21वीं सदी की रामलीला का मुखौटा


23  अप्रैल 2012
बहुत पहले से कुछ लोगों को बयां करते हुए एक बात लिखी जाती रही है-आर्मचेयर इंटेलेक्चुअल। यह बात उनके लिए कही जाती है जो किसी जमीनी हकीकत से जुड़े बिना महज बहस करते हैं और जिनकी असलियत की समझ कमजोर मानी जाती है। ऐसा ही एक दूसरा वाक्य इन दिनों इस्तेमाल होता है, इलीटिस्ट एक्टीविस्ट। इसका मतलब है कि भद्रलोक के सामाजिक कार्यकर्ता, या कि कुलीन तबकों के लोग जो कि बैनर थामें सड़कों पर दिखें। 
आज के माहौल में इन दोनों बातों को कदम-कदम पर देखा जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता होना एक समय सामाजिक सरोकार के साथ समर्पण, समाजसेवा या त्याग की बात रहती थी, अब सामाजिक कार्यकर्ता होना एक पेशा हो गया है और इसके लिए देश के बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों में सामाजिक कार्यकर्ता बनने के बड़े-बड़े कोर्स चलते हैं और उनमें दाखिले के लिए खूब मारामारी रहती है। पचीस-पचास बरस पहले किसने सोचा होगा कि सामाजिक कार्यकर्ता बनने पांच बरस की पढ़ाई लगती है वह भी बहुत मुश्किल से मिले दाखिले के बाद।
लेकिन आज की बात इससे थोड़ी सी हटकर है। 
इन दिनों हॉलीवुड के एक्टरों से लेकर भारत के अरबपतियों तक, बहुत से लोगों की तस्वीरें फटे हुए कपड़ों में छपती हैं। जब अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान तक कोशिश करके फाड़ी हुई जींस पहनते हैं, जिनका कहीं तेजाब डालकर रंग उड़ाया जाता है तो कहीं पत्थर से घिसकर उसके धागों को चिथड़ा किया जाता है, तो सवाल यह उठता है कि इसके पीछे सोच क्या है? जब लोग बहुत अधिक संपन्न हो जाते हैं, और उनकी संपन्नता उनकी सामाजिक और नैतिक हिंसा की तरह दिखने लगती हैं, तो बहुत से लोगों को एक गरीबी ओढ़कर चलना जरूरी लगता है। लोग संपन्न और ताकतवर तो हो जाते हैं, लेकिन वे इस दर्जे के साथ जनता की, कमजोर तबके की, जुड़ी हुई हिकारत को जानते हुए अपने-आपको इस तबके से किसी न किसी तरह जुड़ा हुआ बताने वाली सोच को मुखौटे की तरह लगाकर भी चलते हैं। जब बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति गरीबों जैसे कपड़े पहन लेते हैं, गरीबों के मुद्दों पर काम करने लगते हैं, तो अपनी हिंसक संपन्नता से उपजी आत्मग्लानि से मुक्त होने का काम भी वे करते हैं। इसलिए जब आभिजात्य वर्ग या कुलीन तबके या भद्रलोक के लोग सामाजिक कार्यकर्ता बनते हैं तो फिर इसके पीछे, कम से कम कुछ मामलों में, अपनी शर्मिंदगी से उबरने की उनकी जरूरत भी रहती है।
इलीटिस्ट एक्टीविस्ट शब्द ऐसे ही लोगों के लिए इस्तेमाल होता है और मेरा ख्याल है कि ऐसे लोग जरूरतमंद तबकों के साथ एक और बेइंसाफी होते हैं। इसलिए कि इसके बाद गरीबी पर भी गरीब का एकाधिकार नहीं रह जाता, उसकी गरीबी की परिभाषा भी अमीर तय करने लगते हैं, उसकी जरूरतों को भी अमीर तय करते हैं, उसकी समस्याओं और उनके समाधान भी अमीर तय करते हैं, जो आमतौर पर यह सोचने की काबिलीयत रखते हैं कि डबलरोटी नहीं है तो लोग केक क्यों नहीं खा लेते। 
इस्तेमाल हो-होकर घिस जाने वाली या फट जाने वाली जींस या टी-शर्ट का उतना इस्तेमाल तो फैशनेबुल तबका तो कभी कर नहीं पाता है, उसे तो रोज-रोज नए कपड़े लेने रहते हैं, इसलिए कारखानों में ही फाड़े गए कपड़े उनको सुहाते हैं। बाजार में बरसों से ऐसी जींस भी हैं जो कि सचमुच इस्तेमाल की हुई हैं और ऐसी घिसी हुई इस्तेमाल की गई जींस नई जींस से कई गुना महंगी भी हैं। एक तो ब्रांड ही 'यूज्डÓ (इस्तेमाल हो चुकी) नाम का है। अब जब गरीब का अपनी गरीबी पर भी एकाधिकार नहीं रह गया तो फिर उसकी हालत उस दलित जैसी हो गई है जिस पर सवर्ण तबके की लिखी गई किताबें बाजारों में हैं और अब जिसके खिलाफ दलितों ने यह कहना शुरू किया है कि गैरदलित लेखक दलितों के मुद्दों पर न लिखें। मैं इस तर्क से तो सहमत नहीं हूं, लेकिन मैं इस नौबत की हकीकत को सच मानता हूं कि गैरदलितों ने दलितों को ऐसा सोचने की काफी वजहें दी हैं। 
अब यह वक्त आ गया है जब ऐसी सामाजिक मांग उठे कि संपन्न तबका गरीब बनने जैसे फैशन को छोड़े, कुलीन तबका सामाजिक कार्यकर्ता बनने का नाटक छोड़े। यह कुछ उसी तरह की नौबत होगी जिस तरह इस देश के दलितों ने पौन सदी पहले ही गांधी से यह कह दिया था कि वे उन्हें हरिजन कहना बंद करें। दलित तबके को हरिजन शब्द से कड़ी आपत्ति है और वे गांधी की इस भाषा को पूरी तरह खारिज भी करता है। जिस हरि ने अपने सवर्ण पुजारियों के राज में दलितों को दरवाजे के बाहर ही रखा उस हरि का जन भला क्यों होना चाहे?
आज फटे कपड़े पहनने वाले अमीरों से इतना तो जरूर पूछना चाहिए कि क्या वे गरीब के पास उसका हुलिया भी बाकी नहीं रहने देंगे? क्या वे गरीब से उसका हुलिया तक छीन लेना चाहते हैं? और यह कि जिस तरह के कपड़े वे पहन रहे हैं क्या उन्होंने उस तबके के लिए इतना कुछ किया है कि उनके खुद के पास अब सिर्फ ये फटे कपड़े ही रह गए हैं? ऐसे इलीटिस्ट एक्टीविस्ट से यह पूछा जाना चाहिए कि जिन सरोकारों को लेकर वे काम करते हैं और बातें करते हैं उनको निपटाने के लिए उन्होंने अपनी कमाई का कितना हिस्सा खर्च किया है? या फिर वे इससे सिर्फ प्रचार पाने का एक मकसद पूरा कर रहे हैं?
आज संपन्न हो चुके ताकतवर तबके को अपने सामाजिक सरोकार का मुखौटा बनाने के लिए गरीबों की तकलीफों की लुग्दी उसी तरह लगती है जिस तरह अखबारों की लुग्दी से रामलीला के मुखौटे बनाए जाते हैं। आज सामाजिक सरोकार के कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें सामाजिक समानता से दूर बैठा तबका माला के मनकों की तरह फेरते रहता है और यह साबित करने को अपना हक मान लेता है कि वह गरीबों का, कुचले हुए लोगों का हमदर्द है, हमकदम है, हमसफर है। जबकि हकीकत यह होती है कि आभिजात्य तबके के हम में गरीब का ग भी नहीं होता, सरोकार का स भी नहीं होता। 
अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, अपने लिए उस मंच, उस माईक, उस माला, उस महत्व और उस महिमा को जुटाने के लिए लोग गरीबों के मसीहा बन जाते हैं जिनको कि वे अपनी अमीरी से नहीं खरीद पाते। ऐसे पाखंड को खड़ा करने और फिर उसे प्रतिष्ठित करने की ताकत भी इनकी संपन्नता में होती है। इसलिए आज बहुत से करोड़पति और अरबपति लोगों को तथाकथित समाजसेवा में लगे देखा जा सकता है और जब तक कोई उनसे यह न पूछे कि अपनी कमाई का कितना हिस्सा वे इस समाजसेवा में लगा रहे हैं, तब तक वे एक प्याऊ खोलकर वाहवाही की तस्वीरें छपवा सकते हैं। 
मेरी एक दोस्त एक अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस की एयरहोस्टेस का काम छोड़कर अब इमेज काउंसलिंग का काम शुरू कर रही है। इसका मकसद है कि लोग कैसे अपनी छवि सुधारें। और छवि सुधारने का एक आसान तरीका यह होता है कि अपने-आपको  जमीन, जल, जंगल, जानवर और जनता की तकलीफों से जुड़ा हुआ साबित करना। आज अमरीका की कारोबारी दुनिया में जब कभी किसी कंपनी के लिए मुखिया की तलाश होती है, तो ऐसे तमाम नामों को सबसे पहले रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है जिनका कि समाजसेवा का कोई इतिहास नहीं होता। कारोबारी अमरीका भी यह मानकर चलता है कि समाज में सम्मान पाने के लिए एक कारोबारी को भी अपने-आपको गरीबों का हमदर्द साबित करना है। इसलिए वहां के बड़े सफल कारपोरेट लीडर भी अपनी ऐसी छवि बनाने में लगे रहते हैं, और भारत में मेरी जो दोस्त छवि सलाहकार का काम शुरू करने जा रही है, वह भी ऐसे ही लोगों के लिए है।
मतलब यह कि फटी हुई जींस, गरीबों की तरह उठना-बैठना, सरोकार की बातें करना, पेपर की लुग्दी से बना हुआ एक और मुखौटा है जो कि इक्कीसवीं सदी की रामलीला में जरूरी सा हो गया है। 

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