21 जुलाई 2011
कर्नाटक की भ्रष्ट भाजपा सरकार की करतूतों पर वहां के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने मुहर लगाते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री और उनके कई मंत्री खुदाई के भ्रष्टाचार में शामिल हैं। यह रिपोर्ट अभी औपचारिक रूप से जारी नहीं हुई है लेकिन इसके छप जाने पर लोकायुक्त ने इसका खंडन भी नहीं किया है। उनकी तमाम बातें लोगों के अंदाज के मुताबिक ही हैं कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और उनका परिवार, उनके मंत्री, जनतादल (एस) के पिछले मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी और कई दूसरे लोग खुलकर इस राज्य के खनिज की लूटपाट में लगे हुए थे। लेकिन यहां पर जो नई बात सामने आई है वह इस रिपोर्ट से परे की है। और ये नई बातें एक अलग से कार्रवाई की मांग भी करती हैं। लोकायुक्त ने मीडिया से बात करते हुए कल साफ-साफ शब्दों में कहा कि उनके टेलीफोन राज्य सरकार टैप करवा रही है। दूसरी बात उन्होंने कही कि कर्नाटक के एक मंत्री ने उनसे मिलकर यह अपील की कि वे अपनी रिपोर्ट से मुख्यमंत्री को बाहर रखें। ये दोनों बातें हमारे हिसाब से भारत की एक संवैधानिक सत्ता के खिलाफ आपराधिक और अनैतिक हरकत हैं और इन दोनों पर सजा की बात बनती है।
कर्नाटक के बारे में इस रिपोर्ट के छपने के पहले भी किसी का यह मानना नहीं था कि वहां की भाजपा सरकार अवैध खुदाई के मामले में सजा से कम किसी भी बात की हकदार है। अब एक दिक्कत भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने यह आ खड़ी हुई है कि वह देश में ईमानदारी को लेकर जो बयान दे रहा है, जिस तरह अन्ना हजारे और जस्टिस हेगड़े वाली लोकपाल कमेटी पर अन्ना हजारे का साथ दे रहा है, वह कर्नाटक में अब क्या करेगा? हमने यह बात उस वक्त भी लिखी थी जब अन्ना हजारे की टोली एक पूरी तरह अलोकतांत्रिक तरीका अपनाकर जिसके खिलाफ चाहे उसके खिलाफ बयान दे रही थी और चूंकि भाजपा उनके निशाने से बाहर थी इसलिए वह उसका मजा ले रही थी। लेकिन अब अन्ना टोली के हेगड़े का निशाना सीधा-सीधा भाजपा के मुख्यमंत्री पर है, मंत्रियों पर है और पूरी भाजपा सरकार पर है कि किस तरह उसने कर्नाटक को लूटा है, इसलिए अब दिल्ली में भाजपा को इस रिपोर्ट पर अपना रूख जनता के सामने रखना होगा। हमारा मोटे तौर पर यह मानना है कि भाजपा कर्नाटक में कार्रवाई करने में वैसे भी बहुत देर कर चुकी है और भ्रष्टाचार का धब्बा उस पर काफी बड़ा लग चुका है। वह चाहे तो अब भी लोकायुक्त की रिपोर्ट को खारिज करके अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जारी रख सकती है लेकिन इसके बाद यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर उसकी कही किसी भी बात की विश्वसनीयता शून्य रहेगी।
ऐसा भी नहीं है कि भारत की राजनीति में लोकायुक्त की रिपोर्ट को खारिज न किया गया हो। कई बरस पुरानी बात है जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री के अपने पहले कार्यकाल में अपने मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ आई लोकायुक्त की रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और उस पर कोई भी कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था। अभी-अभी हमने दिल्ली की रिपोर्ट छापी है कि किस तरह वहां की शीला दीक्षित की कांगे्रस सरकार लोकायुक्त की रिपोर्ट को कूड़ेदान में डालकर अपने भ्रष्ट मंत्री को जारी रखे चल रही है। इसलिए कर्नाटक में भाजपा अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को जारी रखने का एक जवाबी हक तो भारतीय राजनीति के तहत पा चुकी है लेकिन इससे यूपीए सरकार और उसकी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार पर वह आगे कुछ नहीं बोल पाएगी।
यहां पर एक बार फिर देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ आज चारों तरफ बने हुए माहौल पर नजर डालने की जरूरत है और यह सोचने की जरूरत है कि जनता राजनीतिक दलों से आज क्या उम्मीद करती है। अगर हर पार्टी अपने-अपने भ्रष्ट लोगों को इसी तरह बचाते चलेगी तो पूरा देश इन लोगों के हाथों लुटते चलेगा। इसलिए आज न सिर्फ जनता के एक दबाव की जरूरत है बल्कि उस अदालत के दखल की भी जरूरत है जिसे हम सैद्धांतिक आधार पर सरकारी अधिकार क्षेत्र से बाहर रखना पसंद करेंगे। जब देश की सरकारें आखिरी सांस तक अपने भ्रष्टाचार को जारी रखने पर उतारू हैं तब अगर अदालती दखल भी नहीं होगी तो किसी दिन इस देश में जंगलों से परे भी नक्सली खड़े होंगे या फिर पुलिस और फौज भ्रष्ट सरकारों की बात सुनने से मना कर देंगी।
भाजपा को बिना देर किए अपने इस मुख्यमंत्री को बर्खास्त करना चाहिए और उन मंत्रियों को भी बर्खास्त करना चाहिए जो कि अवैध खुदाई की काली कमाई से इतने ताकतवर हो गए हैं वे जाहिर तौर पर पार्टी को जेब में लेकर चल रहे हैं। यह सिलसिला भाजपा को काफी बदनामी दिला चुका है और इससे चुनाव में उसके खिलाफ एक बहुत बड़ा नारा उसके विरोधी दलों के हाथ रहेगा। कमल और कीचड़ में से भाजपा को एक छांटने की नौबत आ चुकी है।
कर्नाटक की भ्रष्ट भाजपा सरकार की करतूतों पर वहां के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने मुहर लगाते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री और उनके कई मंत्री खुदाई के भ्रष्टाचार में शामिल हैं। यह रिपोर्ट अभी औपचारिक रूप से जारी नहीं हुई है लेकिन इसके छप जाने पर लोकायुक्त ने इसका खंडन भी नहीं किया है। उनकी तमाम बातें लोगों के अंदाज के मुताबिक ही हैं कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और उनका परिवार, उनके मंत्री, जनतादल (एस) के पिछले मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी और कई दूसरे लोग खुलकर इस राज्य के खनिज की लूटपाट में लगे हुए थे। लेकिन यहां पर जो नई बात सामने आई है वह इस रिपोर्ट से परे की है। और ये नई बातें एक अलग से कार्रवाई की मांग भी करती हैं। लोकायुक्त ने मीडिया से बात करते हुए कल साफ-साफ शब्दों में कहा कि उनके टेलीफोन राज्य सरकार टैप करवा रही है। दूसरी बात उन्होंने कही कि कर्नाटक के एक मंत्री ने उनसे मिलकर यह अपील की कि वे अपनी रिपोर्ट से मुख्यमंत्री को बाहर रखें। ये दोनों बातें हमारे हिसाब से भारत की एक संवैधानिक सत्ता के खिलाफ आपराधिक और अनैतिक हरकत हैं और इन दोनों पर सजा की बात बनती है।
कर्नाटक के बारे में इस रिपोर्ट के छपने के पहले भी किसी का यह मानना नहीं था कि वहां की भाजपा सरकार अवैध खुदाई के मामले में सजा से कम किसी भी बात की हकदार है। अब एक दिक्कत भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने यह आ खड़ी हुई है कि वह देश में ईमानदारी को लेकर जो बयान दे रहा है, जिस तरह अन्ना हजारे और जस्टिस हेगड़े वाली लोकपाल कमेटी पर अन्ना हजारे का साथ दे रहा है, वह कर्नाटक में अब क्या करेगा? हमने यह बात उस वक्त भी लिखी थी जब अन्ना हजारे की टोली एक पूरी तरह अलोकतांत्रिक तरीका अपनाकर जिसके खिलाफ चाहे उसके खिलाफ बयान दे रही थी और चूंकि भाजपा उनके निशाने से बाहर थी इसलिए वह उसका मजा ले रही थी। लेकिन अब अन्ना टोली के हेगड़े का निशाना सीधा-सीधा भाजपा के मुख्यमंत्री पर है, मंत्रियों पर है और पूरी भाजपा सरकार पर है कि किस तरह उसने कर्नाटक को लूटा है, इसलिए अब दिल्ली में भाजपा को इस रिपोर्ट पर अपना रूख जनता के सामने रखना होगा। हमारा मोटे तौर पर यह मानना है कि भाजपा कर्नाटक में कार्रवाई करने में वैसे भी बहुत देर कर चुकी है और भ्रष्टाचार का धब्बा उस पर काफी बड़ा लग चुका है। वह चाहे तो अब भी लोकायुक्त की रिपोर्ट को खारिज करके अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जारी रख सकती है लेकिन इसके बाद यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर उसकी कही किसी भी बात की विश्वसनीयता शून्य रहेगी।
ऐसा भी नहीं है कि भारत की राजनीति में लोकायुक्त की रिपोर्ट को खारिज न किया गया हो। कई बरस पुरानी बात है जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री के अपने पहले कार्यकाल में अपने मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ आई लोकायुक्त की रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और उस पर कोई भी कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था। अभी-अभी हमने दिल्ली की रिपोर्ट छापी है कि किस तरह वहां की शीला दीक्षित की कांगे्रस सरकार लोकायुक्त की रिपोर्ट को कूड़ेदान में डालकर अपने भ्रष्ट मंत्री को जारी रखे चल रही है। इसलिए कर्नाटक में भाजपा अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को जारी रखने का एक जवाबी हक तो भारतीय राजनीति के तहत पा चुकी है लेकिन इससे यूपीए सरकार और उसकी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार पर वह आगे कुछ नहीं बोल पाएगी।
यहां पर एक बार फिर देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ आज चारों तरफ बने हुए माहौल पर नजर डालने की जरूरत है और यह सोचने की जरूरत है कि जनता राजनीतिक दलों से आज क्या उम्मीद करती है। अगर हर पार्टी अपने-अपने भ्रष्ट लोगों को इसी तरह बचाते चलेगी तो पूरा देश इन लोगों के हाथों लुटते चलेगा। इसलिए आज न सिर्फ जनता के एक दबाव की जरूरत है बल्कि उस अदालत के दखल की भी जरूरत है जिसे हम सैद्धांतिक आधार पर सरकारी अधिकार क्षेत्र से बाहर रखना पसंद करेंगे। जब देश की सरकारें आखिरी सांस तक अपने भ्रष्टाचार को जारी रखने पर उतारू हैं तब अगर अदालती दखल भी नहीं होगी तो किसी दिन इस देश में जंगलों से परे भी नक्सली खड़े होंगे या फिर पुलिस और फौज भ्रष्ट सरकारों की बात सुनने से मना कर देंगी।
भाजपा को बिना देर किए अपने इस मुख्यमंत्री को बर्खास्त करना चाहिए और उन मंत्रियों को भी बर्खास्त करना चाहिए जो कि अवैध खुदाई की काली कमाई से इतने ताकतवर हो गए हैं वे जाहिर तौर पर पार्टी को जेब में लेकर चल रहे हैं। यह सिलसिला भाजपा को काफी बदनामी दिला चुका है और इससे चुनाव में उसके खिलाफ एक बहुत बड़ा नारा उसके विरोधी दलों के हाथ रहेगा। कमल और कीचड़ में से भाजपा को एक छांटने की नौबत आ चुकी है।
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