28 जुलाई 2011
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
कर्नाटक के मामले में अभी लिखने का पूरा मौका नहीं आया है लेकिन जो बातें अब तक सामने आ चुकी हैं वे आज सबसे जरूरी मुद्दा हैं इसलिए वहां की हलचल के बीच भी हम उस पर लिखना जरूरी समझ रहे हैं। पिछले दो दिनों में वहां के भयानक भ्रष्ट पाए गए मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के जो तेवर भाजपा ने दिल्ली में भुगते हैं, वे देखने लायक हैं। कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में लोहा खदानों से अवैध खुदाई से सरकार को होने वाले नुकसान का अंदाज सोलह हजार करोड़ रुपयों से अधिक का बताया है। यह आंकड़ा एक राज्य के एक विभाग के भ्रष्टाचार को देखते हुए पूरे देश में दूरसंचार घोटाले में लाख-दो लाख करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के आरोप के मुकाबले बहुत अधिक लगता है। कर्नाटक में यह आंकड़ा एक ऐसे लोकायुक्त की जांच के बाद सामने आया है जिसकी मौजूदगी वाली लोकपाल कमेटी का भाजपा तरह-तरह से साथ देते आई है। और ये लोकायुक्त कांगे्रस या यूपीए सरकार से लगातार टकराव के साथ भी चल रहे हैं इसलिए उनकी रिपोर्ट के पीछे कोई राजनीति नहीं देखी जा सकती। ऐसे में पिछले बरसों में जब लगातार इस मुख्यमंत्री के खिलाफ, उसके मंत्रियों के खिलाफ अंधाधुंध भ्रष्टाचार का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और अब अदालत इसकी निगरानी भी कर रही है, तो फिर हैरानी की बात यह है कि दिल्ली में बैठे हुए भाजपा के नेताओं ने अपने इस मुख्यमंत्री पर कार्रवाई क्यों नहीं की? हमारे पाठकों को अच्छी तरह याद होगा कि हमने दर्जनों बार यह लिखा है कि यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुप्पी साधे रहे तो वे भ्रष्टाचार में बराबरी के भागीदार रहे। और इसी बात को लेकर हमने बार-बार मनमोहन सिंह से इस्तीफे की भी मांग की और मंत्रिमंडल का मुखिया होने के नाते उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग भी हमने की। इतनी कड़ी मांग भाजपा ने भी नहीं की थी लेकिन हम नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी के ऊंचे पैमानों की उम्मीद सार्वजनिक जीवन में, खासकर सरकार चला रहे लोगों से करते हैं इसलिए हमने देश के विपक्ष के मुकाबले भी अधिक कड़ी मांग रखी। लेकिन आज जो नौबत कर्नाटक में सामने आई है और जिसमें वहां भाजपा का एक जाहिर तौर पर भ्रष्ट पाया गया मुख्यमंत्री एक दुस्साहस के साथ भाजपा पार्टी को ही चुनौती दे रहा है और ऐसी नौबत के बाद भी यह शर्त रख रहा है कि वह इस्तीफा तभी देगा जब पार्टी उसकी पसंद के एक नेता को मुख्यमंत्री बनाएगी, तो भाजपा के अपने कर्नाटक को लेकर भी अपनी खुद की ताकत को एक बार तौल लेने की नौबत आती है।
हम इसे भाजपा जैसी एक बड़ी पार्टी के लिए एक बड़ी असफलता इसलिए मानते हैं कि यह पार्टी आधी सदी से शुचिता नाम के एक शब्द का इस्तेमाल करते आई है जिसे लालकृष्ण अडवानी खासकर सार्वजनिक जीवन में साफ-सुथरे चाल-चलन के लिए कहते थे। फिर इस पार्टी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मार्गदर्शन मिलने की बात भी संघ और भाजपा के नेता जनसंघ के जमाने से करते आए हैं और मौजूदा भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तो संघ के स्वयं सेवक के रूप में अपने गर्व को बार-बार बताते भी हैं। आज हमारे सामने बीबीसी की वेबसाईट पर येदियुरप्पा की एक ऐसी तस्वीर है जिसमें वे संघ के कार्यक्रम में संघ की पोशाक में बैठे हैं। हमें मनमोहन सिंह की यूपीए-भ्रष्टाचार पर चुप्पी को लेकर जितनी शिकायत है, उससे कहीं अधिक शिकायत हमें संघ की ऐसे मुख्यमंत्री को लेकर चुप्पी पर है, क्योंकि कांगे्रस पार्टी तो बहुत अधिक शुचिता की कोई बात नहीं करती है लेकिन भाजपा के मार्गदर्शक संघ के लोग सादगी और ईमानदारी की बातें लगातार करते हैं। ऐसे में संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाले भी उससे यह उम्मीद करते थे कि भाजपा के एक इतने भयानक भ्रष्टाचार वाले मुख्यमंत्री, जो कि जाहिर तौर पर संघ से भी जुड़े हुए हैं, उन पर अदालती सजा की नौबत आने के पहले भी भाजपा और संघ मिलकर घर के भीतर एक कार्रवाई करने की पहल करेंगे। ऐसी कोई कार्रवाई कानूनी रूप से जरूरी नहीं थी लेकिन सार्वजनिक जीवन के मूल्यों और नैतिकता का यह साफ-साफ तकाजा था कि कर्नाटक की भयानक भ्रष्ट भाजपा सरकार पर समय रहते कार्रवाई करके भाजपा की बाकी सरकारों, बाकी पार्टी के लिए भी एक नसीहत चली जाती और कर्नाटक राज्य की जनता को इतने बेशर्म और भ्रष्ट नेताओं से राहत भी मिलती। लेकिन कर्नाटक की कितनी भी खबरें भाजपा को ऐसा फैसला लेने के लिए बेबस नहीं कर सकीं या फिर भाजपा इतना हौसला नहीं जुटा पाई।
पाठकों को यह भी याद होगा कि एक-दो बरस पहले जब लोहे की खदानों का भ्रष्टाचार ही सिर चढ़कर सामने आया था तब खदानों के सबसे बड़े अफरा-तफरी के मामले से जुड़े वहां के रेड्डी बंधुओं ने मंत्री रहते हुए इसी मुख्यमंत्री के खिलाफ एक ऐसा अभियान चलाया था जिसमें वहां के सारे भाजपा विधायक बाढ़ में डूबे अपने राज्य को छोड़कर दूसरे राज्य में रेड्डियों की सात सितारा मेहमाननवाजी पाते हुए दिल्ली की खिल्ली उड़ाते रहे। वह भी एक समय था जब भाजपा अपने संगठन के राजपाट के भीतर के इस बागी राज्य पर कोई कार्रवाई करती, लेकिन भाजपा ने उस वक्त भी वह मौका खो दिया, और आज तो नौबत और भी बिगड़ गई है जब एक चोर थानेदार की तैनाती पर अपनी मर्जी चला रहा है।
हमने पहले भी इस बात को कई बार लिखा था कि राजनीति में पैसों की ताकत की दखल अगर एक सीमा से अधिक बढ़ जाती है तो वह राजनीति लोकतंत्र की खाल खींचकर अपने जूते बनाने का काम करती है और कर्नाटक में भाजपा के मंत्री और मुख्यमंत्री ने एक-दूसरे से अपने टकराव को खत्म करके, गिरोहबंदी करके यही किया था। इतना बड़ा पैसा, जिसमें से कुल सोलह हजार करोड़ रुपए के हिसाब-किताब तक लोकायुक्त पहुंच पाए हैं, यह पैसा भारतीय लोकतंत्र को खरीदने और बेचने के लिए काफी है। राजनीतिक दलों को, और भाजपा से अलग भी बाकी राजनीतिक दलों को, यह समझने की जरूरत है कि अगर वे खरबपति धंधेबाजों को पार्टी का सरगना बनाकर बिठा लेंगे तो कल के दिन लोकतांत्रिक राजनीति करने वाले लोग इन सरगनाओं के लिए सिर्फ दरी बिछाने और पानी पिलाने का काम करेंगे। संसद और देश की विधानसभाओं का विश्लेषण यह बताता है कि धीरे-धीरे करके इन सदनों में करोड़पतियों और अरबपतियों की मौजूदगी बढ़ते चली गई है। इससे एक तरफ तो देश के गरीबों के बारे में संसद और विधानसभाओं की समझ खोखली हो गई है और दूसरी तरफ ऐसे लोग लोकतंत्र के हर पहलू को खरीद लेने की ताकत वाले भी हो गए हैं। कल तक यह माना जाता था कि देश के अतिसंपन्न धंधेबाज नेताओं और अफसरों को खरीदने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज तो ऐसे धंधेबाज खुद नेता हो गए हैं, खुद सांसद हो गए हैं और खुद विधायक हो गए हैं। छोटे-छोटे म्युनिसिपल चुनावों को देखें तो उनमें करोड़पति उम्मीदवार एक-एक वार्ड पर दसियों लाख का पूंजी निवेश करके चुनाव जीत रहे हैं और जाहिर है कि वे अपनी भरपाई कहां से किस तरह से करते होंगे?
कर्नाटक के इस सिलसिले में देश की जनता के भीतर लोकतंत्र पर पिछले कुछ बरसों से चली आ रही अनास्था को और अधिक बढ़ा दिया है। यह खतरनाक नौबत आमजनता की जुबान में कई शक्लों में सामने आती है। कुछ लोगों का यह कहना है कि इससे तो अंगे्रजों का राज बेहतर था, कुछ का कहना है कि इससे तो फौज को देश दे देना बेहतर होगा और कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ऐसे देश में नक्सली नहीं आएंगे तो और कौन आएगा? हम केंद्र सरकार और कई राज्यों में चल रहे भयानक भ्र्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में आज जनता की निराशा को बताने में किसी नाटकीयता का इस्तेमाल नहीं कर रहे। एक तरफ खदानों की लूट है तो दूसरी तरफ धंधेबाजों के लिए सरकार किस तरह से गरीब किसानों की जमीनें लूटकर लोकतंत्र को दफन कर दे रही है यह उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक सामने आ रहा है जहां पर कि एक तानाशाह और जाहिर तौर पर भ्रष्ट मुख्यमंत्री सोते-जागते अपने-आपको एक दलित की बेटी कहते हुए लोकतांत्रिक रियायत की उम्मीद करते दिखती है। जिस तरह देश के गरीबों के साथ सत्ता की चली आ रही बेइंसाफी अदालतों में उजागर हो रही है वह बहुत भयानक है। हम न सिर्फ संघ और भाजपा से, बल्कि कांगे्रस और बसपा से भी, और बाकी पार्टियों से भी यह कहना चाहते हैं कि अपने-अपने चोर-बेईमानों को वे तुरंत सत्ता से बाहर करें, संगठन में हाशिए पर करें वरना यह लोकतंत्र एक बहुत नाजुक और खतरनाक दौर से गुजर रहा है। यह देश इतना बड़ा है कि इसमें कोई बगावत मुमकिन नहीं है, लेकिन जनता का दिल आज बगावत पर आ खड़ा हुआ है ऐसा अंदाज हमें लोगों से बात करके लगता है। कर्नाटक हमारे हिसाब से भाजपा के लिए आज तक की सबसे बड़ी नसीहत हो सकती है और अगर इसके सबक पार्टी ने नहीं लिए तो उसे इसका एक चुनावी नुकसान भी उठाना ही पड़ेगा। बहुत देर से और बहुत कम कार्रवाई करके भाजपा ने भारतीय लोकतंत्र के भीतर आज एक बैनर को उठाने का हक लगभग खो दिया है। कम से कम वह आगे सावधान रहे।
हम इसे भाजपा जैसी एक बड़ी पार्टी के लिए एक बड़ी असफलता इसलिए मानते हैं कि यह पार्टी आधी सदी से शुचिता नाम के एक शब्द का इस्तेमाल करते आई है जिसे लालकृष्ण अडवानी खासकर सार्वजनिक जीवन में साफ-सुथरे चाल-चलन के लिए कहते थे। फिर इस पार्टी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मार्गदर्शन मिलने की बात भी संघ और भाजपा के नेता जनसंघ के जमाने से करते आए हैं और मौजूदा भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तो संघ के स्वयं सेवक के रूप में अपने गर्व को बार-बार बताते भी हैं। आज हमारे सामने बीबीसी की वेबसाईट पर येदियुरप्पा की एक ऐसी तस्वीर है जिसमें वे संघ के कार्यक्रम में संघ की पोशाक में बैठे हैं। हमें मनमोहन सिंह की यूपीए-भ्रष्टाचार पर चुप्पी को लेकर जितनी शिकायत है, उससे कहीं अधिक शिकायत हमें संघ की ऐसे मुख्यमंत्री को लेकर चुप्पी पर है, क्योंकि कांगे्रस पार्टी तो बहुत अधिक शुचिता की कोई बात नहीं करती है लेकिन भाजपा के मार्गदर्शक संघ के लोग सादगी और ईमानदारी की बातें लगातार करते हैं। ऐसे में संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाले भी उससे यह उम्मीद करते थे कि भाजपा के एक इतने भयानक भ्रष्टाचार वाले मुख्यमंत्री, जो कि जाहिर तौर पर संघ से भी जुड़े हुए हैं, उन पर अदालती सजा की नौबत आने के पहले भी भाजपा और संघ मिलकर घर के भीतर एक कार्रवाई करने की पहल करेंगे। ऐसी कोई कार्रवाई कानूनी रूप से जरूरी नहीं थी लेकिन सार्वजनिक जीवन के मूल्यों और नैतिकता का यह साफ-साफ तकाजा था कि कर्नाटक की भयानक भ्रष्ट भाजपा सरकार पर समय रहते कार्रवाई करके भाजपा की बाकी सरकारों, बाकी पार्टी के लिए भी एक नसीहत चली जाती और कर्नाटक राज्य की जनता को इतने बेशर्म और भ्रष्ट नेताओं से राहत भी मिलती। लेकिन कर्नाटक की कितनी भी खबरें भाजपा को ऐसा फैसला लेने के लिए बेबस नहीं कर सकीं या फिर भाजपा इतना हौसला नहीं जुटा पाई।
पाठकों को यह भी याद होगा कि एक-दो बरस पहले जब लोहे की खदानों का भ्रष्टाचार ही सिर चढ़कर सामने आया था तब खदानों के सबसे बड़े अफरा-तफरी के मामले से जुड़े वहां के रेड्डी बंधुओं ने मंत्री रहते हुए इसी मुख्यमंत्री के खिलाफ एक ऐसा अभियान चलाया था जिसमें वहां के सारे भाजपा विधायक बाढ़ में डूबे अपने राज्य को छोड़कर दूसरे राज्य में रेड्डियों की सात सितारा मेहमाननवाजी पाते हुए दिल्ली की खिल्ली उड़ाते रहे। वह भी एक समय था जब भाजपा अपने संगठन के राजपाट के भीतर के इस बागी राज्य पर कोई कार्रवाई करती, लेकिन भाजपा ने उस वक्त भी वह मौका खो दिया, और आज तो नौबत और भी बिगड़ गई है जब एक चोर थानेदार की तैनाती पर अपनी मर्जी चला रहा है।
हमने पहले भी इस बात को कई बार लिखा था कि राजनीति में पैसों की ताकत की दखल अगर एक सीमा से अधिक बढ़ जाती है तो वह राजनीति लोकतंत्र की खाल खींचकर अपने जूते बनाने का काम करती है और कर्नाटक में भाजपा के मंत्री और मुख्यमंत्री ने एक-दूसरे से अपने टकराव को खत्म करके, गिरोहबंदी करके यही किया था। इतना बड़ा पैसा, जिसमें से कुल सोलह हजार करोड़ रुपए के हिसाब-किताब तक लोकायुक्त पहुंच पाए हैं, यह पैसा भारतीय लोकतंत्र को खरीदने और बेचने के लिए काफी है। राजनीतिक दलों को, और भाजपा से अलग भी बाकी राजनीतिक दलों को, यह समझने की जरूरत है कि अगर वे खरबपति धंधेबाजों को पार्टी का सरगना बनाकर बिठा लेंगे तो कल के दिन लोकतांत्रिक राजनीति करने वाले लोग इन सरगनाओं के लिए सिर्फ दरी बिछाने और पानी पिलाने का काम करेंगे। संसद और देश की विधानसभाओं का विश्लेषण यह बताता है कि धीरे-धीरे करके इन सदनों में करोड़पतियों और अरबपतियों की मौजूदगी बढ़ते चली गई है। इससे एक तरफ तो देश के गरीबों के बारे में संसद और विधानसभाओं की समझ खोखली हो गई है और दूसरी तरफ ऐसे लोग लोकतंत्र के हर पहलू को खरीद लेने की ताकत वाले भी हो गए हैं। कल तक यह माना जाता था कि देश के अतिसंपन्न धंधेबाज नेताओं और अफसरों को खरीदने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज तो ऐसे धंधेबाज खुद नेता हो गए हैं, खुद सांसद हो गए हैं और खुद विधायक हो गए हैं। छोटे-छोटे म्युनिसिपल चुनावों को देखें तो उनमें करोड़पति उम्मीदवार एक-एक वार्ड पर दसियों लाख का पूंजी निवेश करके चुनाव जीत रहे हैं और जाहिर है कि वे अपनी भरपाई कहां से किस तरह से करते होंगे?
कर्नाटक के इस सिलसिले में देश की जनता के भीतर लोकतंत्र पर पिछले कुछ बरसों से चली आ रही अनास्था को और अधिक बढ़ा दिया है। यह खतरनाक नौबत आमजनता की जुबान में कई शक्लों में सामने आती है। कुछ लोगों का यह कहना है कि इससे तो अंगे्रजों का राज बेहतर था, कुछ का कहना है कि इससे तो फौज को देश दे देना बेहतर होगा और कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ऐसे देश में नक्सली नहीं आएंगे तो और कौन आएगा? हम केंद्र सरकार और कई राज्यों में चल रहे भयानक भ्र्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में आज जनता की निराशा को बताने में किसी नाटकीयता का इस्तेमाल नहीं कर रहे। एक तरफ खदानों की लूट है तो दूसरी तरफ धंधेबाजों के लिए सरकार किस तरह से गरीब किसानों की जमीनें लूटकर लोकतंत्र को दफन कर दे रही है यह उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक सामने आ रहा है जहां पर कि एक तानाशाह और जाहिर तौर पर भ्रष्ट मुख्यमंत्री सोते-जागते अपने-आपको एक दलित की बेटी कहते हुए लोकतांत्रिक रियायत की उम्मीद करते दिखती है। जिस तरह देश के गरीबों के साथ सत्ता की चली आ रही बेइंसाफी अदालतों में उजागर हो रही है वह बहुत भयानक है। हम न सिर्फ संघ और भाजपा से, बल्कि कांगे्रस और बसपा से भी, और बाकी पार्टियों से भी यह कहना चाहते हैं कि अपने-अपने चोर-बेईमानों को वे तुरंत सत्ता से बाहर करें, संगठन में हाशिए पर करें वरना यह लोकतंत्र एक बहुत नाजुक और खतरनाक दौर से गुजर रहा है। यह देश इतना बड़ा है कि इसमें कोई बगावत मुमकिन नहीं है, लेकिन जनता का दिल आज बगावत पर आ खड़ा हुआ है ऐसा अंदाज हमें लोगों से बात करके लगता है। कर्नाटक हमारे हिसाब से भाजपा के लिए आज तक की सबसे बड़ी नसीहत हो सकती है और अगर इसके सबक पार्टी ने नहीं लिए तो उसे इसका एक चुनावी नुकसान भी उठाना ही पड़ेगा। बहुत देर से और बहुत कम कार्रवाई करके भाजपा ने भारतीय लोकतंत्र के भीतर आज एक बैनर को उठाने का हक लगभग खो दिया है। कम से कम वह आगे सावधान रहे।
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