22 जुलाई 2011
आठ महीने की कड़ी मेहनत के बाद ईरान की महिला फुटबॉल टीम आज रो रही है क्योंकि फुटबॉल को नियंत्रित करने वाले संगठन फीफा ने उन्हें बदन को ढांके रहने वाली पोशाक में खेलने की इजाजत नहीं दी है। इस बात को कुछ हफ्ते हो गए हैं लेकिन मुस्लिम परंपराओं और खेल की अंतरराष्ट्रीय पोशाक का यह टकराव इससे परे दूसरे कई खेलों तक जारी है। लंदन में 2012 में होने वाले ओलंपिक में कई खेलों में यह दिक्कत आने जा रही है। दुनिया के कुछ देश जहां महिलाओं के खुले बदन के आदी हैं और जहां के समाज में नग्नता को लेकर एक अलग किस्म की उदारता है उनके पैमानों को जब मुस्लिम देशों पर भी थोपने की कोशिश होती है तो देशों से परे यह बेइंसाफी मुस्लिम महिलाओं के साथ भी होती है जो कि अपने-अपने दायरे में आगे बढऩे की कोशिश कर रही हैं। हम खेल के ऐसे नियमों को पूरी तरह गैरजरूरी और बोगस मानते हैं जिनसे किसी एक टीम को दूसरी टीम पर एक नाजायज कायदा न मिलने पर भी उस पर रोक लगाई जाती है। अधिक कपड़ों के साथ अगर किसी देश की टीम खेलती है तो उसका तो मतलब यही है कि वह कम कपड़ों में खेल रही टीम के मुकाबले नुकसान में रहेगी। इसके बाद भी किसी देश के रीति-रिवाजों को अनदेखा करके इस तरह की ज्यादती करना हम सिर्फ खेल नहीं मानते। हम इसे पश्चिमी देशों की सोच को, उनके तौर-तरीकों को बाकी देशों पर थोपने की जिद भी मानते हैं। और इससे भी अधिक हमारा यह मानना है कि बाजार में तरह-तरह के फैशन के सामान बनाने वाली कंपनियों की यह साजिश है कि खेल में महिलाओं के बदन अधिक से अधिक उघड़े रहें और उनकी फैशन के नाम पर सामान अधिक बिक सकें। हर बरस विंबलडन में महिलाओं खिलाडिय़ों के छोटे-छोटे कपड़े बड़ी-बड़ी खबरों का सामान बनते हैं। खेल-फैशन के कारोबारी बहुत कोशिश करके ऐसे कपड़ों को छोटा करवाते हैं और ऐसी खबरों को बड़ा करवाते हैं। ऐसे में जाहिर है कि बाजार की यह ताकत अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों के फैसलों को उसी तरह प्रभावित करती है जिस तरह भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान करोड़ों के भ्रष्टाचार के लिए कलमाड़ी ने फैसले लिए या बदले।
खेलों की प्रायोजक कंपनियां खेल संगठनों पर बहुत सा दबाव रखती हैं। भारत में भी महिला बैडमिंटन खिलाडिय़ों के कपड़ों को लेकर कुछ महीने पहले एक विवाद छिड़ा था जिसमें उनके लिए छोटी स्कर्ट पहनना जरूरी किया गया था और जाहिर है कि ऐसी पोशाक कुछ लड़कियों को या उनके परिवार और उनकी बिरादरी को खटकती हैं। इसलिए हमारा यह मानना है कि खेल संगठनों को न्यूनतम कपड़ों की सीमा तो तय करनी चाहिए कि उससे कम कोई न पहन सके, लेकिन अधिकतम कपड़ों की कोई सीमा तय करने की जरूरत इसलिए नहीं है कि अधिक कपड़ों के साथ खिलाड़ी अगर अपने समाज के कायदों को मानते हैं और खेल में नुकसान झेलते हैं तो यह उनकी अपनी मर्जी की बात होनी चाहिए। दरअसल पश्चिम के ताकतवर देशों के काबू में जितने भी किस्म के संगठन रहते हैं वे पूरी दुनिया को पश्चिम के सांचे में ढालकर ऐसी नौबत बनाए रखना चाहते हैं जिससे कि पश्चिम के कारोबारी फायदे में रहे और पश्चिम की संस्कृति ही धीरे-धीरे पूरे दुनिया की संस्कृति बनती चली जाए। यह सिलसिला दुनिया की विविधता के खिलाफ है और अमरीका की विस्तारवादी नीति का ही एक नमूना है। फुटबॉल के मामले में जो खबरें हैं उनमें यह है कि पिछले कुछ महीनों से फीफा के मुखिया के चुनाव में और 2022 के विश्वकप के कतार में होने के चयन के मामले में लंबी-चौड़ी रिश्वत का खेल चला है। जाहिर है कि ऐसी रिश्वत की रकम देने की ताकत खेल और फैशन की कंपनियां रखती हैं, और उनका खेल संगठनों पर उसी तरह का कब्जा रहता है जिस तरह का कब्जा दवा कंपनियों का डॉक्टरों पर रहता है। हमारा यह मानना है कि फीफा पर नस्लवादी और महिला के खिलाफ आक्रामक होने के जो आरोप लग रहे हैं वे बिल्कुल ठीक हैं और इस संगठन ने ऐसा ही बर्ताव किया है जिससे कि मुस्लिम देशों की लड़कियां इस खेल में आगे न आ सकें। हम इस बात को बिल्कुल फिजूल मानते हैं कि किसी खेल को खेलने के लिए एक ही किस्म की पोशाक होनी चाहिए। अपने देशों में मुस्लिम लड़कियां वहां के कट्टरवादी लोगों की लगाई तरह-तरह की रोक से बरसों से जूझती आ रही हैं। उससे उबरकर वे किसी तरह खेल के मैदान में पहुंचती हैं तो वहां एक नए किस्म की रोक दुनिया का वह हिस्सा उन पर थोप रहा है जो अपने-आपके उदारवादी और लोकतांत्रिक होने का दावा करता है। यह संस्कृतियों का टकराव नहीं है, दुनिया में असर रखने वाली एक संस्कृति की यह दूसरी संस्कृति पर गुंडागर्दी है। इस सिलसिले के खिलाफ दुनिया में आवाज उठनी चाहिए।
आठ महीने की कड़ी मेहनत के बाद ईरान की महिला फुटबॉल टीम आज रो रही है क्योंकि फुटबॉल को नियंत्रित करने वाले संगठन फीफा ने उन्हें बदन को ढांके रहने वाली पोशाक में खेलने की इजाजत नहीं दी है। इस बात को कुछ हफ्ते हो गए हैं लेकिन मुस्लिम परंपराओं और खेल की अंतरराष्ट्रीय पोशाक का यह टकराव इससे परे दूसरे कई खेलों तक जारी है। लंदन में 2012 में होने वाले ओलंपिक में कई खेलों में यह दिक्कत आने जा रही है। दुनिया के कुछ देश जहां महिलाओं के खुले बदन के आदी हैं और जहां के समाज में नग्नता को लेकर एक अलग किस्म की उदारता है उनके पैमानों को जब मुस्लिम देशों पर भी थोपने की कोशिश होती है तो देशों से परे यह बेइंसाफी मुस्लिम महिलाओं के साथ भी होती है जो कि अपने-अपने दायरे में आगे बढऩे की कोशिश कर रही हैं। हम खेल के ऐसे नियमों को पूरी तरह गैरजरूरी और बोगस मानते हैं जिनसे किसी एक टीम को दूसरी टीम पर एक नाजायज कायदा न मिलने पर भी उस पर रोक लगाई जाती है। अधिक कपड़ों के साथ अगर किसी देश की टीम खेलती है तो उसका तो मतलब यही है कि वह कम कपड़ों में खेल रही टीम के मुकाबले नुकसान में रहेगी। इसके बाद भी किसी देश के रीति-रिवाजों को अनदेखा करके इस तरह की ज्यादती करना हम सिर्फ खेल नहीं मानते। हम इसे पश्चिमी देशों की सोच को, उनके तौर-तरीकों को बाकी देशों पर थोपने की जिद भी मानते हैं। और इससे भी अधिक हमारा यह मानना है कि बाजार में तरह-तरह के फैशन के सामान बनाने वाली कंपनियों की यह साजिश है कि खेल में महिलाओं के बदन अधिक से अधिक उघड़े रहें और उनकी फैशन के नाम पर सामान अधिक बिक सकें। हर बरस विंबलडन में महिलाओं खिलाडिय़ों के छोटे-छोटे कपड़े बड़ी-बड़ी खबरों का सामान बनते हैं। खेल-फैशन के कारोबारी बहुत कोशिश करके ऐसे कपड़ों को छोटा करवाते हैं और ऐसी खबरों को बड़ा करवाते हैं। ऐसे में जाहिर है कि बाजार की यह ताकत अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों के फैसलों को उसी तरह प्रभावित करती है जिस तरह भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान करोड़ों के भ्रष्टाचार के लिए कलमाड़ी ने फैसले लिए या बदले।
खेलों की प्रायोजक कंपनियां खेल संगठनों पर बहुत सा दबाव रखती हैं। भारत में भी महिला बैडमिंटन खिलाडिय़ों के कपड़ों को लेकर कुछ महीने पहले एक विवाद छिड़ा था जिसमें उनके लिए छोटी स्कर्ट पहनना जरूरी किया गया था और जाहिर है कि ऐसी पोशाक कुछ लड़कियों को या उनके परिवार और उनकी बिरादरी को खटकती हैं। इसलिए हमारा यह मानना है कि खेल संगठनों को न्यूनतम कपड़ों की सीमा तो तय करनी चाहिए कि उससे कम कोई न पहन सके, लेकिन अधिकतम कपड़ों की कोई सीमा तय करने की जरूरत इसलिए नहीं है कि अधिक कपड़ों के साथ खिलाड़ी अगर अपने समाज के कायदों को मानते हैं और खेल में नुकसान झेलते हैं तो यह उनकी अपनी मर्जी की बात होनी चाहिए। दरअसल पश्चिम के ताकतवर देशों के काबू में जितने भी किस्म के संगठन रहते हैं वे पूरी दुनिया को पश्चिम के सांचे में ढालकर ऐसी नौबत बनाए रखना चाहते हैं जिससे कि पश्चिम के कारोबारी फायदे में रहे और पश्चिम की संस्कृति ही धीरे-धीरे पूरे दुनिया की संस्कृति बनती चली जाए। यह सिलसिला दुनिया की विविधता के खिलाफ है और अमरीका की विस्तारवादी नीति का ही एक नमूना है। फुटबॉल के मामले में जो खबरें हैं उनमें यह है कि पिछले कुछ महीनों से फीफा के मुखिया के चुनाव में और 2022 के विश्वकप के कतार में होने के चयन के मामले में लंबी-चौड़ी रिश्वत का खेल चला है। जाहिर है कि ऐसी रिश्वत की रकम देने की ताकत खेल और फैशन की कंपनियां रखती हैं, और उनका खेल संगठनों पर उसी तरह का कब्जा रहता है जिस तरह का कब्जा दवा कंपनियों का डॉक्टरों पर रहता है। हमारा यह मानना है कि फीफा पर नस्लवादी और महिला के खिलाफ आक्रामक होने के जो आरोप लग रहे हैं वे बिल्कुल ठीक हैं और इस संगठन ने ऐसा ही बर्ताव किया है जिससे कि मुस्लिम देशों की लड़कियां इस खेल में आगे न आ सकें। हम इस बात को बिल्कुल फिजूल मानते हैं कि किसी खेल को खेलने के लिए एक ही किस्म की पोशाक होनी चाहिए। अपने देशों में मुस्लिम लड़कियां वहां के कट्टरवादी लोगों की लगाई तरह-तरह की रोक से बरसों से जूझती आ रही हैं। उससे उबरकर वे किसी तरह खेल के मैदान में पहुंचती हैं तो वहां एक नए किस्म की रोक दुनिया का वह हिस्सा उन पर थोप रहा है जो अपने-आपके उदारवादी और लोकतांत्रिक होने का दावा करता है। यह संस्कृतियों का टकराव नहीं है, दुनिया में असर रखने वाली एक संस्कृति की यह दूसरी संस्कृति पर गुंडागर्दी है। इस सिलसिले के खिलाफ दुनिया में आवाज उठनी चाहिए।
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