भारत और पाकिस्तान के बीच


08 अपै्रल 2012
संपादकीय
पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के एक निजी दौरे पर हिन्दुस्तान आने पर दिल्ली की हवा में बहुत सनसनी है। वे आए तो हैं अजमेर में दरगाह पर जाने को, लेकिन दुनिया में सरकारों के बीच बातचीत तो हर मौके पर होती है। किसी शादी में मुलाकात हो तब भी देशों की बातें हो जाती हैं और किसी गमी पर लोग जुटते हैं तब भी कुछ न कुछ मुद्दों पर बातचीत होती है। और फिर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच तो बातचीत की मेज किसी सरकारी दफ्तर की मेज की तरह लदी ही रहती है। एक से दो मुल्क बनने से लेकर आज तक भला कौन सा ऐसा दिन रहा है कि दोनों के बीच ऊन के अनगिनत गोले उलझे हुए न पड़े हो। इसलिए दरदारी और मनमोहन सिंह के बीच की मुलाकात चाहे एक निजी दौरे पर हुई हो, उसमें बंद कमरे में जब दोनों बैठे तो जाहिर है कि खीर और सिवईयों पर तो बात हुई नहीं होगी। 
जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उस वक्त भारत-पाक के मुद्दे पर दोनों देशों के मीडिया में खासी हलचल मची हुई है। आज जब दोनों जगहों पर सरहद से लेकर राजधानियों तक कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था तब अचानक जरदारी के यहां आने से सरकारों के बीच रूबरू बातचीत कम से कम खबरों और चर्चा में तो आ ही गई। इसलिए आज इस पर हमारा भी लिखना जायज बनता है चाहे सरकारों के बीच घोषित रूप से कोई बड़ा मुद्दा चर्चा में न हो। इन दोनों देशों के आपसी संबंधों से लेकर इन देशों के अलग-अलग मामलों तक बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन पर इन दोनों ही देशों को सोच-विचार करना चाहिए। हम यह भी नहीं मानते कि पाकिस्तान के अंदरूनी मुद्दों पर सिर्फ वहीं बातचीत होनी चाहिए। हिंदुस्तान की सरकार अपने-आपको वहां के कई मुद्दों से कूटनीतिक कारणों से दूर रख सकती है, लेकिन हिंदुस्तान की जनता के सामने ऐसी कोई बेबसी नहीं है और वह खुलकर पाकिस्तान के मुद्दों पर इंटरनेट पर पल-पल चर्चा करती है, ठीक उसी तरह जैसे कि पाकिस्तान के बच्चे-बच्चे को इंटरनेट पर हिंदुस्तान के मामलों में चर्चा का हक है, मौका है और ऐसी बात चल रही है। 
इन दोनों देशों की कितनी तो ताकत, कितना तो वक्त और कितना खर्च एक-दूसरे को दुश्मन मानकर चलने में खर्च हो रहा है। आज इस पर बात करते हुए हम पाकिस्तान की जमीन से भारत पर हुए हमले को अलग से गिनना नहीं चाहते हैं। क्योंकि जिन ताकतों ने मुंबई पर हमला किया था वे ही ताकतें पाकिस्तान के भीतर भी रोजाना लोगों को मार रही हैं और यह जाहिर है कि पाकिस्तान की सरकार का उन पर उसी तरह कोई काबू नहीं है जिस तरह कि भारत की सरकार का यहां के नक्सलियों पर कोई काबू नहीं है। यह तो ठीक है कि यहां के नक्सली सरहद पार करके पाकिस्तान में दहशतगर्दी नहीं कर रहे हैं, अगर वे ऐसा करते होते तो भारत उन पर कितना काबू पा सकता था? कुछ लोगों को यह लग सकता है कि हम पाकिस्तान की सरकार और फौज को इस मौके पर कुछ अधिक शक का फायदा दे रहे हैं, लेकिन उसके सिवाय चारा क्या है? आज कम से कम वहां की सरकार एक संसद और अदालत के लिए एक छोटी हद तक जवाबदेह तो है ही। वहां वक्त-वक्त पर आई हुई फौजी तानाशाही तो इनमें से किसी के लिए जवाबदेह नहीं रही, और ऐसी फौजी हुकूमतों के चलते पाकिस्तान में लोकतंत्र जितना कमजोर हुआ, उसी का नतीजा है कि वहां पर आज आतंकी और कट्टरपंथी हावी हैं। 
इन दोनों मुल्कों के नेताओं के बीच आज चाहे जो बातचीत हुई हो, लेकिन हम जनता से लेकर सरकारों तक से यह उम्मीद करते हैं और अपील करते हैं कि एक-दूसरे के खिलाफ तैयारी में जो अंधाधुंध फौजी खर्च हो रहा है, उसमें कटौती की जरूरत है, क्योंकि फौज सरहद के दूसरी तरफ फौज को बढ़ावा देती है। दोनों मुल्कों में इतने गरीब हैं कि करोड़ों लोग तकरीबन भूखे सोते हैं ऐसे में इन देशों के नेता अगर किफायत की तरफ नहीं बढ़ सकते, तो हम उन्हें बिल्कुल ही नाकामयाब मानेंगे और  उनका नाम इतिहास के लायक नहीं मानेंगे। लोगों को आगे बढ़कर कुछ ऐसा करना होगा कि इन दोनों देशों में यह फौजी बर्बादी कम हो और लोकतंत्र मजबूत हो जिससे कि आतंकी ताकतें घटें, दोनों के बीच आपसी कारोबार बढ़े ताकि किफायत का फायदा दोनों को मिले, और इससे एक फायदा यह भी होगा कि अमरीकी गिद्धों और बाजों को इस इलाके में मंडराने का मौका कम मिलेगा। दोनों देशों की जनता को एक माहौल खड़ा करना होगा जिसमें सरकार चला रहे लोगों की बददिमागी, बेदिमागी या उनकी हिचक को धक्का दिया जा सके और अमन को कायम किया जा सके।

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