10 जुलाई 2011
उत्तरप्रदेश में बसपा की देश की अकेली नेता और राज्य की मुख्यमंत्री मायावती के तेवर तो हमेशा से हमलावर रहते आए हैं लेकिन मानो वहां चुनाव में अपनी खोई हुई जमीन को थोड़ा-बहुत वापिस पाने की हड़बड़ी में कांगे्रस ने भी अपने सबसे बड़े प्रचारक राहुल गांधी को झोंक दिया है। इन दोनों पार्टियों और नेताओं के बीच जिस दर्जे की कड़वाहट वहां फैल गई है वह उत्तरप्रदेश की रोज की जिंदगी और वहां के लोकतंत्र के हिसाब से अच्छी नहीं है। लोकतंत्र जिन-जिन बातों से तबाह होता है उन तमाम बातों से मीडिया चटपटा, सनसनीखेज और बिकाऊ बनता है इसलिए उसकी तो एक धंधे की बाजारू-मजबूरी या धंधे की रणनीति रहती है कि यह कड़वाहट बढ़ती चले। लेकिन हम संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक दलों के बीच ऐसी कड़वाहट या केंद्र और राज्य पर राज कर रही पार्टियों के बीच सांप और नेवले सरीखी कही जाने वाली ऐसी तनातनी को नासमझी भी मानते हैं और बददिमागी भी। लेकिन ऐसी ही तनातनी तमिलनाडू में जयललिता और करूणानिधि के बीच है, ममता और वामपंथियों के बीच पूरे वक्त रही, लालू यादव और नितिश कुमार के बीच चलती रही। इससे इन नेताओं की क्षेत्रीयता से उपजे अहंकार को तो गुदगुदी मिलती है लेकिन जनता का बहुत बड़ा नुकसान होता है। लोकतंत्र में संसदीय विपक्ष का काम रात-दिन सत्ता पर हमले करने का नहीं रहता बल्कि एक ऐसी रचनात्मक और सकारात्मक चौकसी का रहता है जिससे कि सत्ता की गड़बडिय़ां थम सकें। लेकिन जब रिश्ते इस कदर कड़वे हो जाते हैं कि आपसी बातचीत ही बंद हो जाती है और लोग सिर्फ भौंकने के अंदाज में एक-दूसरे से बात करने लगते हैं।
हम इस बात की चर्चा आज यहां इसलिए कर रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों में तो ऐसे अहंकार आसानी से पनप जाते हैं क्योंकि वहां पार्टियां देश और दुनिया की व्यापक सोच के बिना भी अपनी चुनावी राजनीति एक राज्य में चला लेती हैं। ऊपर हमने जितने नाम गिनाए हैं उनमें से कोई भी एक राज्य से परे की राजनीति वाला नहीं है, सिवाय कांगे्रस के। इसलिए जो पार्टी अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहती है उसे देश की राजनीतिक हवा को साफ-सुथरा बनाए रखने का एक अधिक बड़ा जिम्मा भी निभाना चाहिए क्योंकि उसके पास एक लंबा-चौड़ा अनुभव होता है और उससे लोकतंत्र एक परिपक्व दरियादिली की उम्मीद भी करता है। हम कई दूसरे मामलों में भी खासकर कांगे्रस पार्टी और लगे हाथों भाजपा से भी कुछ उम्मीदें करते हैं और लिखते आए हैं। इन पार्टियों से हम एक आचार संहिता बनाने और अपने लोगों पर लागू करने की बात कई बार लिख चुके हैं क्योंकि लोकतंत्र में कोई बात कानूनी रूप से जरूरी चाहे न हो उसकी एक लोकतांत्रिक जिम्मेदारी बड़ी पार्टियों पर तो आती ही है क्योंकि वे अपने-आपको राष्ट्रीय दल कहती हैं।
कांगे्रस पार्टी में मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और ए.के. एंटोनी जैसे कुछ ऐसे व्यवहार में सज्जन लोग तो हैं ही जिनसे खुद उनकी पार्टी के लोग बयानबाजी और लड़ाई में सज्जनता की कुछ प्रेरणा पा सकते हैं। हम चाहेंगे कि ऐसे लोग भारत की लोकतांत्रिक राजनीति से गंदगी, नफरत और हिंसा की बातों को दूर करने की पहल करें। इस बारे में हम भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी या लाल कृष्ण अडवानी का नाम भी लेना चाहेंगे जो आम तौर पर बहुत ही संतुलित और संसदीय जुबान में दूसरी पार्टियों या नेताओं के बारे में बात करते हैं और अभी कुछ महीने पहले की ही बात याद पड़ती है कि अडवानी ने अपने एक अन्यायपूर्ण-आक्रामक बयान के लिए सोनिया गांधी से चि_ी लिखकर माफी भी मांग ली थी और इससे उनका कद कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ गया। और सोनिया गांधी की तरफ से भी इस माफीनामे को अधिक कुरेदा नहीं गया था। हमारा मानना है कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच विश्वसनीयता रखने वाले कोई व्यक्ति अगर बड़ी पार्टियों के नेताओं को एक जगह चाय पर बुलाकर ऐसी अपील करे तो हो सकता है कि राजनीति से गंदगी कुछ हद तक कम हो। हम यहां पर देश के कुछ प्रमुख कारखानेदारों और कारोबारियों द्वारा कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री को लिखी गई एक चि_ी का जिक्र करना चाहेंगे जिसमें उन्होंने प्रशासन को सुधारने और भ्रष्टाचार कम करने की अपील की थी। ऐसी विश्वसनीयता वाले लोग अगर सार्वजनिक जीवन से गंदगी घटाने की अपील मीडिया से भी करेंगे तो हो सकता है कि उसका भी कुछ असर हो। एक आचार संहिता किसी भी तबके से निकलकर सामने आ सकती है और हो सकता है कि बाद में राजनीतिक दल उस पर बात करने को तैयार हों। हालांकि अन्ना और बाबा के अनुभव के बाद राजनीतिक दल आसानी से किसी गैरराजनीतिक तबके से बातचीत को शायद तैयार न हों लेकिन इन हादसों से सबक लेकर आगे तो बढऩा ही होगा। अन्ना और बाबा जैसे लोगों के बजाय राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों से बात करना चाहिए जिनकी कि लोकतंत्र पर आस्था अपने-आपको महिमामंडित करने से अधिक हो।
उत्तरप्रदेश में जितनी कड़वाहट अभी राजनीतिक दलों के बीच है, वह पूरी तरह से गैरजरूरी भी है। कोई मतदाता गंदगी से प्रभावित होकर वोट नहीं देता। अब वक्त देश के साफ-सुथरे और परिवक्व लोगों की दखल का है जो कि पार्टियों और नेताओं के हाथों और जुबान से कीचड़ अलग कर सकें।
उत्तरप्रदेश में बसपा की देश की अकेली नेता और राज्य की मुख्यमंत्री मायावती के तेवर तो हमेशा से हमलावर रहते आए हैं लेकिन मानो वहां चुनाव में अपनी खोई हुई जमीन को थोड़ा-बहुत वापिस पाने की हड़बड़ी में कांगे्रस ने भी अपने सबसे बड़े प्रचारक राहुल गांधी को झोंक दिया है। इन दोनों पार्टियों और नेताओं के बीच जिस दर्जे की कड़वाहट वहां फैल गई है वह उत्तरप्रदेश की रोज की जिंदगी और वहां के लोकतंत्र के हिसाब से अच्छी नहीं है। लोकतंत्र जिन-जिन बातों से तबाह होता है उन तमाम बातों से मीडिया चटपटा, सनसनीखेज और बिकाऊ बनता है इसलिए उसकी तो एक धंधे की बाजारू-मजबूरी या धंधे की रणनीति रहती है कि यह कड़वाहट बढ़ती चले। लेकिन हम संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक दलों के बीच ऐसी कड़वाहट या केंद्र और राज्य पर राज कर रही पार्टियों के बीच सांप और नेवले सरीखी कही जाने वाली ऐसी तनातनी को नासमझी भी मानते हैं और बददिमागी भी। लेकिन ऐसी ही तनातनी तमिलनाडू में जयललिता और करूणानिधि के बीच है, ममता और वामपंथियों के बीच पूरे वक्त रही, लालू यादव और नितिश कुमार के बीच चलती रही। इससे इन नेताओं की क्षेत्रीयता से उपजे अहंकार को तो गुदगुदी मिलती है लेकिन जनता का बहुत बड़ा नुकसान होता है। लोकतंत्र में संसदीय विपक्ष का काम रात-दिन सत्ता पर हमले करने का नहीं रहता बल्कि एक ऐसी रचनात्मक और सकारात्मक चौकसी का रहता है जिससे कि सत्ता की गड़बडिय़ां थम सकें। लेकिन जब रिश्ते इस कदर कड़वे हो जाते हैं कि आपसी बातचीत ही बंद हो जाती है और लोग सिर्फ भौंकने के अंदाज में एक-दूसरे से बात करने लगते हैं।
हम इस बात की चर्चा आज यहां इसलिए कर रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों में तो ऐसे अहंकार आसानी से पनप जाते हैं क्योंकि वहां पार्टियां देश और दुनिया की व्यापक सोच के बिना भी अपनी चुनावी राजनीति एक राज्य में चला लेती हैं। ऊपर हमने जितने नाम गिनाए हैं उनमें से कोई भी एक राज्य से परे की राजनीति वाला नहीं है, सिवाय कांगे्रस के। इसलिए जो पार्टी अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहती है उसे देश की राजनीतिक हवा को साफ-सुथरा बनाए रखने का एक अधिक बड़ा जिम्मा भी निभाना चाहिए क्योंकि उसके पास एक लंबा-चौड़ा अनुभव होता है और उससे लोकतंत्र एक परिपक्व दरियादिली की उम्मीद भी करता है। हम कई दूसरे मामलों में भी खासकर कांगे्रस पार्टी और लगे हाथों भाजपा से भी कुछ उम्मीदें करते हैं और लिखते आए हैं। इन पार्टियों से हम एक आचार संहिता बनाने और अपने लोगों पर लागू करने की बात कई बार लिख चुके हैं क्योंकि लोकतंत्र में कोई बात कानूनी रूप से जरूरी चाहे न हो उसकी एक लोकतांत्रिक जिम्मेदारी बड़ी पार्टियों पर तो आती ही है क्योंकि वे अपने-आपको राष्ट्रीय दल कहती हैं।
कांगे्रस पार्टी में मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और ए.के. एंटोनी जैसे कुछ ऐसे व्यवहार में सज्जन लोग तो हैं ही जिनसे खुद उनकी पार्टी के लोग बयानबाजी और लड़ाई में सज्जनता की कुछ प्रेरणा पा सकते हैं। हम चाहेंगे कि ऐसे लोग भारत की लोकतांत्रिक राजनीति से गंदगी, नफरत और हिंसा की बातों को दूर करने की पहल करें। इस बारे में हम भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी या लाल कृष्ण अडवानी का नाम भी लेना चाहेंगे जो आम तौर पर बहुत ही संतुलित और संसदीय जुबान में दूसरी पार्टियों या नेताओं के बारे में बात करते हैं और अभी कुछ महीने पहले की ही बात याद पड़ती है कि अडवानी ने अपने एक अन्यायपूर्ण-आक्रामक बयान के लिए सोनिया गांधी से चि_ी लिखकर माफी भी मांग ली थी और इससे उनका कद कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ गया। और सोनिया गांधी की तरफ से भी इस माफीनामे को अधिक कुरेदा नहीं गया था। हमारा मानना है कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच विश्वसनीयता रखने वाले कोई व्यक्ति अगर बड़ी पार्टियों के नेताओं को एक जगह चाय पर बुलाकर ऐसी अपील करे तो हो सकता है कि राजनीति से गंदगी कुछ हद तक कम हो। हम यहां पर देश के कुछ प्रमुख कारखानेदारों और कारोबारियों द्वारा कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री को लिखी गई एक चि_ी का जिक्र करना चाहेंगे जिसमें उन्होंने प्रशासन को सुधारने और भ्रष्टाचार कम करने की अपील की थी। ऐसी विश्वसनीयता वाले लोग अगर सार्वजनिक जीवन से गंदगी घटाने की अपील मीडिया से भी करेंगे तो हो सकता है कि उसका भी कुछ असर हो। एक आचार संहिता किसी भी तबके से निकलकर सामने आ सकती है और हो सकता है कि बाद में राजनीतिक दल उस पर बात करने को तैयार हों। हालांकि अन्ना और बाबा के अनुभव के बाद राजनीतिक दल आसानी से किसी गैरराजनीतिक तबके से बातचीत को शायद तैयार न हों लेकिन इन हादसों से सबक लेकर आगे तो बढऩा ही होगा। अन्ना और बाबा जैसे लोगों के बजाय राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों से बात करना चाहिए जिनकी कि लोकतंत्र पर आस्था अपने-आपको महिमामंडित करने से अधिक हो।
उत्तरप्रदेश में जितनी कड़वाहट अभी राजनीतिक दलों के बीच है, वह पूरी तरह से गैरजरूरी भी है। कोई मतदाता गंदगी से प्रभावित होकर वोट नहीं देता। अब वक्त देश के साफ-सुथरे और परिवक्व लोगों की दखल का है जो कि पार्टियों और नेताओं के हाथों और जुबान से कीचड़ अलग कर सकें।
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