09 अपै्रल 2012
संपादकीय
हरियाणा के सोनीपत में जब स्कूल के एक लड़के को नकल कराने के लिए एक शिक्षक तैयार नहीं हुआ तो उसके दो दोस्तों ने स्कूल से पैदल लौटते इस शिक्षक को कार से कुचलकर मार डाला। स्कूल की पढ़ाई को लेकर यह ऐसी भयानक खबर है, कि जिससे जगह-जगह शिक्षकों का दिल दहल जाए। आखिर इस देश में कोई किस हिम्मत से गलत काम को रोकने का हौसला दिखाएगा? ताकत जब लोगों के सिर पर चढ़कर बोलती है, जब पैसे वालों की गाडिय़ों के इंजन के हॉर्सपॉवर उनके खुद के पॉवर बन जाते हैं तो ऐसी मशीनी हिंसक बददिमागी का मुकाबला कोई खाली हाथ इंसान कैसे कर सकते हैं?
भारत में अगर हम उत्तर और दक्षिण के राज्यों की अलग-अलग सामाजिक संस्कृति की बात करते हैं तो लोगों को वह देश के एक विभाजन जैसी बात लगती है। लेकिन यह हकीकत है कि उत्तर भारत के राज्य, दक्षिण के मुकाबले अधिक किस्म की हिंसा से, सामाजिक अराजकता से घिरे हुए हैं। उत्तरप्रदेश से आए दिन खबर आती है कि किस तरह किसी विधायक या सांसद के लोगों ने कार से कुचलकर किसी पुलिस वाले को मार डाला, या कोई विधायक घोड़े पर सवार होकर भीड़ भरे रेलवे प्लेटफार्म पर दहशत फैला रहा है। और ये तो कैमरों में कैद कुछ गिनी-चुनी वारदातें हैं। उत्तरप्रदेश में अमिताभ बच्चन के पिछली बार के इस नारे के खोखलेपन को हर कोई जानता था कि यूपी में दम है, क्योंकि जुर्म यहां कम है। इस यूपी और इसके पड़ोसी बिहार में सत्ता की बददिमागी के चलते जुर्म का ऐसा माहौल बना हुआ था। बिहार से लालू यादव का तानाशाह राज खत्म हुआ तो नीतीश कुमार के आते ही उस किस्म की अराजकता मानो रातों-रात खत्म हो गई। पुलिस भी वही थी और बदमाश भी वही थे, वहीं थे, फिर भी मानो जमीन-आसमान का फर्क पड़ गया। इससे जाहिर है कि किसी भी इलाके में अगर वहां की सत्ता हांक रहे लोग जुर्म को बढ़ावा नहीं देते हैं, अपराधियों को बचाते नहीं हैं तो उससे माहौल में बहुत बड़ा फर्क पड़ जाता है।
आज की यह बात एक दूसरी पहलू पर भी होने की जरूरत है। एक स्कूल में एक छोटे से इम्तिहान में नकल करने को इतना जरूरी मान लिया गया कि उसके न हो पाने पर कत्ल कर दिया गया। इससे यह भी पता लगता है कि देश भर में जगह-जगह, जहां-जहां ताकतवर तबके की चलती है वह स्कूल और कॉलेज के इम्तिहानों, नौकरी के इम्तिहानों को इसी तरह कब्जे में करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में जो कमजोर और गरीब तबका है उसके बच्चे और नौजवान आखिर क्या सोचते हैं और उनके दिल पर क्या गुजरती है? उनके मन में अपनी बेबसी और दूसरों की गुंडागर्दी को लेकर कितनी नफरत नहीं उपजती होगी? इसे सोचे बिना कोई अगर यह सोचे कि इस देश में लोकतंत्र चल रहा है, तो वह केवल उन्हीं जगहों पर चल रहा है जहां पर ताकतवर मवालियों और रंगदारों की न दिलचस्पी है और न ही उनकी वहां चल रही है। जहां-जहां गुंडागर्दी चल सकती है वहां पर बस वही चलती है वहां लोकतंत्र नहीं चलता।
जब पूरा देश इस तरह की अराजकता का शिकार है, ऐसी बेइंसाफी इस देश में किसी भी किस्म के गिने-चुने मौकों पर सबसे ताकतवर को ही काबिज करवा देती है तो इस लोकतंत्र पर ऐसे विशाल कमजोर तबके की कोई आस्था नहीं रह सकती। इसलिए जगह-जगह संवेदनशील और सरोकार रखने वाले लोगों में से कुछ लोग यह मानते हैं कि भारत की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था सबसे कमजोर को कोई इंसाफ नहीं दे सकती और उसके लिए हिंसा एक मजबूरी है। आज जिस शिक्षक को कुचलकर मारा गया, उसके परिवार को हो सकता है कि अगले दस-बीस बरस तक किसी तरह का इंसाफ होते न दिखे। इस घर और इसके आसपास के लोग ऐसे में क्या सोचते रहेंगे, इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए।
लोकतंत्र सिर्फ चुनावों की निरंतरता नहीं है। चुनाव तो आते-जाते रहते हैं और भारतीय लोकतंत्र में बिना रूकावट के चुनाव होते चले जा रहे हैं। लेकिन सच तो यह है कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ भारत को कई वजहों से लगातार निराश कर रहे हैं और सबसे कमजोर तबके को तो कोई इंसाफ मिल ही नहीं रहा है। एक शिक्षक को कुचलकर मार देना अपने-आपमें एक अलग वारदात नहीं है, वह देश में आज कायम माहौल की हंडी का चावल का एक दाना है, जो भयानक है।

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