9 अपै्रल 2012
कल जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अजमेर शरीफ पहुंचे तो जरा देर के लिए वे अपने बेटे और बाकी लोगों सहित नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दोपहर के खाने पर भी शरीक हुए। उसके बहुत मतलब निकाले गए, लेकिन दोनों देशों के ये प्रमुख नेता जब मीडिया के सामने पेश हुए तो उनके बीच में झांकता हुआ चेहरा जरदारी और उनकी गुजर चुकी पत्नी बेनजीर के बेटे बिलावल का था। इसी खाने पर मौजूद भारत की कांगे्रस पार्टी के भविष्य राहुल गांधी से बिलावल की बात-मुलाकात हुई और ऐसा लगने लगा कि दोनों देशों में सत्ता की अगली पीढ़ी की पहली मुलाकात हो गई।
एक तरफ नेहरू, फिर इंदिरा, फिर राजीव, फिर सोनिया और अब राहुल। दूसरी तरफ जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो, आसिफ अली जरदारी और अब बिलावल जरदारी भुट्टो। सरहद के दोनों तरफ कुनबो का राज कायम है। आधी सदी गुजर गई, किसी तरफ बहू तो किसी तरफ दामाद के हाथों विरासत लगी है। कमोबेश ऐसा ही हाल श्रीलंका में रहा, चाहे कुछ हद तक ही रहा। कुनबापरस्ती बांग्लादेश में भी रही। और दूर के देशों का देखें तो बहुत से देशों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता चली आती है, वहां पर भी जहां पर कि जनता चुनावों में अपने नेताओं को चुनती है, वहां भी लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते हैं। इसी मुद्दे पर अभी कुछ दिन पहले ही इसी पन्ने पर लिखा गया था, उस वक्त उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव के कुनबे के भाईयों की सत्ता के बीच अगली पीढ़ी का राज शुरू हुआ था।
लोकतंत्र में कानूनों से बहुत अधिक सुधार नहीं लाया जा सकता। लोगों को परंपराओं को बेहतर बनाकर लोकतंत्र को विकसित करना होता है। लेकिन जब यह सिलसिला विकसित होने के बजाय नीचे की ओर लुढ़कने लगता है तो कानून उसे नहीं थाम पाता। एक-एक घर के दो-दो लोग जब एक ही विधानसभा में या एक ही लोकसभा में बैठते हैं तो लगता है कि क्या उस पार्टी में काम करने वाले लोगों का इतना अकाल पड़ गया? लेकिन फिर राजनीति की कुनबापरस्ती को कोसने की अपनी आदत को हमें लोकतंत्र को सुधारने के अभियान तक आगे बढ़ाना पड़ता है जब एक ही घर के, एक ही पेशे के, एक सरीखे जानकार बाप-बेटे शांति भूषण और प्रशांत भूषण लोकपाल की मसौदा कमेटी में जाकर बैठते हैं। इन दोनों को इस कमेटी में एक साथ रहने में अटपटा नहीं लगता और न ही अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति को यह जरूरत लगती कि इस कमेटी की गिनीचुनी पांच कुर्सियों पर अलग-अलग तरह के पांच लोगों को वे लाकर बिठाते।
इसलिए आज धार्मिक और सामाजिक ट्रस्टों में, राजनीतिक कुर्सियों पर, पार्टी की टिकटों में जब न सिर्फ अगली पीढ़ी आज जाती है बल्कि चारों तरफ के रिश्तेदार और चाटुकार सत्ता पर टिक जाते हैं, तो लगता है कि राजतंत्र खत्म कहां हुआ है और लोकतंत्र आया कहां है।
उत्तरप्रदेश चुनावों के दौरान जिस बेशर्मी से सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वढेरा ने यह कहा था कि अभी राहुल का मौका है, फिर प्रियंका की बारी आएगी और फिर मौका सही रहने पर वे राजनीति में आएंगे, और जिस तरीके से प्रियंका के अब तक छुपाकर रखे गए बच्चों को एक चुनावी मंच पर लाया गया, उससे कम से कम हमारा तो यह मानना है कि उत्तरप्रदेश के मतदाताओं को यह लगा कि राजनीति से बाहर रहने वाले घरवाले भी अगर इस तरह देश के भविष्य का और सत्ता का सौ बरस का सफर गिना दे रहे हैं तो पार्टी के भीतर लोकतंत्र कहां रहा और देश में लोकतंत्र कहां रहा? इस तर्क को बहुत आसानी से खारिज भी किया जा सकता है कि राहुल के परिवार की कुनबापरस्ती जैसी ही कुनबापरस्ती तो मुलायम के परिवार की भी रही जहां मुलायम के जाने कितने भाई पार्टी और संसद-विधानसभा पर काबिज हैं, बेटा मुख्यमंत्री है और बहू भी कहीं तो चुनी ही गई है।
पार्टी और सरकार दोनों का एक ही घर का इस तरह का कब्जा बहुत सी दूसरी जगहों पर भी है जिनमें पंजाब का बादल परिवार, कश्मीर का अब्दुल्ला परिवार, तमिलनाडु का करूणानिधि कुनबा, हम गिनाते ही रहते हैं।
दुनिया के राजवंशों में जिस तरह वारिस राजपाट संभालते थे, उसी तरह आज भारत और पाकिस्तान के बीच अगली पीढिय़ां आने वाले दशकों में एक-दूसरे से मिलते-जुलते रहने की एक तस्वीर कल से बनाना शुरू कर चुके हैं। हमें यह आसानी से समझ नहीं आता कि सामंती और राजवंशी कुनबापरस्ती के खिलाफ किस तरह की जनचेतना खड़ी की जा सकती है जो कि कुछ गिने-चुने परिवारों का राजनीति पर एकाधिकार खत्म करके राजनीति के गॉडफादरों से लोकतंत्र को आजाद करवा सके। जिन लोगों ने गॉडफादर उपन्यास पढ़ा होगा, या उस पर कहीं फिल्में देखी होंगी उन्होंने माफिया कुनबो के भीतर विरासत नीचे जाने का सिलसिला देखा है। भारत के लोकतंत्र में, और पाकिस्तान में भी, इसी किस्म की राजनीति चल रही है। इसे खारिज करना जरूरी है। हम चाहते हैं कि जनमत तैयार करने वाला कोई ऐसा सिलसिला शुरू हो जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी के काबिजों को चुनाव में तगड़ी शिकस्त देने जैसा माहौल बना सके। कुनबापरस्ती का यह सिलसिला पूरी तरह खारिज होना चाहिए चाहे यह वंशवाद कांगे्रस का हो, भाजपा का हो या किसी क्षेत्रीय दल का हो। और यह वंशवाद राजनीति से परे भी सार्वजनिक जीवन की तमाम संस्थाओं से खत्म किया जाना चाहिए।
आज इस मौके पर लिखना इस लिए सूझा था कि सीपीएम के चल रहे एक अधिवेशन में आज यह तय हुआ कि पार्टी के किसी भी पद पर कोई व्यक्ति तीन कार्यकाल से अधिक नहीं रह सकता। हर तरह की आजादी की वकालत करने वाले अमरीका में भी यह तय है कि राष्ट्रपति के पद पर कोई भी दो बार से अधिक नहीं रह सकता। ऐसे में भारत में कुनबापरस्ती के अलावा कुछ लोग ऐसे हैं जो मानो पूरी जिंदगी के लिए किसी एक कुर्सी या सत्ता के लिए ही बनकर आए हैं। अगर भारत में राजनीतिक संस्कृति का सुधार होना है तो एक पद पर एक व्यक्ति के कार्यकाल की सीमा तय होनी चाहिए, इसी तरह एक व्यक्ति को एक सदन में कितने बार आने का मौका मिले यह भी तय होना चाहिए। सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश में यह इजाजत क्यों होनी चाहिए कि एक ही सांसद आठ-दस बार चुनाव लड़कर या मनोनीत होकर सदन में आए? इस पर भी रोक लगनी चाहिए। आखिर नए लोगों को मौका और किस तरह से मिलेगा?

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें