23 जुलाई 2011
योरप के लिए कल का दिन दिल दहलाने वाला रहा। नोबेल शांति पुरस्कार देने वाला नार्वे कल अपनी ही घरेलू आतंकी हिंसा का शिकार हुआ और वहीं के एक नौजवान ने गोलियों से सौ के करीब बच्चों या नौजवानों को भूनकर रख दिया। इसके अलावा वहां की राजधानी ओस्लो में प्रधानमंत्री के दफ्तर के करीब एक बुरा और बड़ा बम धमाका हुआ जिसमें सात लोग मारे गए और सारी इमारतें हिल गईं। पहली नजर में यह लगा था कि यह किसी मुस्लिम संगठन का काम हो सकता है क्योंकि नार्वे उन देशों में से था जिन्होंने मोहम्मद पैगंबर के बारे में बनाए गए कार्टून छापे थे। लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही यह साफ हो गया कि यह हमलावर तो वहां का ही था, घोर मुस्लिम विरोधी था और यह काम पूरी तरह उस देश के भीतर का था। हालांकि एक खबर यह भी है कि एक किसी मुस्लिम संगठन ने इसकी जिम्मेदारी ली है, अभी तक यह घोषणा सच या झूठ होने का पता नहीं चला है।
यह याद रखने की जरूरत है कि नार्वे एक छोटा देश होने के बाद भी दुनिया की राजनीति में बहुत से आतंकी, उग्रवादी, अलगाववादी और बागी संगठनों की उनके देशों के साथ शांतिवार्ता के लिए अपनी जमीन को पेश करते आया है। उसका दुनिया की शांति में एक योगदान रहा है, लेकिन इन दिनों अफगानिस्तान में काम कर रही नाटो की सेनाओं में नार्वे के सैनिक भी शायद शामिल हैं और उसे लेकर उसे कुछ धमकियां भी झेलनी पड़ रही है। इस देश को पहले गिने-चुने बहुत छोटे आतंकी हमले झेलने पड़े हैं। एक संगठन के दस्तावेज बताते हैं कि 1970 से 2010 के बीच नार्वे पर पन्द्रह आतंकी हमले हुए हैं जिसमें एक मौत हुई थी और कुल तेरह घायल हुए थे। इसकी तुलना इन्हीं बरसों में अमरीका से अगर करें तो वहां पर 2347 आतंकी घटनाएं हुई थीं। लेकिन कल का यह हादसा इस देश के इतिहास में, इस पूरे इलाके के इतिहास में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बुरा हादसा माना जा रहा है।
अब एक सवाल यह उठता है कि अगर एक इंसान अपनी किसी नाराजगी की वजह से इतने लोगों को मार सकता है तो इससे कैसे बचा जाए? इसके बारे में अभी तक ऐसी खबर भी नहीं है कि उसके पीछे कोई आतंकी संगठन था। और इस घटना से परे हम पश्चिम के बारे में जब देखते हैं तो अमरीका में हर कुछ महीनों में होने वाली ऐसी हिंसा याद आती है जिसमें कोई एक बंदूकबाज दर्जन-दर्जन भर लोगों को मार डालता है। बंदूक की यह संस्कृति, हथियारों की घर-घर मौजूदगी और दुनिया भर के लड़ाई के मोर्चों पर पश्चिम की फौजों के जाने और वहां से विचलित होकर वापिस आने जैसी कई बातें यह सोचने को मजबूर करती हैं कि अमनचैन किस्तों में कहीं नहीं आ सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि नाटो की फौजें खाड़ी के देशों पर, मुस्लिम देशों पर लगातार हमले करें और नाटो देशों के भीतर कोई तनाव खड़ा न हो। जिन देशों पर नाटो हमला कर रहा है वहां के बेकसूर लोग भी आगे चलकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने घर की मौतों का हिसाब चुकता करने की सोच सकते हैं और दूसरी तरफ विदेशों में खोले गए मोर्चे के असर से इन देशों में ऐसा घरेलू तनाव भी हो सकता है जैसा कि कल नार्वे में सामने आया है। इस शांत देश में इस एक घटना के जख्म आने वाले कई दशक तक नहीं भर पाएंगे और दुनिया के तमाम देशों को ऐसे मौके पर यह सोचना चाहिए कि दुनिया से बेइंसाफी कैसे कम हो और कैसे फौजी मोर्चे घटें, कैसे दुनिया में बदले की आग को सुलगने से रोका जाए, कैसे बंदूक की संस्कृति घटे, और कैसे दुनिया का कारोबार हथियारों के सौदागरों के हाथों से हटाया जाए। यह भी सोचना होगा कि अमरीका की तरह के हमलावर देश के साथ उसके पि_ू बने हुए योरप के देश, योरप के बाहर के देश उन्हें नापसंद मुल्कों को इतना जख्मी करके न छोड़ें कि वहां से बदले की चिन्गारियां हमेशा ही उठती रहें।
नार्वे का कल का हादसा बहुत तकलीफदेह है और दुनिया में बंदूकों की मौजूदगी नागरिकों के पास से चाहे कम भी हो जाए सुरक्षा दस्तों के हाथों में तो हथियार रहेंगे ही। इसलिए इंसान और दुनिया का बचाव हथियारों से कभी नहीं हो सकेगा, इसके लिए अमन और इंसाफ पर टिकी हुई एक ऐसी सोच ही काम आ सकती है जिसमें इंसान और इंसान के बीच का फासला कम होगा और सबसे गरीब, सबसे कुचले हुए लोगों को राहत दी जाएगी। हम इस घटना से परे भी पूरी दुनिया में जगह-जगह, अलग-अलग मुद्दों को लेकर चल रही बगावत और हिंसा को देखते हैं और उनके बारे में हमारा यही मानना है कि उनमें से लगभग हर हिंसा किसी न किसी बेइंसाफी से शुरू होती है और फिर बेइंसाफी के खिलाफ लड़ते-लड़ते वैसी बगावत फिर चाहे खुद ही बेइंसाफ हो जाती है। नार्वे की इस घटना को लेकर लोगों को दुनिया भर में तनाव के कारणों पर सोचना चाहिए, और सोच से ही हर जगह रास्ता निकलेगा, चाहे वह खाड़ी के देश हों या फिर बस्तर, कश्मीर जैसी जगहें हों।
योरप के लिए कल का दिन दिल दहलाने वाला रहा। नोबेल शांति पुरस्कार देने वाला नार्वे कल अपनी ही घरेलू आतंकी हिंसा का शिकार हुआ और वहीं के एक नौजवान ने गोलियों से सौ के करीब बच्चों या नौजवानों को भूनकर रख दिया। इसके अलावा वहां की राजधानी ओस्लो में प्रधानमंत्री के दफ्तर के करीब एक बुरा और बड़ा बम धमाका हुआ जिसमें सात लोग मारे गए और सारी इमारतें हिल गईं। पहली नजर में यह लगा था कि यह किसी मुस्लिम संगठन का काम हो सकता है क्योंकि नार्वे उन देशों में से था जिन्होंने मोहम्मद पैगंबर के बारे में बनाए गए कार्टून छापे थे। लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही यह साफ हो गया कि यह हमलावर तो वहां का ही था, घोर मुस्लिम विरोधी था और यह काम पूरी तरह उस देश के भीतर का था। हालांकि एक खबर यह भी है कि एक किसी मुस्लिम संगठन ने इसकी जिम्मेदारी ली है, अभी तक यह घोषणा सच या झूठ होने का पता नहीं चला है।
यह याद रखने की जरूरत है कि नार्वे एक छोटा देश होने के बाद भी दुनिया की राजनीति में बहुत से आतंकी, उग्रवादी, अलगाववादी और बागी संगठनों की उनके देशों के साथ शांतिवार्ता के लिए अपनी जमीन को पेश करते आया है। उसका दुनिया की शांति में एक योगदान रहा है, लेकिन इन दिनों अफगानिस्तान में काम कर रही नाटो की सेनाओं में नार्वे के सैनिक भी शायद शामिल हैं और उसे लेकर उसे कुछ धमकियां भी झेलनी पड़ रही है। इस देश को पहले गिने-चुने बहुत छोटे आतंकी हमले झेलने पड़े हैं। एक संगठन के दस्तावेज बताते हैं कि 1970 से 2010 के बीच नार्वे पर पन्द्रह आतंकी हमले हुए हैं जिसमें एक मौत हुई थी और कुल तेरह घायल हुए थे। इसकी तुलना इन्हीं बरसों में अमरीका से अगर करें तो वहां पर 2347 आतंकी घटनाएं हुई थीं। लेकिन कल का यह हादसा इस देश के इतिहास में, इस पूरे इलाके के इतिहास में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बुरा हादसा माना जा रहा है।
अब एक सवाल यह उठता है कि अगर एक इंसान अपनी किसी नाराजगी की वजह से इतने लोगों को मार सकता है तो इससे कैसे बचा जाए? इसके बारे में अभी तक ऐसी खबर भी नहीं है कि उसके पीछे कोई आतंकी संगठन था। और इस घटना से परे हम पश्चिम के बारे में जब देखते हैं तो अमरीका में हर कुछ महीनों में होने वाली ऐसी हिंसा याद आती है जिसमें कोई एक बंदूकबाज दर्जन-दर्जन भर लोगों को मार डालता है। बंदूक की यह संस्कृति, हथियारों की घर-घर मौजूदगी और दुनिया भर के लड़ाई के मोर्चों पर पश्चिम की फौजों के जाने और वहां से विचलित होकर वापिस आने जैसी कई बातें यह सोचने को मजबूर करती हैं कि अमनचैन किस्तों में कहीं नहीं आ सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि नाटो की फौजें खाड़ी के देशों पर, मुस्लिम देशों पर लगातार हमले करें और नाटो देशों के भीतर कोई तनाव खड़ा न हो। जिन देशों पर नाटो हमला कर रहा है वहां के बेकसूर लोग भी आगे चलकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने घर की मौतों का हिसाब चुकता करने की सोच सकते हैं और दूसरी तरफ विदेशों में खोले गए मोर्चे के असर से इन देशों में ऐसा घरेलू तनाव भी हो सकता है जैसा कि कल नार्वे में सामने आया है। इस शांत देश में इस एक घटना के जख्म आने वाले कई दशक तक नहीं भर पाएंगे और दुनिया के तमाम देशों को ऐसे मौके पर यह सोचना चाहिए कि दुनिया से बेइंसाफी कैसे कम हो और कैसे फौजी मोर्चे घटें, कैसे दुनिया में बदले की आग को सुलगने से रोका जाए, कैसे बंदूक की संस्कृति घटे, और कैसे दुनिया का कारोबार हथियारों के सौदागरों के हाथों से हटाया जाए। यह भी सोचना होगा कि अमरीका की तरह के हमलावर देश के साथ उसके पि_ू बने हुए योरप के देश, योरप के बाहर के देश उन्हें नापसंद मुल्कों को इतना जख्मी करके न छोड़ें कि वहां से बदले की चिन्गारियां हमेशा ही उठती रहें।
नार्वे का कल का हादसा बहुत तकलीफदेह है और दुनिया में बंदूकों की मौजूदगी नागरिकों के पास से चाहे कम भी हो जाए सुरक्षा दस्तों के हाथों में तो हथियार रहेंगे ही। इसलिए इंसान और दुनिया का बचाव हथियारों से कभी नहीं हो सकेगा, इसके लिए अमन और इंसाफ पर टिकी हुई एक ऐसी सोच ही काम आ सकती है जिसमें इंसान और इंसान के बीच का फासला कम होगा और सबसे गरीब, सबसे कुचले हुए लोगों को राहत दी जाएगी। हम इस घटना से परे भी पूरी दुनिया में जगह-जगह, अलग-अलग मुद्दों को लेकर चल रही बगावत और हिंसा को देखते हैं और उनके बारे में हमारा यही मानना है कि उनमें से लगभग हर हिंसा किसी न किसी बेइंसाफी से शुरू होती है और फिर बेइंसाफी के खिलाफ लड़ते-लड़ते वैसी बगावत फिर चाहे खुद ही बेइंसाफ हो जाती है। नार्वे की इस घटना को लेकर लोगों को दुनिया भर में तनाव के कारणों पर सोचना चाहिए, और सोच से ही हर जगह रास्ता निकलेगा, चाहे वह खाड़ी के देश हों या फिर बस्तर, कश्मीर जैसी जगहें हों।
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