लाशों के लहू से पोस्टर बनाना

15 जुलाई 2011
कल जब राहुल गांधी ने यह कहा कि देश में आतंकी हमले 99 फीसदी रोके जा चुके हैं लेकिन एक फीसदी हमले हो भी सकते हैं, तो कांगे्रस विरोधी नेता और ओवरटाईम कर रहा लगभग तमाम मीडिया इस नौजवान पर टूट पड़ा मानो इसने कोई अपराध कर दिया। ये आंकड़े किसी रिपोर्ट पर आधारित नहीं हैं और यह बात करने का एक तरीका है जिसमें कोई हालात को बयां करता है। और अगर कोई यह कहता है कि एक फीसदी खतरा तो हमेशा ही बना रहेगा तो क्या यह गलत या झूठ बात है? हम तो इस बात को एक पाखंड मानेंगे कि देश की कोई भी सरकार, कोई भी प्रदेश यह दावा करे कि उसकी जमीन पर एक फीसदी भी खतरा नहीं रह गया है या नहीं रहने दिया जाएगा। ऐसा दावा तो रूस और जापान के परमाणु बिजलीघर नहीं कर पाए, ऐसा दावा तो ब्रिटेन की टेलीफोन कंपनियां नहीं कर पाईं जो कि आज हैकिंग की खबरों के चलते खबरों में है, ऐसा दावा तो अमरीका अपने तमाम इंतजाम के बाद न्यूयॉर्क के विश्व व्यापार केंद्र की इमारतों पर हमले के पहले या हमले के बाद नहीं कर पाया, ऐसा दावा तो आज भी भारत में किसी राज्य की सरकार, किसी भी पार्टी की सरकार नहीं कर सकती। फिर राहुल गांधी ने अगर एक फीसदी खतरे के बने रह जाने की बात कही है तो क्या आज की राजनीति एक इंसान से महज फर्जी और झूठे बयान की उम्मीद करती है? क्या राहुल गांधी किसी तिजोरी-कंपनी की तरह की कोई गारंटी और वारंटी की बात करते तो आज के नेताओं को भला लगता? या फिर सिर्फ विरोध करने के नाम पर किसी की कही हुई एक बहुत साधारण और सच्ची बात को लेकर उसके खिलाफ काटने को दौडऩा लोकतांत्रिक राजनीति है?
हमें तो मौकापरस्त नेताओं से अधिक शिकायत नहीं है जो कि लहू से भीगी लाश  में ब्रश डुबाकर अपने पोस्टर बनाने में जुट जाते हैं या फिर जलती लाशों पर रोटियां सेंकने लगते हैं। लेकिन हमें अधिक शिकायत उस मीडिया से है जो रात-दिन अपने काम में शायद पचास फीसदी की चूक करता है, और जिसकी नीयत शायद पचास फीसदी से भी अधिक गड़बड़ रहती है। क्या कोई अखबार कभी भी यह दावा कर सकता है कि उसकी भाषा, उसके तथ्य और उसकी सुर्खियों में एक फीसदी की गलती भी नहीं रहेगी? क्या रात-दिन अपने बुलेटिनों में गलत तस्वीरों, झूठी जानकारियों और मूर्खता की टिप्पणियों वाले टीवी समाचार चैनलों में से कोई भी निन्यानवे फीसदी सही सच का दावा कर सकता है? क्या आज राहुल पर लाठी लेकर पिल पडऩे वाले नेताओं में से कोई भी ऐसा है जो यह कह सके कि उसकी पार्टी में एक फीसदी भी  चोर-बेईमान नहीं हैं? और दुनिया में न सिर्फ सरकार को बल्कि किसी कारखाने के कामकाज में कब और कौन यह दावा कर सकता है कि उससे एक फीसदी भी गलती नहीं होगी?
हमने कल ही इस जगह लिखा है कि हम ढाई बरस तक मुंबई को किसी हमले से बचाने को छोटी कामयाबी नहीं मानते। हम छत्तीसगढ़ में रहते हुए यह देख रहे हैं कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तमाम वर्दियां और बंदूकें मिलकर अपनी अधिक से अधिक कोशिश के बावजूद हर महीने दर्जनों जानें खो रही हैं। क्या छत्तीसगढ़ को लेकर यहां की भाजपा सरकार या केंद्र की कांगे्रस अगुवाई की सरकार यह दावा कर सकती हैं कि नक्सल मोर्चे पर निन्यानवे फीसदी कामयाबी रहेगी? इसलिए यह बात हमें तकलीफदेह लगी कि राहुल गांधी के बयान पर नेताओं, पार्टियों और मीडिया ने ऐसे ओछेपन से काम किया है कि लाशों के लहू से राहुल मुर्दाबाद के बैनर बनाए गए हों। यह सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और जब देश पर, बेकसूर जनता पर देश के भीतर से या सरहद के पार से हमला होता है तो लोगों को ओछेपन को छोड़कर बड़प्पन की बात करनी चाहिए। और हम इस बड़प्पन से यह कहना नहीं चाहते कि सरकार को उसकी नाकामयाबी या उसकी खामी के लिए झिड़का न जाए, उसे कटघरे में खड़ा न किया जाए। लेकिन अगर ढाई बरसों तक किसी हमले से मुंबई को बचाने में कामयाबी के बाद अगर एक हमला ऐसा हुआ है और उसे लेकर एक फीसदी की रियायत भी कांगे्रस पार्टी के साथ नहीं की जा रही है तो फिर दर्जन भर सेंचुरी के बाद एक बार शून्य पर आऊट हो जाने पर सचिन तेंदुलकर को टीम से बाहर ही निकाल देना चाहिए।
हम सार्वजनिक जीवन में किसी भी तबके द्वारा ओछापन दिखाने के खिलाफ रहते हैं। और जब मुंबई में लाशें बिखरी हुई हैं तब बयानबाजी में कुतर्क करने वाले लोगों को हम किसी भी तरह से माफी का हकदार नहीं मानते। देश के दुख-दर्द के मौके पर ऐसी राजनीति को हम पूरी तरह से सिद्धांतहीन मानते हैं जिनमें कोई यह साबित करने की कोशिश करे कि उसकी सरकार रहने पर एक फीसदी खामी भी नहीं रह जाएगी। भाजपा के सारे बयान क्या आज देश को यह याद नहीं दिला रहे कि कंधार से हिंदुस्तानी हवाई-मुसाफिरों को छुड़ाकर लाने के लिए भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवानी के गृह मंत्री रहते हुए किस तरह आतंकियों को तश्तरी में सजाकर ले जाकर विमान अपहरणकर्ताओं को तोहफा दिया गया था? वह नाकामयाबी एक फीसदी थी या दस फीसदी थी या पचास फीसदी थी?
अगर किसी को मुंबई के इस मौके पर भी राजनीति करनी ही थी तो उन्हें पिछले दस-बीस बरसों के देश के और प्रदेशों के आंकड़े निकालकर यह साबित करना था कि उनकी पार्टी के राज में आतंक की घटनाएं एक फीसदी भी नहीं बच गई हैं। ऐसान करके अगर कोई यह सोचता है कि राहुल गांधी के बहाने कांगे्रस के भविष्य पर हमला करने का यह एक मौका मिला है तो हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि यह मरहम और कंधा देने का मौका है, घटिया राजनीति करने का नहीं।

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