जांच एजेंसी, अदालत, अब तक ईमानदार बचा मीडिया का कुछ हिस्सा, संसद और विधानसभा, सतर्कता आयुक्त तक जो ले जा सके उसे ले जाना चाहिए और देश को और अधिक लुटने से बचाना चाहिए।
भारत की सरकारी विमान सेवाओं, इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया को मिलाकर भारत सरकार ने एक तो कर दिया लेकिन इन दोनों का ऐसा बदहाल बनाकर रखा है कि आगे-पीछे इनके बिकने की नौबत अगर आ जाए तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि एनडीए सरकार के वक्त भाजपा की केंद्रीय मंत्री अरूण शौरी मुंबई के एक बड़े सरकारी होटल को बाजार भाव के एक बड़े छोटे से हिस्से के एवज में बेच देने के आरोप से घिरे थे और बाद में वह होटल खरीदने वाले ने दूसरे को वह होटल कई गुना अधिक पर बेच दिया था। सरकारी उपक्रमों के बेचने का यह सिलसिला छत्तीसगढ़ में भी भुगता जहां पर बाल्को को मिट्टी के मोल अनिल अग्रवाल को दे दिया गया।
एक उदार बाजार व्यवस्था के नाम पर सरकार धीरे-धीरे अपने हाथ तमाम किस्म के जरूरी कारोबार से भी खींच ले रही है जिसमें हम टेलीफोन कंपनियों को देख रहे हैं, सड़कों और पुलों को देख रहे हैं, विमान सेवाओं को देख रहे हैं और शहरों में बिजली सप्लाई, पानी सप्लाई जैसी जरूरतों को भी देख रहे हैं। निजीकरण का यह सिलसिला एक तरफ तो सरकारी कारोबार में, सरकारी सेवाओं में छा चुके भारी भ्रष्टाचार, कामचोरी को कम करने में मददगार हुआ क्योंकि निजी कंपनियां एक मुकाबला खड़ा करके सार्वजनिक उपक्रमों को भी काम करने के लिए मजबूर करने लगीं। लेकिन हमने यह भी देखा कि टेलीफोन या बैंक जैसे कुछ क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रम निजी क्षेत्रों के मुकाबले खड़े रहने और बचे रहने में कामयाब रहे। देश का सबसे बड़ा उद्योग, सरकार का इस्पात कारोबार सेल, मंदी के भी पूरे दौर को झेल गया। हम यहां पर एक अर्थशास्त्री की तरह इतनी बारीकी में जाना नहीं चाहते कि सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के बचने या बढऩे के पीछे कौन-कौन सी बातें जिम्मेदार रहीं। लेकिन हम यहां यह चर्चा करना जरूर चाहते हैं कि सरकारी कारखानों या उपक्रमों को एक साजिश के तहत डुबाकर निजी क्षेत्र को सीधा-सीधा फायदा पहुंचाने की सरकारी नीयत पर क्या किया जाना चाहिए?
देश के जानकार तबकों का ऐसा अंदाज है कि सरकार में बैठा एक तबका वहां रहते हुए ही अपनी दूकान को आग लगाकर सड़क के दूसरी तरफ लगी एक निजी दूकान को फायदा पहुंचाने की साजिश में हिस्सेदार करके कैसे कमाता है। हमने यह देश के सबसे बड़े इस्पात कारखाने में देखा है कि किस तरह वहां का मुखिया निजी कारखाने के लोगों को अपनी खूबियां दिखाते चलता है और इसके बाद रातों-रात उठकर वह उस निजी कारखाने का अफसर बन जाता है। इसलिए आज जब सरकारी विमान सेवा इंडियन या एयर इंडिया की तरफ से बार-बार यह खबर आती है कि केंद्र सरकार उसके बकाया हजारों करोड़ का भुगतान नहीं कर रही है और इस वजह से उसे पेट्रोलियम कंपनियां आगे उधार पेट्रोल नहीं दे रही हैं, और इस वजह से वह पायलटों को तनख्वाह नहीं दे पा रही है और वे नौकरी छोड़कर जा रहे हैं, तो लगता है कि इसके पीछे जरूर कोई साजिश होगी। दरअसल इस देश की सरकारों मेें जब-जब अनाप-शनाप भ्रष्टाचार सामने आता है तो लोगों को यह साफ लगता है कि उन सरकारों के बाकी काम में भी ऐसी ही साजिश होगी। मनमोहन सिंह सरकार की साख आज गटर में जाकर कीचड़ में फंसी हुई है। इसलिए हमें यह लगता है कि सरकारी विमान सेवा को बर्बाद करके निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के काम में सत्ता लगी हुई है। देश की सबसे बड़ी ऑडिट संस्था सीएजी ने एयरलाइंस को लेकर सरकार के तौर-तरीकों पर बड़ी आपत्ति की है और यह ध्यान रखने की बात है कि देश के कुछ ताजा सबसे बड़े भ्रष्टाचार सीएजी (कैग) के ही सामने लाए हुए हैं। सीएजी रिपोर्ट के बाद ही टू-जी घोटाला सामने आया और बहुत से दूसरे मामले भी। हम भारत सरकार की एयरलाइंस की बदहाली को मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में सरकारी बस सेवा की बदहाली से जोड़कर देखते हैं। इनका आपस में रिश्ता नहीं है लेकिन जिस तरह राज्य परिवहन निगम को अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त ही नेताओं और अफसरों ने निचोड़कर पी लिया था, उसी तरह आज देश की सरकारी विमान सेवा का हाल दिख रहा है। ऐसे में हमें एक पल के लिए बाबा रामदेव जैसे अलोकतांत्रिक लोगों की एक अलोकतांत्रिक बात भी लुभावनी लगती है कि भ्रष्टाचार के बड़े मामले में मौत की सजा भी होनी चाहिए। हम किसी भी मामले में मौत की सजा के खिलाफ हैं लेकिन एक विचार के रूप में हम सत्ता के सोचे-समझे, साजिश पर टिके भ्रष्टाचार को ऐसी ही सजा के लायक पाते हैं और इससे नीचे अगर पूरी उम्रकैद भी देश को लूटने वाले लोगों को हो तो फिर वह चौदह साल की न होकर मरने तक की होनी चाहिए।
देश भर में जगह-जगह सरकारी अस्पतालों को बदहाल करके निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का काम चल रहा है, सरकारी स्कूल-कॉलेज बदहाल किए जा रहे हैं ताकि निजी स्कूल-कॉलेज आगे बढ़ सकें। ऐसे कारोबार में सत्ता से लेकर मीडिया तक सबको प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी मिलती है। यह सिलसिला जांच एजेंसी, अदालत, अब तक ईमानदार बचा मीडिया का कुछ हिस्सा, संसद और विधानसभा, सतर्कता आयुक्त तक जो ले जा सके उसे ले जाना चाहिए और देश को और अधिक लुटने से बचाना चाहिए।
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