ममता को सुप्रीम कोर्ट से लताड़ की जरूरत


16 अप्रैल 2012
ममता बैनर्जी पर बनाए गए एक साधारण से कार्टून को लेकर उनकी तृणमूल कांगे्रस पार्टी के लोगों ने विश्वविद्यालय के इस कार्टूनिस्ट-प्राध्यापक को पीटा और वहां की पुलिस उन्हें इंटरनेट पर इस कार्टून को डालने को लेकर गिरफ्तार किया। पिछले बहुत से महीने ऐसे हुए हैं जब ममता बैनर्जी का नाम सिर्फ बुरी खबरों के लिए खबरों में रहा है। कभी वे अपनी ही भागीदारी वाली यूपीए सरकार से एक दिन में दो-दो बार झगड़ते दिखती हैं तो कभी वे अपनी ही पार्टी के रेल मंत्री को बर्खास्त करती हैं। एक बददिमाग और बेदिमाग तानाशाह की तरह वे अपनी तबाही करती चली जा रही हैं। 
किसी कार्टूनिस्ट या मीडिया के किसी हिस्से के खिलाफ नाराजगी को बदनीयत और जुल्म की हद तक ले जाने वाली सत्ता का भला इतिहास ने कभी नहीं देखा है। भारत में इसकी सबसे बड़ी मिसाल इमरजेंसी रही है जिसमें संजय गांधी की तानाशाही का झंडा लेकर चलते हुए छत्तीसगढ़ के ही विद्याचरण शुक्ल पूरे देश में एक खलनायक की तरह देखे गए और वह दौर है और आज का दिन है, इस देश के मीडिया ने उन्हें अच्छी नजर से कभी देखा ही नहीं। 
1984 की बात है, छत्तीसगढ़ के दौरे पर आए हुए देश के एक सबसे बड़े कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण ने एक इंटरव्यू में मुझे विद्याचरण शुक्ल के बारे में कुछ बातें कही थीं। (देखें बॉक्स)
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विद्याचरण में मुझे जेल की धमकी दी थी-आर.के. लक्ष्मण
प्रश्न- विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर ने अपनी पत्रिका शंकर्स वीकली बंद करने की घोषणा करते हुए आखिरी संपादकीय में लिखा था कि अब लोगों की सहनशक्ति कम होती जा रही है, लोग अपने पर बनाए कार्टून बर्दाश्त नहीं कर पाते ऐसे में कार्टून बनाना ही छोड़ देना बेहतर होगा, क्या आपको भी कभी ऐसी छटपटाहट होती है?
लक्ष्मण - आपातकाल में मेरे बहुत से कार्टून रोक दिए गए जो बाद में इलस्ट्रेटेड वीकली के एक अंक में जनता सरकार के आने पर छपे, सेंसरशिप के उस वक्त कोई पैमाना नहीं रह गया था सब कुछ सनक पर चलता था, ऐसे में हताश होकर मैं दिलली गया, वहां अपने दोस्त अफसरों से मिलकर कुछ जोड़-तोड़ बैठायी तब जाकर बंबई आकर 'फ्रीÓ होकर काम करना शुरू किया।
लेकिन इसके बाद आपके यहां के इन वी.सी. शुक्ल ने जो उन दिनों पूरे फार्म में थे, मुझे खुद धमकी दी कि मुझे जेल में डालवा देंगे। फिर तो हिम्मत टूट गई। समझ ही नहीं आता था कि कब तक चलेगी इमरजेंसी, खत्म होने के आसार नहीं थे मैंने रिटायर हो जाने का फैसला कर लिया।
कार्टून बनाना बंद करके छुट्टियां बिताने मॉरीशस चला गया। लेकिन वहां मैंने देखा कि उन देशों में व प. एशिया में भारतीय अफसर विदेशी दूतावासों में जाकर मेरे बनाए कार्टूनों की कटिंग्स दिखाकर जाहिर करते थे कि हिन्दुस्तान में अभी भी कितनी आजादी है। यह देखकर मैंने फिर लौटने का फैसला किया। फिर आम चुनाव आ गए जनता सरकार बनी और (हंसते हुए) इतनी आजादी मिली कि जिसका पूरा उपयोग कर पाना मेरे लिए संभव भी नहीं रह गया था।
प्रश्न- आज के राजनेता या अन्य प्रमुख लोग, आपके अपने कैरियर के शुरू के दिनों के समकालीन प्रमुख व्यक्तियों के मुकाबले कैसे लगते हैं? कौन सा वक्त था जब आपको कार्टून बनाने में सबसे ज्यादा मजा आया?
लक्ष्मण-आजादी के बाद से आज तक कभी भी स्थिति किसी कार्टूनिस्ट के लिए बुरी नहीं रही। हमेशा उसके लिए पर्याप्त सामग्री, स्थिति, लोग उपब्ध रहे लेकिन फिर भी एक केंद्रीय खाद्यमंत्री हुआ रकते थे कन्हैयालाल मानिक लाल मुंशी, खाद्य समस्या के हल के लिए वे एक से एक योजनाएं बनाते थे। एक थी अन्न उगाने के लिए पेड़ लगाओ, उनका ख्याल था कि ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के लगने से बादल रूक जाएंगे, पानी बरसेगा, जमीन उपजाऊ होगी तथा अनाज अधिक होगा, दूसरा नारा उन्होंने दिया था जिसके पोस्टर भी छपे थे। कम खाओ ज्यादा उगाओ यानि आदमी अपनी जरूरत से ज्यादा खाता है तथा अन्न बचाने के लिए खाना कम कर दे। वे एक कैरेक्टर थे फिर जब रफी अहमद किदवई आए तो उन्होंने राशनिंग वगैरह से सब सुधारा। फिर पाकिस्तान विभाजन का वक्त भी बहुत दिलचस्प विषयों से भरा पड़ा था उस पर कार्टून बनाते हुए बहुत मजा आया।
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ममता बैनर्जी ने तीन दशक से अधिक से बंगाल में जमी हुई कम्युनिस्ट पार्टियों को उखाड़कर फेंक दिया, और केंद्र में अल्पमत की यूपीए सरकार को वे बंदूक की नोंक पर रखती हैं, इसलिए उनकी बददिमागी बढ़ती चल रही है। एक कार्टून को लेकर किसी का इतना उबल पडऩा अगर जायज है तो सोनिया गांधी के कुनबे के बारे में उनसे नफरत करने वाले लोग जिस तरह की झूठी बातें इंटरनेट पर रोजाना डालते हैं, उस पर तो उनकी सरकार देश में आपातकाल ही लगा दे। 
ममता बैनर्जी ने अपनी पिछली पार्टी कांगे्रस की ऐतिहासिक गलतियों, और गलत कामों से भी कोई सबक लिया हुआ नहीं दिखता है। आपातकाल के समय वे पश्चिम बंगाल में महिला कांगे्रस की अध्यक्ष थीं और उन्होंने बेकसूरों पर संजय-इंदिरा की केंद्र और राज्य सरकार के जुल्म देखे हुए हैं। उन्होंने यह भी देखा है कि आपातकाल के साथ ही पश्चिम बंगाल से कांगे्रस की जो बिदाई हुई थी, और जिस तरह से वामपंथी वहां पर सत्ता में आए थे तो उसके बाद से अब तक कांगे्रस वहां हाशिए पर ही बनी हुई है। एक वक्त जो पार्टी बंगाल पर राज करती थी उस पार्टी का हाल यह है कि आज वहां बंगाल में ममता बैनर्जी के लिए दरी बिछाने का काम कर रही है। यह तो ठीक है कि वामपंथी सरकार कोई साढ़े तीन दशक तक वहां राज करने के बाद अब ममता के हाथों शिकस्त पाकर बाहर हुई है, लेकिन क्या हिंदुस्तान के इतिहास में सत्ता के इतने लंबे चलने की और कोई मिसाल है? और जिन वामपंथियों को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर माना गया, उन वामपंथियों को भी जनता ने बार-बार अगर चुना, तो उनमें कोई तो बात रही ही होगी। 
ऐसे बंगाल में एक बार सत्ता में आकर ममता ऐसी मदमस्त हो गई हैं कि लोकतंत्र के सारे तौर-तरीके खो बैठी हैं। यह सिलसिला कभी भी बहुत लंबा नहीं चलता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की आजादी पर हमला करने वाले देर-सबेर उसका लंबा भुगतान करते हैं क्योंकि जनता यह देखती है कि मुंह खोलने का अगर यह नतीजा है, तो ऐसी ज्यादती करने वाले लोग पहला मौका मिलते ही सत्ता से बाहर कर दिए जाएं।
ममता बैनर्जी नासमझ भी हैं। एक कार्टून जो कि हमारे इस अखबार में रोजाना बनाए जाने वाले बहुत तीखे और तेजाबी कार्टूनों के मुकाबले कहीं भी नहीं टिकता है, वैसे मामूली कार्टून को एक प्राध्यापक की गिरफ्तारी तक ले जाना, ममता बैनर्जी के एक अंत की शुरूआत हो सकती है।
भारतीय लोकतंत्र में ऐसे नाटकीय व्यक्तित्व पहले भी कभी-कभी, कहीं-कहीं आए हैं, लेकिन तानाशाही किसी की चली नहीं। आज अपनी खुद की पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के लिए ममता बैनर्जी का बर्ताव वैसा है जैसा कोई अपने पांव की धूल के साथ करता है। पैर झड़ाने के अंदाज में उन्होंने अपनी पार्टी के केंद्रीय रेल मंत्री को जितने घटिया तरीके से हटाया उससे पूरे हिंदुस्तान में उनके नाम पर धिक्कार ही धिक्कार सुनाई पड़ी है। और अब पिछले तीन-चार दिनों से पूरे देश में, और भारत में दिलचस्पी रखने वाली बाहर बसे लोगों में ममता के नाम पर एक नफरत सुनाई पड़ रही है। एक संभावना खत्म होते दिख रही है, इसका हमें अधिक अफसोस इसलिए है क्योंकि ममता के नाम के साथ अब तक कोई आर्थिक भ्रष्टाचार सुनाई नहीं पड़ा था और उनका निजी जीवन एक सादगी की मिसाल भी बना हुआ है। बंगाल में उन्होंने वामपंथी सरकार के जाने को मानो अपनी तानाशाही के पक्ष में जनमत मान लिया है। उन्हें यह मामूली समझ तो होना ही चाहिए कि साढ़े तीन दशक की सरकार के बाद सत्तारूढ़ पार्टी को जनता की कई तरह की नाराजगी का सामना करना ही पड़ता है और चुनावी नतीजे ममता को ही जनता की तारीफ शायद न हों, वे एक लंबी सत्ता से जनता का असंतोष शायद अधिक हो। ऐसे में अपनी हर हरकत से ममता जनता से दूर जा रही हैं। 
लेकिन ममता से परे हम अगर देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करें, तो शायद ही कोई सरकार, पार्टी और नेता ऐसे हों जो कि किसी कार्टून को लेकर बनाने वाले पर टूट पड़ें। इसे लेकर ममता के जुल्म के शिकार प्रोफेसर को ही नहीं, कुछ दूसरे मानवाधिकार संगठनों को अदालत तक जाने की जरूरत है ताकि सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले को ले जाकर ममता को ऐसी लताड़ लगवाई जा सके कि वह देश के बाकी बददिमागों के लिए भी एक सबक बन जाए।

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