26 जुलाई 2011
पाकिस्तान में एक खूबसूरत नौजवान युवती के विदेश मंत्री बनने से भारत में एक अलग से उत्साह देखने मिला। बहुत से लोगों ने मजाक में लिखा कि वे अब पाकिस्तान से बहुत करीबी संबंध रखना चाहेंगे। लोगों को यह भी लगा कि एक बिल्कुल नई पीढ़ी की यह विदेश मंत्री पुराने जख्मों या हादसों के बोझ से आजाद रहते हुए एक नई शुरुआत कर सकेगी। लेकिन जल्दबाजी में ऐसे नतीजे पर पहुंचने वाले लोगों को यह भी समझने की जरूरत है कि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों की विदेशी नीति मोटे तौर पर प्रधानमंत्री के स्तर पर तय होती है और पाकिस्तान के बारे में यह बात भी जाहिर है कि वहां की फौज और वहां की कुख्यात फौजी खुफिया एजेंसी का दखल भी पाकिस्तान की विदेश नीति के मामले में रहता है। इसलिए किसी एक व्यक्ति के वहां आने से कोई बहुत बड़ा बदलाव हम नहीं देखते लेकिन इस बहाने पाकिस्तान की विदेश नीति और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर बात जरूर हो सकती है।
जो लोग पाकिस्तान की विदेश नीति को भारत के खिलाफ पाते हैं उनको पाकिस्तान के अंदरूनी हालात की बेबसी पर भी गौर करना चाहिए। यह मुल्क डेमोके्रसी के किनारे-किनारे चलने की कोशिश करते रहा लेकिन वहां की फौजी वर्दियों ने बंदूक टिकाकर उसे फुटपाथ से भी परे करने का काम कई बार किया। इसके अलावा आजादी के बाद से लेकर अब तक पाकिस्तान की सरकारों में भ्रष्टाचार भारत की सरकारों के मुकाबले अधिक रहा, वहां मजहब के बोलबाले से लोगों की वैज्ञानिक सोच ऐसी पिछड़ी कि पाकिस्तान एक कमजोर देश बने रह गया। जहां पर लोकतंत्र के पैर इसलिए भी नहीं जम पाए कि मजहब की बुनियाद पर, उसके मुताबिक जब कहीं का कानून बनता है तो न उसमें इंसानों का दर्जा बराबरी का रहता और न ही आज की आधुनिक जरूरतों की गुंजाइश उसमें रहती। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के फौजी हुक्मरानों ने वहां के मजहबी दकियानूसी लोगों के साथ मिलकर सरकार पर काबिज रहने के रास्ते निकालने पिछली आधी सदी में लगातार जारी रखा और बीच-बीच में अगर कोई चुनी हुई सरकार आई भी तो उसका हाल इसलिए भी खराब रहा कि वह बहुत बुरी तरह बेईमान सरकार रही। पाकिस्तान के हाल को देखें तो मजहब के बोलबाले से बाकी दुनिया के साथ उसका तालमेल कम रहा और उसकी माली हालत ऐसी चौपट रही कि वह अमरीका की जेब पर पलने वाले एक गुलाम की तरह ही चलते रहा और आने वाले अनगिनत बरसों तक उसकी वैसी ही हालत दिखती है।
पाकिस्तान की हालत में और बुरी बात तब जुड़ गई जब उसकी अपनी जमीन पर और पड़ोस के अफगानिस्तान की जमीन पर मजहबी आतंक, अमरीकी फौजी साजिशों के तहत बढ़ाया गया और अफगानिस्तान से कम्युनिज्म खत्म करने के लिए उसे बागियों की एक फौज की तरह खड़ा किया गया। नतीजा यह हुआ कि कम्युनिज्म तो चले गया लेकिन दहशतगर्दी इस कदर काबिज हो गई कि उसने अमरीका की नाक ही काटकर रख दी। अब आज अमरीकी फौजी मनसूबों को मुस्लिम आतंक को खत्म करने के नाम पर पूरी दुनिया में जगह-जगह हमले करने का लायसेंस अमरीकी राष्ट्रपति के हाथों ही मिल गया है और न्यूयॉर्क की अपनी कुछ इमारतों में कुछ हजार बेकसूर लोगों की मौत के एवज में वह दुनिया में अपने फैलाव का ऐसा बड़ा काम कर पा रहा है जैसा कि वह तीसरे विश्वयुद्ध से भी नहीं कर पाता। आज वह आतंक को खत्म करने के नाम पर एक-एक करके तमाम देशों में दखल बढ़ाते जा रहा है और लाखों लोगों की हत्या करते हुए वह एशिया के इस हिस्से पर बाज के खूनी पंजों को मजबूती से जमा चुका है। पाकिस्तान की तमाम विदेश नीति अमरीकी फौजी इरादों के काबू में भी है और अपने देश के भीतर के धर्मांध और कट्टर अलोकतांत्रिक ताकतों के हमले भी वह रात-दिन झेल रही है। इससे परे पाकिस्तान के अपने दीवालिया खस्ता हाल का दबाव भी उस पर है कि गरीबी की तरफ से पाकिस्तान की जनता का ध्यान हटाने के लिए वह समय-समय पर कैसे भारत के खिलाफ नारे लगाता रहे। हम आज दुनिया में कम ही ऐसे देश देखते हैं जिन पर, जिनकी घरेलू और बाहरी नीतियों पर इतने किस्म के अलग-अलग दबाव रहें और इसके बीच वह भारत-पाक जैसे जटिल रिश्तों पर काम करे। ऐसे में अगर एक कमउम्र और खूबसूरत विदेश मंत्री के आने से भारत के लोगों में एक नया जोश आता है तो उसमें हम कोई बुराई नहीं देखते। भारत में विदेश विभाग में महिलाएं लगातार ऊंची कुर्सियां संभालते आई हैं और आज भी उनके चेहरे ऐसी तमाम बातचीत में दिखते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच कई दूसरे किस्म के फर्क हो सकते हैं लेकिन इन दोनों ही देशों में अपने दो और पड़ोसी देशों की तरह महिला प्रधानमंत्री होने की एक परंपरा रही है। पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो, भारत में इंदिरा गांधी के अलावा श्रीलंका और बांग्लादेश में भी महिलाएं इन कुॢसयों पर रहते आई हैं। इसलिए चाहे इस्लामी कायदे हों या कोई और तौर-तरीके, एक महिला की लीडरशिप पाकिस्तान भी पहले देख चुका है। इसलिए पाकिस्तान के भीतर भी यह कोई अनहोनी नहीं हुई है। इन दोनों देशों के बीच हमने यह भी देखा है कि ऊपर लिखी हुई तमाम मुश्किलों से परे ऐसे लोगों की अपनी शख्सियत का फर्क भी बातचीत और रिश्तों पर पड़ा है जो कि इन दोनों मुल्कों में किसी वक्त कुर्सियां संभाले रहे हैं। इसलिए अगर एक ताजा चेहरा लोगों में खुशी लाता है तो यह उसकी किस्म की खुशी है जैसी कि क्रिकेट में होती है या फिल्मों और टेलीविजन के प्रोग्रामों में होती है। भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतरी के लिए अगर एक नई पीढ़ी को बात करने का मौका मिलता है तो इससे जाहिर तौर पर फायदा ही होगा। लेकिन इस एक मामूली फर्क से पाकिस्तान की अनगिनत दिक्कतें बहुत कम हो जाएंगी ऐसा भी हम नहीं समझते।
पाकिस्तान में एक खूबसूरत नौजवान युवती के विदेश मंत्री बनने से भारत में एक अलग से उत्साह देखने मिला। बहुत से लोगों ने मजाक में लिखा कि वे अब पाकिस्तान से बहुत करीबी संबंध रखना चाहेंगे। लोगों को यह भी लगा कि एक बिल्कुल नई पीढ़ी की यह विदेश मंत्री पुराने जख्मों या हादसों के बोझ से आजाद रहते हुए एक नई शुरुआत कर सकेगी। लेकिन जल्दबाजी में ऐसे नतीजे पर पहुंचने वाले लोगों को यह भी समझने की जरूरत है कि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों की विदेशी नीति मोटे तौर पर प्रधानमंत्री के स्तर पर तय होती है और पाकिस्तान के बारे में यह बात भी जाहिर है कि वहां की फौज और वहां की कुख्यात फौजी खुफिया एजेंसी का दखल भी पाकिस्तान की विदेश नीति के मामले में रहता है। इसलिए किसी एक व्यक्ति के वहां आने से कोई बहुत बड़ा बदलाव हम नहीं देखते लेकिन इस बहाने पाकिस्तान की विदेश नीति और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर बात जरूर हो सकती है।
जो लोग पाकिस्तान की विदेश नीति को भारत के खिलाफ पाते हैं उनको पाकिस्तान के अंदरूनी हालात की बेबसी पर भी गौर करना चाहिए। यह मुल्क डेमोके्रसी के किनारे-किनारे चलने की कोशिश करते रहा लेकिन वहां की फौजी वर्दियों ने बंदूक टिकाकर उसे फुटपाथ से भी परे करने का काम कई बार किया। इसके अलावा आजादी के बाद से लेकर अब तक पाकिस्तान की सरकारों में भ्रष्टाचार भारत की सरकारों के मुकाबले अधिक रहा, वहां मजहब के बोलबाले से लोगों की वैज्ञानिक सोच ऐसी पिछड़ी कि पाकिस्तान एक कमजोर देश बने रह गया। जहां पर लोकतंत्र के पैर इसलिए भी नहीं जम पाए कि मजहब की बुनियाद पर, उसके मुताबिक जब कहीं का कानून बनता है तो न उसमें इंसानों का दर्जा बराबरी का रहता और न ही आज की आधुनिक जरूरतों की गुंजाइश उसमें रहती। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के फौजी हुक्मरानों ने वहां के मजहबी दकियानूसी लोगों के साथ मिलकर सरकार पर काबिज रहने के रास्ते निकालने पिछली आधी सदी में लगातार जारी रखा और बीच-बीच में अगर कोई चुनी हुई सरकार आई भी तो उसका हाल इसलिए भी खराब रहा कि वह बहुत बुरी तरह बेईमान सरकार रही। पाकिस्तान के हाल को देखें तो मजहब के बोलबाले से बाकी दुनिया के साथ उसका तालमेल कम रहा और उसकी माली हालत ऐसी चौपट रही कि वह अमरीका की जेब पर पलने वाले एक गुलाम की तरह ही चलते रहा और आने वाले अनगिनत बरसों तक उसकी वैसी ही हालत दिखती है।
पाकिस्तान की हालत में और बुरी बात तब जुड़ गई जब उसकी अपनी जमीन पर और पड़ोस के अफगानिस्तान की जमीन पर मजहबी आतंक, अमरीकी फौजी साजिशों के तहत बढ़ाया गया और अफगानिस्तान से कम्युनिज्म खत्म करने के लिए उसे बागियों की एक फौज की तरह खड़ा किया गया। नतीजा यह हुआ कि कम्युनिज्म तो चले गया लेकिन दहशतगर्दी इस कदर काबिज हो गई कि उसने अमरीका की नाक ही काटकर रख दी। अब आज अमरीकी फौजी मनसूबों को मुस्लिम आतंक को खत्म करने के नाम पर पूरी दुनिया में जगह-जगह हमले करने का लायसेंस अमरीकी राष्ट्रपति के हाथों ही मिल गया है और न्यूयॉर्क की अपनी कुछ इमारतों में कुछ हजार बेकसूर लोगों की मौत के एवज में वह दुनिया में अपने फैलाव का ऐसा बड़ा काम कर पा रहा है जैसा कि वह तीसरे विश्वयुद्ध से भी नहीं कर पाता। आज वह आतंक को खत्म करने के नाम पर एक-एक करके तमाम देशों में दखल बढ़ाते जा रहा है और लाखों लोगों की हत्या करते हुए वह एशिया के इस हिस्से पर बाज के खूनी पंजों को मजबूती से जमा चुका है। पाकिस्तान की तमाम विदेश नीति अमरीकी फौजी इरादों के काबू में भी है और अपने देश के भीतर के धर्मांध और कट्टर अलोकतांत्रिक ताकतों के हमले भी वह रात-दिन झेल रही है। इससे परे पाकिस्तान के अपने दीवालिया खस्ता हाल का दबाव भी उस पर है कि गरीबी की तरफ से पाकिस्तान की जनता का ध्यान हटाने के लिए वह समय-समय पर कैसे भारत के खिलाफ नारे लगाता रहे। हम आज दुनिया में कम ही ऐसे देश देखते हैं जिन पर, जिनकी घरेलू और बाहरी नीतियों पर इतने किस्म के अलग-अलग दबाव रहें और इसके बीच वह भारत-पाक जैसे जटिल रिश्तों पर काम करे। ऐसे में अगर एक कमउम्र और खूबसूरत विदेश मंत्री के आने से भारत के लोगों में एक नया जोश आता है तो उसमें हम कोई बुराई नहीं देखते। भारत में विदेश विभाग में महिलाएं लगातार ऊंची कुर्सियां संभालते आई हैं और आज भी उनके चेहरे ऐसी तमाम बातचीत में दिखते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच कई दूसरे किस्म के फर्क हो सकते हैं लेकिन इन दोनों ही देशों में अपने दो और पड़ोसी देशों की तरह महिला प्रधानमंत्री होने की एक परंपरा रही है। पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो, भारत में इंदिरा गांधी के अलावा श्रीलंका और बांग्लादेश में भी महिलाएं इन कुॢसयों पर रहते आई हैं। इसलिए चाहे इस्लामी कायदे हों या कोई और तौर-तरीके, एक महिला की लीडरशिप पाकिस्तान भी पहले देख चुका है। इसलिए पाकिस्तान के भीतर भी यह कोई अनहोनी नहीं हुई है। इन दोनों देशों के बीच हमने यह भी देखा है कि ऊपर लिखी हुई तमाम मुश्किलों से परे ऐसे लोगों की अपनी शख्सियत का फर्क भी बातचीत और रिश्तों पर पड़ा है जो कि इन दोनों मुल्कों में किसी वक्त कुर्सियां संभाले रहे हैं। इसलिए अगर एक ताजा चेहरा लोगों में खुशी लाता है तो यह उसकी किस्म की खुशी है जैसी कि क्रिकेट में होती है या फिल्मों और टेलीविजन के प्रोग्रामों में होती है। भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतरी के लिए अगर एक नई पीढ़ी को बात करने का मौका मिलता है तो इससे जाहिर तौर पर फायदा ही होगा। लेकिन इस एक मामूली फर्क से पाकिस्तान की अनगिनत दिक्कतें बहुत कम हो जाएंगी ऐसा भी हम नहीं समझते।
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