23 अप्रैल 2012
संपादकीय
कल से देश का समय एक बहुत ही गैरजरूरी मुद्दे पर मीडिया ने खराब करना शुरू कर दिया है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के बीच, अन्ना हजारे और उनकी टोली के बीच, उनकी टोली के लोगों के बीच आपस में किस तरह से शब्दों और बातों की कुश्ती चल रही है यह देखने लायक है। लोग एक-दूसरे के खिलाफ आग और जहर उगल रहे हैं, एक-दूसरे की बातों को गलत, झूठ बता रहे हैं, साजिशों के आरोप लगा रहे हैं। जिस तरह से अन्ना की कही हुई बातों को नकारा जा रहा है और जिस तरह से टीवी चैनल यह दिखा रहे हैं कि खंडित किए जा रहे बयान के दौरान अन्ना का वह साथी खड़ा दिख रहा है जब वह बयान दिया जा रहा है। कुल मिलाकर एक बहुत ही गैरजरूरी मुद्दे पर देश का समय खराब हो रहा है, और देश के सामाजिक आंदोलन की बची-खुची साख और खराब हुई जा रही है। हमारी नीयत इन लोगों पर लिखने की नहीं है लेकिन इस पर लिखने की जरूर है कि सामाजिक आंदोलनों को अपनी साख का ख्याल सबसे पहले, सबसे अधिक इसलिए रखना चाहिए क्योंकि इसके बिना उनकी कही हुई भली बातें, दी हुई नसीहतें सब खोखली साबित होती हैं और उनकी नैतिक कमजोरी से उन मुद्दों की भी शिकस्त होने लगती है जिनके पोस्टर-बैनर वे अपने हाथों में उठाए रखते हैं।
आज अन्ना हजारे के सामने एक बड़ी दिक्कत यह है कि वे पवार पर थप्पड़ से हुए हमले का मजा लेते हुए कैमरे पर कैद हो चुके हैं, अपने गांव में एक तानाशाह की तरह सांस्कृतिक नैतिकता के तालिबानी हुक्म जारी करने की बात फख्र के साथ बार-बार कहते रहते हैं। देश के उदार तबके में, मानवाधिकार की बात करने वालों में और प्रगतिशील लोगों में अन्ना हजारे के लिए सम्मान शून्य है। उनकी शोहरत उन लोगों पर टिकी है जिन्हें कि सामाजिक न्याय की समझ कम है, जिनमें व्यक्तिगत आजादी के महत्व को समझने की समझ नहीं है। इसी तरह जो बाबा रामदेव बार-बार आकर अन्ना से जुडऩे की कोशिश करते हैं, वे खुद तरह-तरह की टैक्स चोरी के ऐसे आरोपों से घिरे हुए हैं, अपना एक भयानक बड़ा औद्योगिक और कारोबारी साम्राज्य बनाकर उसके मालिक बने हुए हैं, कि वे कालेधन के खिलाफ अब कोई भरोसेमंद बात करने के लायक नहीं बचे हैं। साथ-साथ यह बात भी है कि उनका सारा अभियान भारत की दलीय राजनीति के एक हिस्से की तरह चल रहा है और अपने संन्यासी चोले के अनुशासन के बाहर-बाहर ही रहते हुए वे सोनिया परिवार पर हमले को एक ओवरटाईम की तरह चला रहे हैं। अन्ना हजारे के बाकी साथियों को देखें तो अरविंद केजरीवाल बरसों तक केंद्र सरकार को बकाया देने से बचते रहे, आखिरी में उन्होंने यह सार्वजनिक दावा किया कि वे यह भुगतान नहीं करेंगे, और फिर उन्हें यह करना पड़ा। इस नैतिक कमजोरी के अलावा उनकी तेजाबी जुबान, बददिमागी, सिर चढ़कर बोलती महत्वाकांक्षा जैसी बहुत सी ऐसी कमजोरियां उनके साथ हैं कि वे लोगों के मन में अब पहली नजर में ही एक हिकारत खड़ी करने में महारत पा चुके हैं। तीसरा चेहरा किरण बेदी का है जो कि हवाई जहाज की टिकटों में हेराफेरी करने और जायज से कई गुना पैसों की उगाही करने में फंसी हुई हैं और अपने भक्त समुदाय के बाहर उनकी विश्वसनीयता हाशिए पर चली गई है। शांति भूषण और प्रशांत भूषण, इन पिता-पुत्रों के खिलाफ इस तरह की बातें तो नहीं हैं, लेकिन फिर भी अरबपति होते हुए भी उन्होंने जमीन की खरीदी में टैक्स बचाने के लिए गलत काम किए, ऐसे मामले उनके खिलाफ एक गैर कांगे्रसी सरकार ने उत्तरप्रदेश में खड़े किए हुए हैं।
हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि आज सार्वजनिक जीवन में कोई भी प्रमुख व्यक्ति ऐसे आरोपों से बिल्कुल बचा रह सकता है। और हम यह भी नहीं मानते कि हर आरोप सही होते हैं, या अदालत में सही साबित होने के लायक रहते हैं, लेकिन हमारा इतना जरूर मानना है कि सार्वजनिक जीवन के नेताओं को उन मूल्यों पर खरा उतरना चाहिए जिनको वे दूसरों पर लागू करने पर आमादा हैं। लोगों को अरविंद केजरीवाल की कही वे बातें भी नागवार गुजरी हैं जो कि उन्होंने संसद के लोगों के खिलाफ एकमुश्त कह डालीं। संसद के जिन लोगों को वे बार-बार अपराधी कहते हैं, वे लोग अपराध के आरोप या मामले झेल रहे हैं। उनका अपराध साबित होना अभी बहुत बचा है और हो सकता है कि वे बेकसूर भी साबित हो जाएं। लेकिन दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल तो सरकार के पैसे को बरसों तक दबाए रखने के अपराधी साबित हो ही चुके हैं। उन्होंने अपने विभाग का बकाया चुकाने में बरसों लगा दिए, न देने पर अड़े रहे और जब यह एक बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन गया तब उन्होंने यह भुगतान किया। ऐसे में आज जब अन्ना और बाबा के इर्दगिर्द एक-दूसरे से परहेज करते हुए लोग पूरे देश को फिर नैतिकता सिखाने पर आमादा हैं, तो उनके दामन तरह-तरह के दागों से भरे पड़े हैं। भारत में सार्वजनिक नैतिकता का एक पैमाना रामकथा से निकलकर आता है जब किसी के कहे हुए एक नाजायज और झूठे आरोप पर भी राजा अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल देता है कि राजा और उसके परिवार को शक से ऊपर रहना चाहिए। इसी तरह की बात दुनिया के दूसरे देशों से भी निकलकर आती है कि सीजर की बीवी को शक से ऊपर रहना चाहिए।
क्या पूरे देश में नैतिकता के ठेकेदार बने हुए अन्ना-बाबा और उनकी टोली को अपने-आपको शक से ऊपर नहीं रखना चाहिए? और आज तो छोटे-छोटे बयानों को लेकर उनका चाल-चलन कई तरह के नए शक रोज खड़े चल रहा है।

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