सरकार के पाले में अदालती घुसपैठ

16 जुलाई 2011
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को बदलने और वापस लेने की मांग की जिसमें काले धन से जुड़े सभी मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों वाला विशेष जांच दल बनाने का आदेश दिया गया था। सरकार की ओर से दलील दी गई है कि फैसला अपने दायरे के बाहर जाकर दिया गया और सत्ता के विभाजन के भलीभांति स्थापित सिद्धांत के खिलाफ है। अर्जी में कहा गया है कि दो जजों की इस बेंच ने कार्यपालिका को सौंपे गए कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप किया है और अदालत का फैसला 'इस विधिक सिद्धांत के विपरीत है कि अदालत का काम यह देखना है कि कार्यपालिका कानूनी जिम्मेदारी सही से निभाए ना कि कार्यपालिका को सौंपे गए काम को खुद हाथ में लेना।Ó सरकार के अनुसार, 'यह इस भलीभांति स्थापित सिद्धांत में हस्तक्षेप है कि अदालतें आर्थिक नीति में दखलंदाजी नहीं करतीं जो कि कार्यपालिका का कार्यक्षेत्र है और आर्थिक नीति के मामलों पर फैसले देना अदालत का काम नहीं है जिसे आवश्यक तौर पर विशेषज्ञ संस्थाओं पर छोड़ देना चाहिए।Ó सरकार की दलील है कि अदालतों को न तो आर्थिक नीति की न्यायिक समीक्षा से लेनादेना है और न ही उनके लिए उन विषयों पर विचार देना जरूरी है जो कि कार्यपालिका के दायरे में आते हैं। अदालत के एसआईटी बनाने के फैसले पर विरोध दर्ज कराते हुए दलील दी गई है कि यह निर्देश कार्यपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारियों को समाप्त करेगा। सरकार ने कहा कि कथित आदेश कार्यपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारी और भूमिका को पूरी तरह समाप्त कर सकता है जो खुद संसद के प्रति जवाबदेह है। यह कहा गया है कि अदालत को 'न्यायिक आत्मसंयमÓ बरतना चाहिए क्योंकि वह टैक्स तथा आर्थिक नीतियों से जुड़े मामले को देख रही है।
भारत के लोकतंत्र में हम केंद्र सरकार के ऊपर लिखे गए तर्कों को एक बड़ी दिलचस्प संवैधानिक बहस पा रहे हैं। यह बहुत जरूरी भी है और यह भी जरूरी है कि अदालत को ऐसे फैसले की नौबत कैसे आई और उस फैसले पर केंद्र सरकार को अदालत को इतना सुनाने का मौका क्यों मिला? यहां पर हम अपने कुछ पाठकों की सुविधा के लिए भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी सोच और उस पर बनी व्यवस्था को बताना चाहेंगे। इस देश में विधायिका यानी संसद (और विधानसभाएं), कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका यानी अदालत (और दूसरी संवैधानिक-कानूनी संस्थाएं) इस तरह बनाई गई हैं कि वे एक-दूसरे के लिए एक सीमित जवाबदेही के साथ एक-दूसरे के कामकाज पर कुछ हद तक नजर रखने और जरूरत पडऩे पर कुछ हद तक दखल देने का हक और जिम्मेदारी दोनों रखती हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका में कार्यपालिका ने न्यायपालिका को यह बताने की कोशिश की है कि वह अपने चादर से बाहर पैर फैलाकर सरकार को कोंच रही है जो कि ठीक नहीं है। यह बात पूरी तरह से गलत नहीं है लेकिन साथ ही यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या भारत के संवैधानिक ढांचे में इस तरह की दखल की कोई गुंजाइश बनती है क्या? हम कुछ दिन पहले की एक दूसरी घटना याद करना चाहेंगे जब अन्ना-बाबा के प्रसंग में केंद्र सरकार ने अपनी ही किसी कार्रवाई के लिए जनता के सामने यह सफाई दी थी कि अभूतपूर्व परिस्थितियां, अभूतपूर्व कार्रवाई की जरूरत भी खड़ी करती हैं। हमें लगता है कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ बरसों में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को ताक पर धरकर जिस तरह से अपने संवैधानिक अधिकारों से डकैती का एक पेशा शुरू कर दिया था, उससे उसके अधिकारों का दावा कमजोर भी पड़ा है। हम लोकतंत्र की इन तीन संस्थाओं के बीच के अंतरसंबंधों को लेकर यहां पर बहुत जटिल व्याख्या तो नहीं कर सकते लेकिन साधारण समझ से हमारे मन में यह सवाल उठता है कि जब थानेदार ही डकैत हो जाए तो फिर वह किसी वर्दी का या लालबत्ती का दावा कैसे कर सकता है? मनमोहन सिंह की आज की सरकार, भारतीय संविधान में कार्यपालिका के लिए बनाई गई जिम्मेदारियां पर कहां तक खरी उतर रही है? इसलिए उसका यह दावा हमें कुछ हद तक नाजायज और खासी हद तक बोगस लगता है कि अदालत कार्यपालिका के काम में दखल दे रही है। हम इसे इस तरह से देखते हैं कि अदालत मनमोहन सिंह सरकार के काम में कुछ दखल देने को बेबस है क्योंकि यह सरकार अब संवैधानिक जिम्मेदारियों के तहत एक कार्यपालिका नहीं रह गई है और एक अपराधी की तरह काम कर रही है। जिस देश में आधी आबादी बिना रियायती अनाज के हफ्ते भर में भूख की कगार पर पहुंच जाए वहां पर अगर यह सरकार लाखों करोड़ की लूटपाट के बाद अपने अधिकारों का दावा करे तो हमें उसके अधिकारों से अधिक अदालत की, अदालत पर जिम्मेदारी महत्वपूर्ण लगेगी।
हम भारत की आज की स्थिति को अभूतपूर्व मान रहे हैं। और ऐसे में कुछ अभूतपूर्व संवैधानिक दखल एक-दूसरे के काम में हो सकती है। हम भारतीय लोकतंत्र के भीतर ऐसे तीन टापुओं की कल्पना नहीं करते जो कि एक-दूसरे के काम में दखल न देते हुए एक-दूसरे की जमीन पर होते हुए खुले अपराधों को अनदेखा करके चुप बैठे। अगर संसद के भीतर वोट देने के लिए बाहर नोट लिए जा रहे हैं और सरकार की पुलिस उसकी जांच नहीं कर रही है तो अदालत की फटकार को हम न तो पुलिस के काम में दखल मानते और न ही संसद के काम में। इस देश में संसद की व्यवस्था इतनी बोगस है कि नोट लेकर वोट देने वाले, सवाल पूछने के लिए नोट लेने वाले अपने सांसदों को यह संसद सदस्यता खत्म करने से अधिक कोई सजा नहीं दे पाती, या नहीं देना चाहती क्योंकि बड़ी-बड़ी पार्टियों के सांसद इसमें शामिल थे। इस देश में दूध में पानी मिलाने वाले किसी छोटे से इंसान को कैद हो सकती है लेकिन संसद के अपने हक को मंडी में बेच देने वाले सांसदों को कैद नहीं हुई। इसलिए अदालत के दखल का दायरा कांक्रीट की बनी हुई किसी नहर के किनारों की तरह नहीं है, वह बांग्लादेश के इलाके में हर बाढ़ के बाद बदल जाने वाले किनारों के खेतों की तरह है और बुरा वक्त अदालत को दायरे से बाहर जाकर भी कुछ काम करने पर मजबूर कर सकता है।
हम ऐसी दखल को सैद्धांतिक रूप से बिल्कुल ही अवांछित मानते हैं। तीनों संस्थाओं के बीच ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए लेकिन अगर अदालतों के जज बड़ी संख्या में बेईमानी करते पकड़ाएं तो हो सकता है कि संसद उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के मौजूदा इंतजाम से परे जाकर कोई और कार्रवाई भी सोचे और वैसा कोई कानून बनाए। इसी तरह सरकार भी अदालत के मामले में जहां उसका अधिकार बनता है वहां पर कार्रवाई करके भी दखल देती है और काम न करके भी दखल देती है। जब अदालतों में हजारों कुर्सियां खाली पड़ी हैं और दसियों लाख मामले कतार में खड़े हैं तो लोगों को तैनात न करना भी अदालत के कामकाज में सरकार की एक दखल है। दखल हमेशा कार्रवाई करके नहीं होती है, जरूरी काम को न करके भी दखल होती है।
सरकार की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आगे होने वाली बहस को हम दिलचस्पी के साथ देखेंगे लेकिन इस बीच जो पाठक भारतीय लोकतंत्र को कुछ बेहतर समझना चाहते हैं वे इन तीनों संवैधानिक संस्थाओं को लेकर कुछ साधारण सी किताबें या साधारण से लेख जरूर पढ़ें क्योंकि जनता की जागरूकता के बिना इस देश में कभी भी बेहतर सरकारें नहीं आ पाएंगी। हम इस मामले से परे भी जनता के राजनीतिक शिक्षण के लिए लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था पर बहस की सिफारिश करते हैं।

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