नक्सल-वार्ता के कुछ पहलू


30 अप्रैल 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के अगवा कलेक्टर की रिहाई के लिए नक्सलियों और राज्य सरकार के बीच चल रही बातचीत पर छत्तीसगढ़ की मीडिया और लोगों के बीच कुछ बेचैनी है। आज सुबह से अचानक यह चर्चा शुरू हुई कि बातचीत असफल हो गई है। जब तक इस अफसर के नक्सल-कब्जे में ठीक-ठाक रहने की खबर आती है तब तक बातचीत को असफल नहीं कहा जा सकता। और हमने अभी-अभी इसी बस्तर जिले से लगे हुए उड़ीसा में देखा है कि किस तरह एक विधायक की रिहाई बातचीत के एक महीने से अधिक हो जाने के बाद हुई है। इसलिए मीडिया और जनता दोनों को यह समझना होगा कि उग्रवादियों और आतंकियों से रिहाई की कोशिशें हर घंटे या हर दिन सफल और असफल के पैमाने पर नापना ठीक नहीं होता क्योंकि ऐसी बातचीत की कामयाबी या नाकामयाबी रिहाई से अलग भी कई तरह से होती है। दो पक्षों के बीच बातचीत ऐसी जमीन बनना भी कोई छोटी बात नहीं है और ऐसे अप्रिय अनुभव से भी सरकार को रिहाई की बातचीत की रणनीति तो सीखने-समझने मिल रही है, उसे शायद पहली बार नक्सलियों के पक्ष को औपचारिक रूप से अपने टेबिल पर देखने का मौका भी मिल रहा है। अभी तक नक्सलियों की जो मांगें सामने आ रही हैं उनको अगर देखें तो सरकार को यह मौका भी मिल रहा है कि वह अपनी पिछले बरसों की कार्रवाई का विश्लेषण कर सके और यह देख सके कि क्या किसी स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों से कोई ज्यादतियां भी हुई हैं।
यह बातचीत न तो बहुत आसान है और न ही इसके आसान होने की उम्मीद कोई समझदार कर सकता था। एक कलेक्टर की जिंदगी जब दांव पर लगी हुई है, तब नक्सलियों से ऐसी बातचीत छत्तीसगढ़ का पहला ही अनुभव है। इस राज्य में वैसे तो शहरी लोगों की भावनाएं नक्सल इलाकों में मारे जाने वाले बेकसूर लोगों के बारे में साल-छह महीने में एक बार की मोमबत्ती-रैली तक सीमित है और उसके बाद बाकी वक्त शहरी-संपन्न जनता नक्सल खबरों को भीतर के पन्नों के लायक ही मानती है। और ये खबरें मौत के आंकड़ों तक सीमित रहने की उम्मीद वे लोग करते हैं जो नक्सल इलाकों से दूर अपने घरों में महफूज बैठे हैं। ऐसे में राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी  के सामने राज्य का प्रमुख विपक्षी दल कई तरह के सवाल भी खड़े कर रहा है। जैसा कि अपहरण से रिहाई के बीच किसी भी देश-प्रदेश में सरकार एक सिर्फ शिकस्त की नौबत में रहती है, छत्तीसगढ़ में भी कमोबेश वही हाल है। अगर अपने अफसर को  बचाने के लिए और जल्दी छुड़ाने के लिए राज्य सरकार तेजी से नक्सल मांगों को मान लेती है और दर्जनों या सैकड़ों नक्सलियों को रिहा कर देती है तो राज्य के सुरक्षा अधिकारियों और कर्मचारियों का हौसला पस्त होगा। दूसरी तरफ अगर कलेक्टर के साथ किसी तरह की अनहोनी होती है तो सरकार पर यह आंच आएगी कि औने-पौने संदिग्ध नक्सलियों को जेल में रखने की जिद में उसने एक अफसर की जान चली जाने दी। ऐसी नौबत में बातचीत एक बहुत ही हुनर का काम होती है और हमारी शुभकामनाएं हैं कि राज्य सरकार के चुने हुए वार्ताकार ऐसे हुनरमंद हों।
हम कुछ दिन पहले ही इस मुद्दे पर कुछ बातें लिख चुके हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में इस पर सनसनी इतनी है, और आगे छत्तीसगढ़ में इस तरह के खतरे की गुंजाइश इतनी अधिक है कि इस मुद्दे पर दुबारा लिखना भी जगह की बर्बादी नहीं है। राज्य सरकार को अपहरण के ऐसे मामलों में रिहाई के लिए आतंकी और उग्रवादी मांगों को लेकर अपनी एक नीति बनानी चाहिए। अगर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग  फैसले हर बार लिए जाएंगे तो एक नौबत ऐसी आएगी जब एक छोटे कर्मचारी की जान शायद चली जाए और सरकार पर यह तोहमत आए कि बड़े अफसर को बचाने के लिए उसने सबकुछ किया और किसी छोटे कर्मचारी को मर जाने दिया। झारखंड में कुछ महीने पहले ही ऐसी एक घटना नक्सल मोर्चे पर हुई थी। इसलिए राज्य सरकार को एक पारदर्शी और पूर्व घोषित नीति बनानी चाहिए ताकि उस पर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, अपने-पराए जैसे भेदभाव का आरोप न लगे।
हम अभी चल रही बातचीत को एक बहुत ही अच्छी नौबत मानते हैं और न सिर्फ सरकार को, बल्कि नक्सलियों को भी इस मौके पर जनहित में एक समझदारी दिखानी चाहिए और गरीब आदिवासियों की भलाई के मुद्दों पर सहमति के किनारे तक पहुंचना चाहिए। आज इस बातचीत से बाहर बैठी हुई कांगे्रस पार्टी को भी चाहिए कि वह छोटी-छोटी बातों पर राजनीति न करे और अमनचैन के लिए एक सैद्धांतिक तरीका अपनाए। दुनिया के तमाम समझदार देशों में आतंक से निपटने के लिए, किसी हमले के मौके पर दलीय राजनीति को अलग रखकर एक व्यापक जनहित से काम करना चाहिए।

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