भारत के सबसे बड़े फौजी अफसर की गैरजरूरी और बेमौके की बात

27 जुलाई 2011
भारतीय सेनाओं के संयुक्त मुखिया और भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वी.पी. नाईक ने एक प्रेस कांफे्रंस में कहा कि भारत पाकिस्तान के परमाणु जखीरे से अनजान नहीं है, लेकिन अगर भारत पर कोई परमाणु हमला करने की गलती करता है तो ऐसे पहले हमले का भारत की तरफ से जवाब बहुत बड़ा होगा और वह बहुत बड़ा नुकसान करेगा। आने वाले इतवार को नाईक रिटायर हो रहे हैं और उसके पहले उनकी यह मीडिया से आखिरी बातचीत थी। इसमें उन्होंने कहा कि हमारी परमाणु नीति हथियारों के पहले इस्तेमाल न करने की है लेकिन यह नीति किसी परमाणु हमले के नौबत आने पर जवाब में बहुत ही भारी कठोर और कड़े जवाबी नुकसान पहुंचाने की भी है।
यह बयान कल मीडिया में उस वक्त छाया जब पाकिस्तान की नई विदेश मंत्री अपने पहले भारत दौरे पर पहुंची ही थी और दोनों देशों के बीच जिन तनावों के साए में आज बातचीत चल रही है उसके बारे में कल हमने इसी जगह बहुत लंबी बात लिखी भी थी। आज दुबारा उसी बात पर लिखने की नौबत इसलिए आ रही है कि पिछले कुछ बरसों में हम लगातार इस बात को देख रहे हैं कि जब कभी भारत और पाकिस्तान के बीच प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री के स्तर पर कोई अहमियत की बात होने को रहती है तो उसके ठीक पहले कभी भारत की सेना की तरफ से या फिर भारत के गृह मंत्रालय की तरफ से कोई न कोई अफसर इस तरह का मुंह मारता है कि उससे पूरी बातचीत पटरी से उतरने को लगती है। भारत पर परमाणु हमले की नौबत में भारत किस तरह का जवाब देगा यह बयान देने की हड़बड़ी उस फौजी अफसर की हो सकती है जिसे अपनी नौकरी के आखिर में आखिरी बार मीडिया के कैमरे और अखबारों के पन्ने नसीब हो रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान की विदेश मंत्री के यहां पांव देते ही इस तरह का बयान भारत और पाकिस्तान की बातचीत में कोई मदद करेगा? और अगर कुछ कट्टर स्वघोषित राष्ट्रवादी ताकतें इस बात की हिमायती हैं कि अभी पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होनी चाहिए, तो इनके लिए तो भारत के फौजी अफसर का किस दिन का ऐसा बयान माकूल हो सकता है लेकिन तनाव के रिश्तों से गुजर रहे दो देशों के बीच बातचीत इससे से गड़बड़ाना तय है। फौजी वर्दियों के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि आला अफसरों को अपने पूरे कामकाज के दौरान अगर किसी लड़ाई में अगुवाई करने का मौका नहीं मिलता तो वे हीरो बने बिना रिटायर होने का खतरा झेलते हैं। इसलिए बहुत से वर्दीधारी लोग एक ऐसी लड़ाई का सपना देखते रहते हैं जिसमें वे एक इतिहास गढ़ सकें, उन पर किताबें लिखी जाएं, वे किताबें लिख सकें और अगर 1971 की किस्म का मोर्चा हो तो फिर वे मानेक शॉ की तरह फील्ड मार्शल का तमगा भी पा सकें  जो कि दो अलग-अलग मोर्चों पर सेना की अगुवाई एक साथ करके ही पाया जा सकता है। हम इसे बहुत सीधे-सीधे एक युद्धोन्माद तो अभी नहीं कहते लेकिन इसे बहुत गैरजिम्मेदारी का एक बयान मानते हैं जिसकी कि आज कोई जरूरत नहीं थी और न ही पहले से तय पाकिस्तानी विदेश मंत्री के आने के दिन ऐसी खबरें आना भारत के लोकतांत्रिक मिजाज और इसकी शांति की विदेश नीति के अनुकूल ही ऐसा बयान था।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि पिछले साल दो साल में हमको कई मौकों पर भारत सरकार की कुर्सियां संभाले हुए लोगों के बेदिमागी और बददिमागी बयानों के खिलाफ लिखना पड़ा और वैसी ही नौबत तब आई जब कांगे्रस पार्टी के लोगों ने इसी दर्जे के, ऐसी ही खामियों वाले निहायत गैरजरूरी बयान दिए। एक मौका तो हमें ऐसा भी याद पड़ता है जब एक-दो दिनों के भीतर ही सरकार और कांगे्रस पार्टी, और शायद यूपीए के सहयोगी नेता भी, बददिमागी और बेदिमागी की होड़ में लग गए थे। अभी भी अगर हम देखें तो एक तरफ मणिशंकर अय्यर पार्टी के मोर्चे से उटपटांग बातें कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सेनाओं का संयुक्त मुखिया एक अखबारी बात को बिना यह दिमाग के इस्तेमाल के एक मिसाइल की तरह भारत-पाक वार्ता पर दाग रहा है। कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि पतंग उड़ाने की तरह कभी ढील देना और कभी तान देना विदेश नीति की तरकीब और बाजीगरी रहती है और अभी इस बातचीत के मौके पर भारत के भीतर के आक्रामक पाक विरोधियों को भी खुश रखने के लिए शायद सरकार की तरफ से ऐसी बात की गई हो। अगर सरकार में किसी कि विदेश नीति की समझ ऐसी कमजोर है तो भी हम उसे खारिज करते हुए भारत सरकार को सलाह देना चाहेंगे कि वह अपनी बड़बोली जुबानों को काबू में रखे। एक वक्त जब विदेश मंत्री कृष्णा पाकिस्तान जाकर बात कर रहे थे तब भारत के गृह सचिव भी बिना किसी वजह के ढेरों नाजायज बातें उगलीं और इसे लेकर विदेश और गृह मंत्रालय के बीच तनातनी भी हुई। आज विदेश मंत्रालय के ऐसे नाजुक मोड़ पर प्रतिरक्षा मंत्रालय की तरफ से भारत का सबसे बड़ा फौजी अफसर अपने रिटायरमेंट की हड़बड़ी में ऐसी गैरजरूरी और बेमौके की बात कर रहा है। सरकार में ऐसी छूट सिर्फ प्रधानमंत्री के स्तर पर लापरवाही या कमजोरी से हो सकती है और देश को इसका बड़ा नुकसान हो रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों, दोनों तरफ अमन-चैन के हिमायती जो लोग हैं उनको ऐसे बयानों के मौकों पर खुलकर इनके खिलाफ बोलना चाहिए क्योंकि राजनीतिक दल और नेता तो वोटों की नीयत से ऐसे मौकों पर चुप रहना बेहतर समझते हैं। हमें यह भी हैरानी है कि पश्चिम बंगाल और केरल में चुनाव हार जाने के बाद वामपंथी दल आखिर कब तक लकवे का शिकार होकर इस तरह चुप पड़े रहेंगे?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें