मनमोहन मंत्रिमंडल अपनी नीयत सुधारकर अपनी नियति भी सुधारे

12 जुलाई 2011
मनमोहन मंत्रिमंडल में आज शाम होने जा रहे फेरबदल को लेकर छत्तीसगढ़ की यह उम्मीद पूरी हुई है कि इस राज्य से कोई केंद्रीय मंत्री रहे। हालांकि हम यह नहीं मानते कि किसी राज्य से केंद्रीय मंत्री होने पर भी केंद्र सरकार से उस राज्य को उसका हक मिलना चाहिए। भारत का संघीय ढांचा व्यक्तियों से ऊपर है और डॉ. चरण दास महंत के मंत्री बनने के बिना भी छत्तीसगढ़ को केंद्र सरकार से न तो कोई खास शिकायत रही और न ही यहां का कोई काम रूका। लेकिन छत्तीसगढ़ में प्रमुख विपक्षी पार्टी कांगे्रस के हिसाब से देखें तो पिछले सात बरसों के देश के यूपीए कार्यकाल में इस राज्य से किसी को भी मंत्री न बनाना कांगे्रस की कम अक्ल और बददिमागी दोनों ही रही। कोई पार्टी इस राज्य को इस कदर अनदेखा करे तो उसका यही नतीजा होना भी था कि यहां के चुनावों में मतदाता कांगे्रस को ठिकाने लगाते रहे। वैसे किसी के मंत्री बनने से उस राज्य में उसकी पार्टी की चुनावी संभावनाओं में पार्टी का फायदा भी हो सकता है और नुकसान भी। यह तो मंत्री के निजी व्यवहार, उसके सार्वजनिक आचरण और उसके संसदीय या सरकारी कामकाज पर निर्भर करता है कि उसके मंत्री बनने से उसकी पार्टी पर क्या असर पड़ेगा। इसलिए केंद्र सरकार में चरण दास महंत के काम के पहले ही दिन हम इस बात को लिखना चाहते हैं कि घोटालों में डूबी यूपीए सरकार के भीतर वे यशस्वी हों। उनके मंत्री बनने से कांगे्रस के भीतर का वह तबका भी कुछ शांत होगा जो पिछले कई बरसों से महंत को हाशिए पर धकेलने की कोशिश करते हुए उसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि साबित कर रहा था। इस मौके पर ही हम कांगे्रस पार्टी द्वारा छत्तीसगढ़ की इस अनदेखी की चर्चा भी करना चाहते हैं कि उसने इस राज्य से दो ऐसे बुजुर्ग लोगों को राज्यसभा में भेजा है जो यहां रहते नहीं हैं और जिनमें से एक का छत्तीसगढ़ से कोई लेना-देना भी नहीं रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार से इस राज्य के लोगों का अगर कोई वास्ता पडऩा था तो उसके लिए छत्तीसगढ़ में कांगे्रस कमजोर थी। इसलिए महंत के मंत्री बनने से उनके गुट, उनकी पार्टी और उनके चुनाव क्षेत्र के खुश होने का मौका तो है ही, दिल्ली से काम पडऩे वाले लोगों को भी इस राज्य में अब एक ठिकाना मिलेगा और हम उम्मीद करते हैं कि बरसों बाद पूरी हो रही इस जरूरत को पूरा करने के लिए महंत कोशिश भी करेंगे।
यूपीए से मंत्रियों का जाना, नए मंत्रियों का आना और उनके विभागों का फेरबदल उम्मीद के मुताबिक ही हुआ है। यह इस मंत्रिमंडल के लिए एक किस्म से मध्यावधि फेरबदल है जिसके बाद यह सरकार मंत्रियों से बेहतर कामकाज की उम्मीद शायद करेगी। इस बीच मनमोहन सिंह के इस बार के कार्यकाल में जितने किस्म के घपले सामने आए हैं उनसे भी हमें ऐसा लगता है कि उनकी सरकार सबक लेकर सावधानी और ईमानदारी से काम करेगी। हम सिर्फ सावधानी की बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि सावधान तो एक चोर भी होता है। हम उन दोनों खूबियों के साथ-साथ चलने की बात कर रहे हैं। यह सरकार गठबंधन की सीमाओं के भीतर काम कर रही है जिसे हर कोई जानता है। ऐसी राजनीति में गठबंधन धर्म का पालन करना जैसी भाषा का इस्तेमाल अक्सर होता है। लेकिन यूपीए ने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की लीडरशिप में गठबंधन अधर्म का पालन करते हुए अपने गठबंधन के साथियों को मंत्रालय उसी तरह बांटे थे जिस तरह कि लोग जमींदारी या जागीरदारी बांटते थे। इस तरह की चर्चा अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह मंत्रिमंडल में भी होती थी जहां पर यह माना जाता था कि मध्यप्रदेश विद्युत मंडल कमलनाथ को एक जागीर की तरह दे दिया गया है और उस पर किसी और का कोई बस नहीं है। वही वजह थी कि अकेले छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र में इतने बिजली के कनेक्शन सिंचाई पंपों के लिए दिए गए थे जितने कि पूरे छत्तीसगढ़ को भी नहीं दिए गए थे। लेकिन यह बात तो विकास के कामों की थी, केंद्र सरकार का आज का हाल देखें तो लाखों करोड़ रुपए के घपलों के साथ उसके बड़े-बड़े मंत्री और उसके डकैत सरीखे कलमाड़ी जेल में हैं और प्रधानमंत्री अपने साफ धुले हुए हाथ दिखाते हुए मौन खड़े हैं।
हमारा मानना है कि इस नए मंत्रिमंडल की शुरुआत में ही यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सभी मंत्रियों के सामने यह बात साफ करनी चाहिए कि इस सरकार के बचे हुए कार्यकाल में और अधिक मंत्रियों को तिहाड़ जेल न जाना पड़े और वे अपने ही सरकारी बंगलों में ऐश-आराम के साथ रहें। व्यक्तियों और विभागों से उतना बड़ा फर्क सरकार के कामकाज पर नहीं पड़ता है जितना कि काम करने वाले लोगों की नीयत से पड़ता है। इसलिए इस सरकार को अपने तमाम मंत्रियों को ऐसा स्याहीसोख्ता देना चाहिए जिससे कि वे अपनी लार सोख सकें। अगर इस गठबंधन को अगले चुनाव में जीतने की नौबत के आसपास भी कहीं पहुंचना है तो उसे बचे हुए बरस बिना किसी बड़े घोटाले के निकालने होंगे वरना चुनाव के वक्त किसी अन्ना-बाबा की जरूरत नहीं पड़ेगी और जनता खुद ही इसे खारिज कर देगी। जहां तक हमें याद पड़ता है, आजाद भारत में पहली बार किसी सरकार की ईमानदारी के मोर्चे पर इतनी खराब साख है। हो सकता है कि इससे पहले की कोई सरकार इससे अधिक बेईमान भी रही हो लेकिन वैसा कोई खुलासा देश के सामने नहीं हो पाया इसलिए हम पहले की सरकारों को संदेह का लाभ देते हुए आज की केंद्र सरकार को आजाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार मानते हैं। इस हालत को मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी किस तरह सुधार सकते हैं इसी से ही हम इन दोनों की निजी ईमानदारी को भी आंकेंगे। इस नए मंत्रिमंडल के साथ इस सरकार के लिए हमारी यही शुभकामना है कि वह अपनी नीयत सुधारकर अपनी नियति भी सुधारे।

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