कतार में लगे देश में रफ्तार!

29 जुलाई
रेल मंत्रालय की खबर है कि वह ढाई-तीन सौ किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन चलाना शुरू करने जा रही है। इसके लिए कुछ रास्ते छांटे गए हैं। दुनिया के कई विकसित देशों में बहुत अधिक रफ्तार की रेलगाडिय़ों को गैरजरूरी माना जा चुका है और यह माना गया है कि उन पर जितनी अधिक लागत आती है, उनके लिए जितने सुरक्षा इंतजाम करने पड़ते हैं वे बहुत महंगे पड़ते हैं। हिन्दुस्तान में ऐसी रफ्तार के लिए चाह देखते हुए हमें एक दूसरी बात यह खटकती है कि जिस देश में लोगों को रात-दिन कहीं न कहीं कतार में लगने पर बेबस रहना पड़ता है वहां पर ऐसी रफ्तार का क्या इस्तेमाल है? रफ्तार जिंदगी के एक दायरे में आए, आबादी के एक छोटे हिस्से के लिए आए और उस पर होने वाले बहुत बड़े खर्च का बोझ गरीब जनता के हिस्से पर भी पड़े जिसे कि किसी रफ्तार के लायक नहीं माना जाता है तो इसे में लोकतंत्र में एक विरोधाभास मानते हैं। जिस देश में राशन के लिए, गैस सिलेंडर के लिए, अस्पताल में जांच और इलाज के लिए, कहीं अर्जी देने के लिए तो कहीं भुगतान जमा करने के लिए कतार ही कतार दिखती हैं, वहां पर रफ्तार की जरूरत को जिंदगी के ऐसे दायरों में है जहां पूरी आबादी को बेरोजगार मानकर उसे बिना किसी जरूरत, सिर्फ सरकारी नालायकी के चलते लाईन में लगा दिया जाता है। हम इसे देश की जनता के मौलिक अधिकारों का हनन मानते हैं कि सरकार इन कतारों को खत्म करने के बारे में कुछ सोचती भी नहीं है। आज देश में एक रफ्तार की बात सुनकर हमें यह बात और अधिक खटक रही है और इसलिए हम आज की इस चर्चा से लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर करवाना चाहते हैं कि जनता किसी गैरजरूरी कतार को अपनी नियति क्यों मानकर चलती है?
जिस देश में बड़े-बड़े आईआईएम इतने नामीगिरामी हैं कि वहां से निकलकर काबिल मैनेजर पूरी दुनिया को मैनेज करने के लिए जाते हैं। लेकिन इस देश के भीतर जनता का जो उत्पादक समय हो सकता है उसे अलग-अलग लाईनों में लगवाकर तबाह करना कैसे बंद हो इसे कोई मैनेज क्यों नहीं कर पाता? दरअसल सरकार के भीतर रिश्वत का सिलसिला उसी वक्त आसानी से बढ़ सकता है जब हर जगह हर बात के लिए कतार लगी हुई हो। चाहे वह बड़ी-बड़ी अर्जियों की हो, चाहे वह रेलवे रिजर्वेशन से लेकर वृद्धावस्था पेंशन की हो। जब तक लाईन में लगे हुए लोग थक न जाएं, निराश और हताश न हो जाएं, जब तक उनका सब्र जवाब न दे दे तब तक वे रिश्वत देने के लिए आसानी से तैयार नहीं हो सकते क्योंकि उनकी जेब में बहुत मेहनत की कमाई होती है। दूसरी तरफ इस देश में सत्ता और महत्ता की ताकत से लैस तबका ऐसा है जिसे कि हर किस्म की कतार से छूट मिलने का इंतजाम सरकारी नियमों में किया गया है। इसलिए उसे रिश्वत देने की बेबसी या तो नहीं रहती या फिर उसकी जेब में अधिक कमाई के लिए एक नजराना देने की हालत रहती है, जैसा कि कर्नाटक के लोकायुक्त की रिपोर्ट में जिंदल के मामले में सामने आया है। लेकिन हम एक बार फिर इस बात पर लौटना चाहते हैं कि सरकारें अपने-अपने नीचे लगने वाली कतारों के बारे में यह क्यों नहीं सोचतीं कि उन्हें खत्म कैसे किया जाए?
आजकल छोटे-छोटे शहरों की छोटी-छोटी दुकानों में, रेस्त्रां में ग्राहकों की कतार के लिए उन्हें कूपन मिल जाते हैं और उनका नंबर स्क्रीन पर दिखने पर वे वहां जा सकते हैं। ऐसी छोटी सी बात सरकारी काउंटरों पर क्यों लागू नहीं किया जा सकता? क्यों लोगों को धूप और बारिश में सड़क किनारे धूल और धुआं झेलते हुए एक-एक सिलेंडर के लिए, राशन के लिए घंटों खड़ा रहना पड़ता है? सरकार में बैठे हुए बड़े-बड़े और काबिल माने जाने वाले अफसर अपनी जनता के वक्त का कुछ बेहतर इस्तेमाल क्यों नहीं सोच पाते? हम समाज के भीतर के लोगों से भी यह उम्मीद करते हैं कि वे अपने आसपास जहां भी कोई कतार देखें वे वहां पर उस दफ्तर या उस संस्था के कामकाज में सुधार के तरीके देखें और ज्यादती को बर्दाश्त करने की आदी हो गई हिन्दुस्तानी जनता को कुछ राहत पहुंचाने की कोशिश करें। हम मैनेजमेंट के छात्रों से भी यह उम्मीद करेंगे कि वे एक प्रोजेक्ट की तरह अपने शहर में लगने वाली लाईनों का कोई ऐसा रास्ता निकाले जिससे कि आमजनता का रोजाना होने वाला अपमान भी बंद हो और लोगों को यह लग सके कि इस देश में उनकी छोटी-छोटी जरूरतें बिना तकलीफ पाए भी पूरी हो सकती हैं। हम अधिक रफ्तार की रेलगाडिय़ों के खिलाफ नहीं हैं लेकिन हम भारत की जनता की जिंदगी में ऐसे विरोधाभास को खत्म करना अधिक जरूरी समझते हैं और खुद रेलवे का यह हाल कि उसके काउंटरों पर साधारण लोग पूरे-पूरे दिन खड़े रहते हैं और उसका भ्रष्ट इंतजाम दलालों को अलग से टिकट देने के लिए बदनाम है। रेलवे पहले अपनी छोटी-छोटी बातों को सुधारे तो ही लोगों की नजरों में उसका सम्मान होगा, रफ्तार बढ़ाने से कुछ नहीं होगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें