अमरीका का एक और युद्ध-अपराध

13 जुलाई 2011
कल की दो खबरें हैं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ऐसे देशों और संगठनों की लिस्ट बनाने की बात कही है जो स्कूलों और अस्पतालों पर हमला करते हैं। सुरक्षा परिषद के अनुसार इनकी संपत्ति जब्त की जा सकती है और इनकी यात्रा पर रोक लग सकती है। यह एक अच्छी पहल कही जा सकती थी अगर संयुक्त राष्ट्र संघ हाशिए पर जा चुका एक पूरी तरह से बोगस और खोखला संगठन न बन चुका होता। इराक पर अमरीकी हमले के वक्त दुनिया ने देखा है कि अमरीका अपने फौजी जूतों के तल्ले की इज्जत संयुक्त राष्ट्र से काफी अधिक करता है। इस हमले से परे भी बहुत से ऐसे मौके रहे जब संयुक्त राष्ट्र अमरीका के चपरासी की तरह काम करते रहा। इसलिए उसकी यह बयानबाजी अपने खुद के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए किए जा रहे एक पाखंड से अधिक कुछ नहीं है। कल की ही एक दूसरी खबर बताती है कि अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान के उस इलाके में फर्जी टीकाकरण चलाया था जहां उसे ओसामा बिन लादेन के होने का शक था। गार्डियन अखबार के अनुसार इस अभियान के जरिए सीआईए ओसामा और उनके परिवार के डीएनए सैंपल हासिल करने की कोशिश कर रही थी जिससे उनकी मौजूदगी की खबर को पुख्ता किया जा सके। सीआईए चाहती थी कि एबटाबाद के उस परिसर में रह रहे लोगों का डीएनए सैंपल हासिल किया जाए। फिर उस सैंपल को ओसामा की बहन के डीएनए सैंपल से मिलाया जाए। ओसामा की बहन का 2010 में अमरीकी शहर बॉस्टन में निधन हो गया था।
जब दुनिया का यह सबसे ताकतवर देश कथित इंसानियत के तमाम सिद्धांतों को कूड़ेदान में डालकर दुनिया की सेहत के लिए जरूरी एक बचाव कार्यक्रम, टीकाकरण, की विश्वसनीयता को पूरी तरह तबाह करने वाला यह खुफिया और फौजी कार्यक्रम चलाता है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ क्या कुछ करने की हालत में है? जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान में दुनिया के इस सबसे बड़े गुंडे देश के द्रोन हमलों में गरीब बच्चे और घरेलू औरतें थोक में मारे जा रहे हैं तो अमरीकी जुबान के इस कोलैटरल डैमेज के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र का मुंह खुलता है? कल ही अमरीका के एक मानवाधिकार संगठन ने यह कहा है कि इराक पर हमले को लेकर पिछले अमरीकी राष्ट्रपति बुश के खिलाफ युद्ध अपराधों का मुकदमा चलाना चाहिए और अगर ओबामा सरकार ऐसा नहीं करती है तो दूसरे देशों या मानवाधिकार संगठनों को इसकी पहल करनी चाहिए। यहां पर हमें हिन्दी के एक विख्यात कहानीकार सुदर्शन की एक ऐतिहासिक कहानी- हार की जीत- याद पड़ती है जिसमें एक साधू के घोड़े पर फिदा होकर एक डकैत अपाहिज बनकर आता है और उसका घोड़ा लेकर भागने लगता है। इस पर बाबा भारती कहते हैं- 'मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।Ó खडग़सिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खडग़सिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, 'बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?Ó सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, 'लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।Ó
यह कहानी साख की जरूरत को बताती है। अमरीका वह देश है जिसमें खुफिया जानकारी और सुबूत होने का झूठा दावा करते हुए दुनिया को यह कहा था कि इराक के पास जनसंहार के हथियार और रासायनिक हथियार हैं। वह साजिश अब पूरी तरह उजागर हो चुकी है और उस झूठ के बाद अब यह परले दर्जे की हैवानियत की हरकत उसने की है जब टीकाकरण की आड़ लेकर उसने एक फौजी कार्रवाई की। हम इसे एक युद्ध-अपराध मानते हैं जिसमें कोई एम्बुलेंस में छुपाकर हथियारों को ले जाए और एम्बुलेंस की विश्वसनीयता को इतना खत्म कर दे कि अगली बार रेडक्रॉस की गाड़ी दिखते ही पहले उस पर हमला हो। अगर दुनिया के देश अमरीका की इस हरकत पर मुंह भी नहीं खो रहे हैं तो चुप्पी साधे हुए ऐसे देशों को और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे बोगस संगठन को फालतू की बयानबाजी करने का कोई नैतिक हथियार नहीं है। हमारा मानना है कि टीकाकरण के बारे में यह खबर अगर सच साबित होती है, जिसको कि अभी तक अमरीका ने गलत करार नहीं दिया है, तो इसके खिलाफ युद्ध-अपराध के मुकदमे की पहल दुनिया के देशों को करनी चाहिए।

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