20 जुलाई 2011
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने नोट के बदले वोट के संसद के भ्रष्टाचार पर आनन-फानन कार्रवाई शुरू की और देश के एक सबसे बड़े सत्ता के दलाल अमर सिंह के एक सहयोगी को गिरफ्तार किया गया और ऐसे आसार हैं कि आजकल में अमर सिंह सहित कुछ दूसरे बड़े लोगों की बारी आ सकती है। एक दूसरी घटना में मुंबई हाईकोर्ट ने वहां के एक पत्रकार की हत्या की जांच को सीबीआई को देने की अपील को खारिज कर दिया, इस मामले में मुंबई पुलिस वहां के माफिया के कई लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है और हथियार भी बरामद कर चुकी है। पूरे देश में जगह-जगह मामलों को सीबीआई को देने के लिए कोई सड़कों पर है तो कोई अदालत में। हो सकता है कि राज्य की पुलिस स्थानीय सरकार के दबाव में सत्तारूढ़ पार्टी या सरकार के लोगों के खिलाफ कोई जांच न कर पाए, लेकिन सीबीआई के मत्थे आखिर टोकरी कितनी भरी जा सकती है?
इस मुद्दे पर लिखने की बात हमें अभी इसलिए सूझी कि लंदन से बीबीसी की एक खबर है कि वहां संसद की एक कमेटी के मुखिया ने कहा है कि अगर पुलिस को नए साधन-सुविधा और क्षमता नहीं दिए गए तो फोन हैकिंग के चल रहे मामले की जांच पूरी होने में बरसों लग जाएंगे। हमने पिछले महीने भर में एक से अधिक बार यह लिखा है कि पुलिस या जांच एजेंसियों पर जब कोई अतिरिक्त दबाव इस बात को लेकर रहता है कि वह तेजी से अपराधियों को पकड़े तो उसकी जांच कई बार सही नहीं हो पाती और कई बार बेकसूर लोग पकड़कर पेश कर दिए जाते हैं ताकि धरना और जुलूस बंद हो जाएं। जब ब्रिटेन जैसे विकसित और तकनीकी क्षमता वाले देश में वहां की संसद और सरकार यह मान रही है कि हैकिंग की जांच में बरसों लग जाएंगे तो जाहिर है कि भारत में बहुत से मामलों की जांच में लंबा समय लग सकता है।
हम आज यहां पर कुछ बातों की सिर्फ चर्चा करके छोडऩा चाहते हैं ताकि लोग उन्हें आगे बढ़ा सकें। इन पर हमारी अपनी कोई आखिरी राय नहीं है लेकिन इस पर लोगों को राय जरूर बनाना चाहिए। एक तो देश और प्रदेश में सत्ता अपनी पसंद या नापसंद से बहुत से मामलों की जांच तेज या धीमी करने की तरकीब जानती हैं। और जब जांच तय भी होती है तो जांच एजेंसी की क्षमता शुरू से ही चुकी हुई रहती है। ऐसे में जब अदालत का डंडा पड़ता है तो तमाम कामों को रोककर पहले उन चुनिंदा मामलों की जांच की जाती है जिनकी निगरानी अदालतें खुद कर रही हैं। ऐसे में कम चर्चित मामले धरे रह जाते हैं और उनके शिकार लोगों को कोई इंसाफ नहीं मिल पाता। इसलिए देश में हो रहे अपराधों के अनुपात में जांच एजेंसियां की क्षमता बनाने की जरूरत है और मुकदमे के लिए अदालतों की क्षमता भी उसी हिसाब से बढ़ानी चाहिए। अभी मुंबई के धमाकों के बाद एक सवाल यह भी उठा कि देश को सबसे अधिक टैक्स देने वाले इस महानगर में फोरेंसिक जांच के लिए टीमों को हवाई जहाज से दिल्ली और हैदराबाद से भेजने की घोषणा केंद्रीय गृहमंत्री जब कर रहे थे तो वह गर्व की बात थी या शर्म की?
लेकिन यहां पर हम जांच और मुकदमे की नौबत से पहले की बात छेडऩा चाहते हैं जिस पर हम कई बार लिख चुके हैं। मुंबई विस्फोट की बात ही लें तो जैसा हमने बार-बार लिखा है, ढाई बरस तक अगर इस नाजुक और निशाने पर बैठे महानगर को आतंकी हमले से बचाकर रखा गया तो इसके पीछे खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों की कामयाबी रही। यह बचाना अधिक सस्ता पड़ा क्योंकि इतने बरसों में अगर कुछ और बार ऐसे हमले हुए होते तो उनसे जिंदगी और दौलत दोनों का बड़ा नुकसान हुआ होता। ऐसा ही हमारा मानना गैरआतंकी किस्म के बहुत से दूसरे अपराधों को लेकर है जिनसे देश को बचाने के लिए ऐसी खुफिया एजेंसियों की जरूरत है जो आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार, रिश्वत, मिलावट, नकली सामान जैसे बहुत से मामलों के शुरू होते ही तुरंत उसे पकडऩे की ताकत रखे। लंबे समय तक चोरी-डकैती चाहे सरकार में चले, चाहे सांसदों में चले और चाहे सरकारी ढांचे में चले, उससे जो नुकसान हो चुका रहता है वह बाद में न तो किसी भरपाई से लौटता और न ही ऐसे सभी मामलों में किसी को सजा हो पाती है। इसलिए इंसानी सेहत के मामले में जिस तरह बचाव ही सबसे अच्छा इलाज होता है, उसी तरह देश में अपराधों को पौधे की उम्र में ही खत्म कर देना अकेला रास्ता है। हम बार-बार देखते हैं कि तमाम अपराधों की जांच भी पुलिस या दूसरी एजेंसियां नहीं कर पातीं। जो सबसे कमजोर तबका होता है वह अपनी बेजुबानी के चलते कहीं यह चीख भी नहीं पाता कि बरसों से उसके मामले की जांच नहीं हुई है और हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट अपनी मर्जी के मामलों की जांच के लिए थानों में जाकर बैठे हैं। भारतीय न्याय-व्यवस्था तक पहुंचना भी देश की आबादी के शायद आधे हिस्से को नसीब भी नहीं हो सकता। इसलिए भारतीय शासन व्यवस्था में एक नई सोच के साथ अपराधों पर निगरानी और उनके शुरू के वक्त में ही उन पर कार्रवाई के लिए एजेंसी बनानी चाहिए। आज तो जब देश पूरा लुट चुका रहता है तब जाकर बरसों की अखबारबाजी और अदालत में लोगों की अर्जी के बाद उसकी जांच शुरू होती है। किसी के साथ पच्चीसवीं बार बलात्कार हो जाने के बाद, कुछ बरस बाद जाकर किसी को उसके लिए कटघरे में पहुंचाना किसी तरह का इंसाफ नहीं हो सकता। आज देश के साथ यही हो रहा है और चुनिंदा मामलों की जांच में एजेंसियों का अनुपातहीन समय लगने से बाकी तमाम जांच रूकी पड़ी हैं। इस तस्वीर को बदलने की जरूरत है और अपराधों के रोकथाम के काम में सुरक्षा एजेंसियों से अधिक खुफिया एजेंसियों को लगाने की जरूरत है और इसके लिए एक नया इंतजाम ही करना पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने नोट के बदले वोट के संसद के भ्रष्टाचार पर आनन-फानन कार्रवाई शुरू की और देश के एक सबसे बड़े सत्ता के दलाल अमर सिंह के एक सहयोगी को गिरफ्तार किया गया और ऐसे आसार हैं कि आजकल में अमर सिंह सहित कुछ दूसरे बड़े लोगों की बारी आ सकती है। एक दूसरी घटना में मुंबई हाईकोर्ट ने वहां के एक पत्रकार की हत्या की जांच को सीबीआई को देने की अपील को खारिज कर दिया, इस मामले में मुंबई पुलिस वहां के माफिया के कई लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है और हथियार भी बरामद कर चुकी है। पूरे देश में जगह-जगह मामलों को सीबीआई को देने के लिए कोई सड़कों पर है तो कोई अदालत में। हो सकता है कि राज्य की पुलिस स्थानीय सरकार के दबाव में सत्तारूढ़ पार्टी या सरकार के लोगों के खिलाफ कोई जांच न कर पाए, लेकिन सीबीआई के मत्थे आखिर टोकरी कितनी भरी जा सकती है?
इस मुद्दे पर लिखने की बात हमें अभी इसलिए सूझी कि लंदन से बीबीसी की एक खबर है कि वहां संसद की एक कमेटी के मुखिया ने कहा है कि अगर पुलिस को नए साधन-सुविधा और क्षमता नहीं दिए गए तो फोन हैकिंग के चल रहे मामले की जांच पूरी होने में बरसों लग जाएंगे। हमने पिछले महीने भर में एक से अधिक बार यह लिखा है कि पुलिस या जांच एजेंसियों पर जब कोई अतिरिक्त दबाव इस बात को लेकर रहता है कि वह तेजी से अपराधियों को पकड़े तो उसकी जांच कई बार सही नहीं हो पाती और कई बार बेकसूर लोग पकड़कर पेश कर दिए जाते हैं ताकि धरना और जुलूस बंद हो जाएं। जब ब्रिटेन जैसे विकसित और तकनीकी क्षमता वाले देश में वहां की संसद और सरकार यह मान रही है कि हैकिंग की जांच में बरसों लग जाएंगे तो जाहिर है कि भारत में बहुत से मामलों की जांच में लंबा समय लग सकता है।
हम आज यहां पर कुछ बातों की सिर्फ चर्चा करके छोडऩा चाहते हैं ताकि लोग उन्हें आगे बढ़ा सकें। इन पर हमारी अपनी कोई आखिरी राय नहीं है लेकिन इस पर लोगों को राय जरूर बनाना चाहिए। एक तो देश और प्रदेश में सत्ता अपनी पसंद या नापसंद से बहुत से मामलों की जांच तेज या धीमी करने की तरकीब जानती हैं। और जब जांच तय भी होती है तो जांच एजेंसी की क्षमता शुरू से ही चुकी हुई रहती है। ऐसे में जब अदालत का डंडा पड़ता है तो तमाम कामों को रोककर पहले उन चुनिंदा मामलों की जांच की जाती है जिनकी निगरानी अदालतें खुद कर रही हैं। ऐसे में कम चर्चित मामले धरे रह जाते हैं और उनके शिकार लोगों को कोई इंसाफ नहीं मिल पाता। इसलिए देश में हो रहे अपराधों के अनुपात में जांच एजेंसियां की क्षमता बनाने की जरूरत है और मुकदमे के लिए अदालतों की क्षमता भी उसी हिसाब से बढ़ानी चाहिए। अभी मुंबई के धमाकों के बाद एक सवाल यह भी उठा कि देश को सबसे अधिक टैक्स देने वाले इस महानगर में फोरेंसिक जांच के लिए टीमों को हवाई जहाज से दिल्ली और हैदराबाद से भेजने की घोषणा केंद्रीय गृहमंत्री जब कर रहे थे तो वह गर्व की बात थी या शर्म की?
लेकिन यहां पर हम जांच और मुकदमे की नौबत से पहले की बात छेडऩा चाहते हैं जिस पर हम कई बार लिख चुके हैं। मुंबई विस्फोट की बात ही लें तो जैसा हमने बार-बार लिखा है, ढाई बरस तक अगर इस नाजुक और निशाने पर बैठे महानगर को आतंकी हमले से बचाकर रखा गया तो इसके पीछे खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों की कामयाबी रही। यह बचाना अधिक सस्ता पड़ा क्योंकि इतने बरसों में अगर कुछ और बार ऐसे हमले हुए होते तो उनसे जिंदगी और दौलत दोनों का बड़ा नुकसान हुआ होता। ऐसा ही हमारा मानना गैरआतंकी किस्म के बहुत से दूसरे अपराधों को लेकर है जिनसे देश को बचाने के लिए ऐसी खुफिया एजेंसियों की जरूरत है जो आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार, रिश्वत, मिलावट, नकली सामान जैसे बहुत से मामलों के शुरू होते ही तुरंत उसे पकडऩे की ताकत रखे। लंबे समय तक चोरी-डकैती चाहे सरकार में चले, चाहे सांसदों में चले और चाहे सरकारी ढांचे में चले, उससे जो नुकसान हो चुका रहता है वह बाद में न तो किसी भरपाई से लौटता और न ही ऐसे सभी मामलों में किसी को सजा हो पाती है। इसलिए इंसानी सेहत के मामले में जिस तरह बचाव ही सबसे अच्छा इलाज होता है, उसी तरह देश में अपराधों को पौधे की उम्र में ही खत्म कर देना अकेला रास्ता है। हम बार-बार देखते हैं कि तमाम अपराधों की जांच भी पुलिस या दूसरी एजेंसियां नहीं कर पातीं। जो सबसे कमजोर तबका होता है वह अपनी बेजुबानी के चलते कहीं यह चीख भी नहीं पाता कि बरसों से उसके मामले की जांच नहीं हुई है और हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट अपनी मर्जी के मामलों की जांच के लिए थानों में जाकर बैठे हैं। भारतीय न्याय-व्यवस्था तक पहुंचना भी देश की आबादी के शायद आधे हिस्से को नसीब भी नहीं हो सकता। इसलिए भारतीय शासन व्यवस्था में एक नई सोच के साथ अपराधों पर निगरानी और उनके शुरू के वक्त में ही उन पर कार्रवाई के लिए एजेंसी बनानी चाहिए। आज तो जब देश पूरा लुट चुका रहता है तब जाकर बरसों की अखबारबाजी और अदालत में लोगों की अर्जी के बाद उसकी जांच शुरू होती है। किसी के साथ पच्चीसवीं बार बलात्कार हो जाने के बाद, कुछ बरस बाद जाकर किसी को उसके लिए कटघरे में पहुंचाना किसी तरह का इंसाफ नहीं हो सकता। आज देश के साथ यही हो रहा है और चुनिंदा मामलों की जांच में एजेंसियों का अनुपातहीन समय लगने से बाकी तमाम जांच रूकी पड़ी हैं। इस तस्वीर को बदलने की जरूरत है और अपराधों के रोकथाम के काम में सुरक्षा एजेंसियों से अधिक खुफिया एजेंसियों को लगाने की जरूरत है और इसके लिए एक नया इंतजाम ही करना पड़ेगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें