14 जुलाई 2011
मुंबई में कल शाम हुए आतंकी लगते हमलों से जितना नुकसान वहां जिंदगियों और इंसानी जिस्म का हुआ है उससे कहीं अधिक नुकसान इस देश की पूरी जनता में सरकार की जिम्मेदारी के लिए भरोसे का हुआ है। लोगों की पहली नाराजगी उन बेचेहरा हमलावरों के खिलाफ भी नहीं है जिन्होंने दो दर्जन बेकसूर लोगों को मार डाला। लोगों की पहली नाराजगी सरकार के खिलाफ है कि वह पिछले मुंबई हमलों के बाद अब फिर हुए इन हमलों को रोक नहीं पाई और जनता की हिफाजत करने की अपनी जिम्मेदारी को वह पूरा नहीं कर पा रही है। सरकार चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की, और आज की तारीख में महाराष्ट्र के मामले में ये दोनों सरकारें एक ही गठबंधन की हैं, उनका ऐसे मौकों पर जनता के सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं होता। और यह भी एक समझदारी की बात है कि जांच शुरू होते ही, उसके चलते हुए मंत्री, मुख्यमंत्री किसी अटकलबाजी में नहीं उलझ रहे। यह हरकत भारत के भीतर के किसी आतंकी संगठन से लेकर किसी दूसरे देश के आतंकी संगठन तक, भारत के किसी अपराध माफिया से लेकर पड़ोस के किसी देश की सरकार तक, किसी की भी की हुई हो सकती है, इसलिए जांच के पहले शक जाहिर करना ठीक नहीं है।
लेकिन मुंबई में जिन लोगों के चेहरे जाने-पहचाने हैं वे बहुत निराश हैं। नामीगिरामी लोग ऐसे मौके के बाद की शांति की अपील को खारिज कर रहे हैं और नेताओं को जूता मारने का आव्हान भी कर रहे हैं। कल ही मुंबई के सब्र का बांध तब टूटने लगा जब कुछ प्रमुख लोगों ने कसाब को तुरंत ही फांसी पर टांग देने की सार्वजनिक मांग की, मानो इससे हमले थम जाएंगे और मानो हिन्दुस्तान एक तानाशाही हो जहां पर कि अदालती तरीके को कूड़ेदान में फेंककर कसाब को फांसी लगाई जा सकती है। यह बात सही है कि लोग आतंकी हमलों से थक गए हैं और वे आगे ऐसे किसी भी और हमले को देखना नहीं चाहते। लेकिन देश के भीतर और देश के बाहर बाकी दुनिया में भी अमनचैन स्थाई नहीं रहती। बहुत से देशों में आतंक की घटनाएं होते रहती हैं और लगातार चौकसी के बाद भी होती हैं। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि पिछले मुंबई हमले ढाई बरस पहले हुए थे और तब से सुरक्षा के इंतजाम बढ़ाकर बहुत सी साजिशों को नाकाम किया गया। हम इस बात को इसलिए अहमियत दे रहे हैं क्योंकि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के कामकाज तब तक लोगों की नजरों में नहीं आते हैं जब तक वे कामयाब रहते हैं। उनकी नाकामयाबी ही लोगों की नजरों में आती है। समंदर के घिरे और रोजाना शायद एक करोड़ बाहरी लोगों को झेलने वाले मुंबई शहर में अगर पिछले ढाई बरस वहां की सरकार ने कोई और आतंकी हमला नहीं होने दिया तो हम इसे छोटी कामयाबी नहीं मानते। यह याद रखने की जरूरत है कि भारत की इस कारोबारी राजधानी से रोजाना दसियों हजार ट्रकों की आवाजाही होती है और देश का सबसे बड़ा कारोबार भी यहां होता है ऐसे में हर मिनट यहां पहुंचने वाले हजारों लोगों पर नजर रखते हुए भी अगर महाराष्ट्र की सरकार ने पिछले ढाई बरस बिना किसी बड़ी आतंकी घटना के निकाल दिए तो हम उसकी तारीफ भी इस मौके पर करेंगे जबकि देश का लगभग हर तबका सरकारों को कोसने में लगा हुआ है। विकसित होता हुआ एक जिंदा देश किसी मिलिट्री कैंप की तरह घेरी हुई जिंदगी नहीं जी सकता। और फिर हमने बस्तर जैसे नक्सलग्रस्त इलाकों में भी यह देखा है कि संगीनों से घिरे हुए सुरक्षा कैम्पों पर भी कैसे नक्सल हमले थोक में जान ले सकते हैं। इसलिए मुंबई के इस हमले को तकलीफदेह मानते हुए भी हम इसे सरकार की बहुत बड़ी नाकामयाबी नहीं मानेंगे और घायल देश को यह याद दिलाना चाहेंगे कि हमलों से इतने लंबे समय तक मुंबई को बचाकर रखने को वे कम न आंकें। पड़ोस के जिस पाकिस्तान पर ऐसे हमलों को लेकर भारत में पहला शक खड़ा होता है, वहां के शहरों में हर दो-चार दिन में इससे बड़े धमाके हो रहे हैं और इससे अधिक लोग मारे जा रहे हैं। दुनिया के सबसे महफूज मुल्क अमरीका को देखें तो वहां कई अलग-अलग किस्म से बड़ी हिंसा की घटनाएं होती हैं। भारत के भीतर ही हम सिर्फ किसी धर्म या धर्मों से जोड़कर आतंक को नहीं देखना चाहते क्योंकि देश के दर्जन भर राज्यों में नक्सली आतंक रोजाना लहू बहा रहा है। अभी चार दिन पहले ही असम के एक आदिवासी संगठन ने एक मुसाफिर रेलगाड़ी को उड़ा दिया। इसलिए भारत में न तो आतंक सिर्फ पाकिस्तान से आता है और न ही सिर्फ मजहब पर टिका हुआ है। मध्यप्रदेश में तो भाजपा की सरकार के रहते हुए एक हिंदू साध्वी को एक ऐसे सुनील जोशी के कत्ल में गिरफ्तार किया है जो कि समझौता एक्सपे्रस विस्फोट कांड का संदिग्ध था। यह साध्वी 2008 में इसी महाराष्ट्र में माले गांव विस्फोट कांड की एक मुख्य अभियुक्त है।
भारत बहुत ही अस्थिर और अशांत, आतंकग्रस्त और आतंकी, अलोकतांत्रिक और धर्मांध, कट्टर और कमजोर देशों से घिरा हुआ है। इसकी समंदरी सरहद इतनी बड़ी है कि उसकी पूरी निगरानी अमरीका जैसा संपन्न और सक्षम देश भी न कर पाए क्योंकि उसके अपने देश में मैक्सिको से अपराधी रात-दिन नशे का धंधा सरहद में सेंध लगाकर करते ही रहते हैं। ऐसी समंदरी सरहद के फायदे अलग होते हैं लेकिन उसके नुकसान भी अपनी जगह रहते ही हैं। इसलिए भारत पर तरह-तरह के हमलों के खतरे बने ही रहेंगे। यहां पर यह समझने की भी जरूरत है कि सुरक्षा के इंतजाम आसमान तक के खर्च वाले नहीं किए जा सकते क्योंकि उस खर्च के लिए कहीं न कहीं से कटौती करके ही बजट निकालना होगा। इसलिए बिखरी हुई लाशों को देखकर आनन-फानन यह सोच लेना कि खुफिया निगरानी और चौकसी को एकदम बढ़ा देना चाहिए, यह भी एक संतुलित नजरिया नहीं होगा। साथ ही हमारा यह भी मानना है कि समाज को अपने भीतर सावधानी और निगरानी रखने का काम करना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना तनख्वाह वाली पुलिस बढ़ाते चलना बहुत महंगा रहेगा। सरकार के हिस्से हमको यह बात लगती है कि पुलिस का चेहरा उसे जनता के लिए दोस्ताना बनाना होगा क्योंकि आज इस देश में लोग पुलिस के नाम को बच्चों को डराने के लिए इस्तेमाल करते हैं। जिस दिन इस देश में पुलिस की ऐसी छवि रहेगी कि छोटे बच्चे भी किसी मुसीबत के वक्त मदद के लिए अकेले पुलिस के पास जा सकें, उस दिन सभी तरह के अपराधों और खतरों की जानकारी पुलिस को जनता से मिल सकेगी। एक दूसरी बात यह है कि सरकार चला रहे लोगों के प्रति जनता की आस्था इतनी कम हो गई है कि सरकार की मदद करना शायद ही कोई अपनी जिम्मेदारी समझे। ऐसे में भी एक लोकतांत्रिक देश खतरे में पड़ता है। लेकिन महाराष्ट्र और इस देश की चोर और बेईमान सरकारों को अपनी तस्वीर सुधारने का काम खुद ही करना पड़ेगा। अगर आज सरकारें लोकप्रिय रहतीं तो जनता इस तकलीफ को भी झेल लेती और सरकार के साथ खड़ी होती। लेकिन आज भारतीय लोकतंत्र में जनता की आस्था ऐसी नहीं बची है।
मुंबई के इस ताजा आतंकी हमले की चर्चा में हमने कुछ ऐसे दूसरे जरूरी पहलू भी छुए हैं जो हमें महत्वपूर्ण लगते हैं। हम जनता से चाहेंगे कि वे बिखरे हुए लहू और जख्मों को देखकर अपने तर्क न खोए और यह याद रखे कि अगर बिना किसी हमले मुंबई ने ढाई बरस निकाले हैं तो वह भी कोई छोटी बात नहीं थी, और कल शाम के हमले दुबारा न हों ऐसी कोशिश सरकार के साथ-साथ जनता को भी करनी होगी। फिलहाल सरकार के पाले में जांच, मुकदमे और सजा का जिम्मा बचता है जिसमें उसे कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहिए।
मुंबई में कल शाम हुए आतंकी लगते हमलों से जितना नुकसान वहां जिंदगियों और इंसानी जिस्म का हुआ है उससे कहीं अधिक नुकसान इस देश की पूरी जनता में सरकार की जिम्मेदारी के लिए भरोसे का हुआ है। लोगों की पहली नाराजगी उन बेचेहरा हमलावरों के खिलाफ भी नहीं है जिन्होंने दो दर्जन बेकसूर लोगों को मार डाला। लोगों की पहली नाराजगी सरकार के खिलाफ है कि वह पिछले मुंबई हमलों के बाद अब फिर हुए इन हमलों को रोक नहीं पाई और जनता की हिफाजत करने की अपनी जिम्मेदारी को वह पूरा नहीं कर पा रही है। सरकार चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की, और आज की तारीख में महाराष्ट्र के मामले में ये दोनों सरकारें एक ही गठबंधन की हैं, उनका ऐसे मौकों पर जनता के सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं होता। और यह भी एक समझदारी की बात है कि जांच शुरू होते ही, उसके चलते हुए मंत्री, मुख्यमंत्री किसी अटकलबाजी में नहीं उलझ रहे। यह हरकत भारत के भीतर के किसी आतंकी संगठन से लेकर किसी दूसरे देश के आतंकी संगठन तक, भारत के किसी अपराध माफिया से लेकर पड़ोस के किसी देश की सरकार तक, किसी की भी की हुई हो सकती है, इसलिए जांच के पहले शक जाहिर करना ठीक नहीं है।
लेकिन मुंबई में जिन लोगों के चेहरे जाने-पहचाने हैं वे बहुत निराश हैं। नामीगिरामी लोग ऐसे मौके के बाद की शांति की अपील को खारिज कर रहे हैं और नेताओं को जूता मारने का आव्हान भी कर रहे हैं। कल ही मुंबई के सब्र का बांध तब टूटने लगा जब कुछ प्रमुख लोगों ने कसाब को तुरंत ही फांसी पर टांग देने की सार्वजनिक मांग की, मानो इससे हमले थम जाएंगे और मानो हिन्दुस्तान एक तानाशाही हो जहां पर कि अदालती तरीके को कूड़ेदान में फेंककर कसाब को फांसी लगाई जा सकती है। यह बात सही है कि लोग आतंकी हमलों से थक गए हैं और वे आगे ऐसे किसी भी और हमले को देखना नहीं चाहते। लेकिन देश के भीतर और देश के बाहर बाकी दुनिया में भी अमनचैन स्थाई नहीं रहती। बहुत से देशों में आतंक की घटनाएं होते रहती हैं और लगातार चौकसी के बाद भी होती हैं। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि पिछले मुंबई हमले ढाई बरस पहले हुए थे और तब से सुरक्षा के इंतजाम बढ़ाकर बहुत सी साजिशों को नाकाम किया गया। हम इस बात को इसलिए अहमियत दे रहे हैं क्योंकि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के कामकाज तब तक लोगों की नजरों में नहीं आते हैं जब तक वे कामयाब रहते हैं। उनकी नाकामयाबी ही लोगों की नजरों में आती है। समंदर के घिरे और रोजाना शायद एक करोड़ बाहरी लोगों को झेलने वाले मुंबई शहर में अगर पिछले ढाई बरस वहां की सरकार ने कोई और आतंकी हमला नहीं होने दिया तो हम इसे छोटी कामयाबी नहीं मानते। यह याद रखने की जरूरत है कि भारत की इस कारोबारी राजधानी से रोजाना दसियों हजार ट्रकों की आवाजाही होती है और देश का सबसे बड़ा कारोबार भी यहां होता है ऐसे में हर मिनट यहां पहुंचने वाले हजारों लोगों पर नजर रखते हुए भी अगर महाराष्ट्र की सरकार ने पिछले ढाई बरस बिना किसी बड़ी आतंकी घटना के निकाल दिए तो हम उसकी तारीफ भी इस मौके पर करेंगे जबकि देश का लगभग हर तबका सरकारों को कोसने में लगा हुआ है। विकसित होता हुआ एक जिंदा देश किसी मिलिट्री कैंप की तरह घेरी हुई जिंदगी नहीं जी सकता। और फिर हमने बस्तर जैसे नक्सलग्रस्त इलाकों में भी यह देखा है कि संगीनों से घिरे हुए सुरक्षा कैम्पों पर भी कैसे नक्सल हमले थोक में जान ले सकते हैं। इसलिए मुंबई के इस हमले को तकलीफदेह मानते हुए भी हम इसे सरकार की बहुत बड़ी नाकामयाबी नहीं मानेंगे और घायल देश को यह याद दिलाना चाहेंगे कि हमलों से इतने लंबे समय तक मुंबई को बचाकर रखने को वे कम न आंकें। पड़ोस के जिस पाकिस्तान पर ऐसे हमलों को लेकर भारत में पहला शक खड़ा होता है, वहां के शहरों में हर दो-चार दिन में इससे बड़े धमाके हो रहे हैं और इससे अधिक लोग मारे जा रहे हैं। दुनिया के सबसे महफूज मुल्क अमरीका को देखें तो वहां कई अलग-अलग किस्म से बड़ी हिंसा की घटनाएं होती हैं। भारत के भीतर ही हम सिर्फ किसी धर्म या धर्मों से जोड़कर आतंक को नहीं देखना चाहते क्योंकि देश के दर्जन भर राज्यों में नक्सली आतंक रोजाना लहू बहा रहा है। अभी चार दिन पहले ही असम के एक आदिवासी संगठन ने एक मुसाफिर रेलगाड़ी को उड़ा दिया। इसलिए भारत में न तो आतंक सिर्फ पाकिस्तान से आता है और न ही सिर्फ मजहब पर टिका हुआ है। मध्यप्रदेश में तो भाजपा की सरकार के रहते हुए एक हिंदू साध्वी को एक ऐसे सुनील जोशी के कत्ल में गिरफ्तार किया है जो कि समझौता एक्सपे्रस विस्फोट कांड का संदिग्ध था। यह साध्वी 2008 में इसी महाराष्ट्र में माले गांव विस्फोट कांड की एक मुख्य अभियुक्त है।
भारत बहुत ही अस्थिर और अशांत, आतंकग्रस्त और आतंकी, अलोकतांत्रिक और धर्मांध, कट्टर और कमजोर देशों से घिरा हुआ है। इसकी समंदरी सरहद इतनी बड़ी है कि उसकी पूरी निगरानी अमरीका जैसा संपन्न और सक्षम देश भी न कर पाए क्योंकि उसके अपने देश में मैक्सिको से अपराधी रात-दिन नशे का धंधा सरहद में सेंध लगाकर करते ही रहते हैं। ऐसी समंदरी सरहद के फायदे अलग होते हैं लेकिन उसके नुकसान भी अपनी जगह रहते ही हैं। इसलिए भारत पर तरह-तरह के हमलों के खतरे बने ही रहेंगे। यहां पर यह समझने की भी जरूरत है कि सुरक्षा के इंतजाम आसमान तक के खर्च वाले नहीं किए जा सकते क्योंकि उस खर्च के लिए कहीं न कहीं से कटौती करके ही बजट निकालना होगा। इसलिए बिखरी हुई लाशों को देखकर आनन-फानन यह सोच लेना कि खुफिया निगरानी और चौकसी को एकदम बढ़ा देना चाहिए, यह भी एक संतुलित नजरिया नहीं होगा। साथ ही हमारा यह भी मानना है कि समाज को अपने भीतर सावधानी और निगरानी रखने का काम करना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना तनख्वाह वाली पुलिस बढ़ाते चलना बहुत महंगा रहेगा। सरकार के हिस्से हमको यह बात लगती है कि पुलिस का चेहरा उसे जनता के लिए दोस्ताना बनाना होगा क्योंकि आज इस देश में लोग पुलिस के नाम को बच्चों को डराने के लिए इस्तेमाल करते हैं। जिस दिन इस देश में पुलिस की ऐसी छवि रहेगी कि छोटे बच्चे भी किसी मुसीबत के वक्त मदद के लिए अकेले पुलिस के पास जा सकें, उस दिन सभी तरह के अपराधों और खतरों की जानकारी पुलिस को जनता से मिल सकेगी। एक दूसरी बात यह है कि सरकार चला रहे लोगों के प्रति जनता की आस्था इतनी कम हो गई है कि सरकार की मदद करना शायद ही कोई अपनी जिम्मेदारी समझे। ऐसे में भी एक लोकतांत्रिक देश खतरे में पड़ता है। लेकिन महाराष्ट्र और इस देश की चोर और बेईमान सरकारों को अपनी तस्वीर सुधारने का काम खुद ही करना पड़ेगा। अगर आज सरकारें लोकप्रिय रहतीं तो जनता इस तकलीफ को भी झेल लेती और सरकार के साथ खड़ी होती। लेकिन आज भारतीय लोकतंत्र में जनता की आस्था ऐसी नहीं बची है।
मुंबई के इस ताजा आतंकी हमले की चर्चा में हमने कुछ ऐसे दूसरे जरूरी पहलू भी छुए हैं जो हमें महत्वपूर्ण लगते हैं। हम जनता से चाहेंगे कि वे बिखरे हुए लहू और जख्मों को देखकर अपने तर्क न खोए और यह याद रखे कि अगर बिना किसी हमले मुंबई ने ढाई बरस निकाले हैं तो वह भी कोई छोटी बात नहीं थी, और कल शाम के हमले दुबारा न हों ऐसी कोशिश सरकार के साथ-साथ जनता को भी करनी होगी। फिलहाल सरकार के पाले में जांच, मुकदमे और सजा का जिम्मा बचता है जिसमें उसे कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहिए।
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