24 अप्रैल 2012
संपादकीय
बस्तर के अगवा कलेक्टर पर बातचीत के लिए नक्सलियों ने अपनी तरफ से जिन तीन मध्यस्थतों के नाम लिए हैं उनमें से दो ने अलग-अलग मनाही कर दी है। सीपीआई के बस्तर के एक पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने अपनी पार्टी की नीति का हवाला देते हुए वार्ताकार बनने से मना कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील प्रशांत भूषण ने यह कहा है कि वे किसी के सिर पर बंदूक की नोंक टिकी हो तो उस हालत में कोई बातचीत करना नहीं चाहते। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि कलेक्टर की रिहाई हो जाने के बाद वे किसी भी बातचीत में मध्यस्थ बनने के लिए राजी हैं। एक तीसरा नाम नक्सलियों ने बस्तर में रह चुके एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा का दिया है, जो कि पिछले एक दशक से अधिक समय से सामाजिक आंदोलनकारी हैं, और वे मध्यस्थ बनने के लिए तैयार भी हो गए हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ सरकार ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य सचिव रहे हुए दो लोगों से सहमति लेने के बाद अपनी तरफ से उनका नाम मध्यस्थ के रूप में रखा है।
यह बात अच्छी है कि सरकार और नक्सलियों के बीच बातचीत पर एक सहमति तैयार हो गई है और दोनों तरफ से किसी तात्कालिक हथियारबंद या हिंसक कार्रवाई के बजाय बातचीत की बात हो रही है। हमने दो ही दिन पहले इस मुद्दे पर इसी जगह यह लिखा था-'....छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास आज यह एक मौका है जब वे अपनी सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों की जान बचाने के लिए, और राज्य के आधे से अधिक नक्सलग्रस्त इलाकों में लोकतंत्र की वापिसी के लिए नक्सलियों से बातचीत का एक रास्ता शुरू करें। एक तरफ पुलिस अपना काम जारी रख सकती है, लेकिन दूसरी तरफ बीच के कुछ भरोसेमंद लोगों को लगाकर बातचीत करनी ही होगी। सरकार अगर चाहे तो एक बड़ी फौजी कार्रवाई करके नक्सलियों का कुछ समय के लिए नुकसान तो कर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र, महाराष्ट्र, झारखंड और मध्यप्रदेश का जुड़ा हुआ सारा इलाका किसी भी फौजी कार्रवाई से जब नक्सलमुक्त कराने की बात होगी तो हजारों जान जाना तय सा होगा। इसलिए वह कोई विकल्प भारतीय लोकतंत्र के भीतर कभी भी नहीं हो पाएगा। रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, और एक-एक घटना के बाद, एक-एक व्यक्ति को छुड़ाने के लिए की गई बातचीत हमेशा ही सरकार को महंगी पड़ेगी। इसलिए आज छत्तीसगढ़ सरकार को एक नए रास्ते की तलाश शुरू करनी चाहिए, और जब देश का यह सबसे बड़ा आतंरिक खतरा केंद्र सरकार तक को असफल साबित कर चुका है, तब इसके समाधान के लिए पहल करने वाले का नाम इतिहास में दर्ज भी होगा।Ó
ऊपर की यह बात हम परसों के ही अपने संपादकीय से यहां ज्यों की त्यों दोहरा रहे हैं क्योंकि इन दो दिनों में हमारे इस विचार में कोई फर्क नहीं पड़ा है बल्कि वह और मजबूत ही हुआ है क्योंकि दोनों पक्षों ने बातचीत का रास्ता पकड़ा है। बरसों से हमारी यही राय रही है और हम इसे आज के मौजूदा खतरे से परे भी देखना चाहते हैं। लेकिन आज एक छोटी सी हैरानी हमें इस बात पर है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के दो रिटायर्ड मुख्य सचिवों को ही अपना मध्यस्थ बनाकर एक सरकारी रूख ही सामने रखा है, जबकि सरकार इनसे परे के कोई ऐसे नाम छांट सकती थी जो कि सरकार और नक्सलियों, दोनों को कुछ अधिक समझते हों, जिनका राजनीतिक और सामाजिक अनुभव काफी रहा हो, और जो नक्सलियों को भरोसेमंद भी लगें। इन दोनों नामों से हमारी कोई असहमति नहीं है, लेकिन एक ही पेशे से आए हुए दो लोगों को एक साथ अपने प्रतिनिधि-मध्यस्थ बनाने के बजाय सरकार अपने ढांचे के बाहर के किसी व्यक्ति के बारे में क्यों नहीं सोच पाई? जबकि कल-परसों ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा था कि मीडिया की मध्यस्थता भी सरकार को मंजूर होगी। इस मामले में दो भूतपूर्व अफसरों को रखना कुछ उसी तरह का लग रहा है जिस तरह जनलोकपाल की मसौदा कमेटी में अन्ना हजारे की तरफ से एक ही पेशे के पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण का रख दिया गया था। नक्सलियों से बातचीत जनलोकपाल के मुकाबले भी एक बहुत अधिक जटिल बात होगी, और इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से दो अलग-अलग किस्म के तजुर्बे वाले लोगों को अगर रखा जाता तो वह बेहतर होता। अभी दोपहर एक बजे जब हम यह लिख रहे हैं तब तक इन दो नामों पर नक्सल-प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अगर इनको ये दो नाम मंजूर भी हो जाते हैं तो भी हमारे हिसाब से अनुभव की विविधता, और सामाजिक-राजनीतिक सोच की पृष्ठभूमि की विविधता एक लंबी बातचीत में बेहतर होती। एक अजीब सी बात यह है कि डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा जो कि अविभाजित बस्तर में कलेक्टर और कमिश्नर रहे हैं, वे और उनके बाद के अरसे में जो दो लोग मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव रहे हैं, वे इस बातचीत में आमने-सामने दिख रहे हैं! मतलब यह कि जिन अफसरों को अपने कार्यकाल में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या, और उसके भी पहले इस समस्या के कारणों से निपटने का मौका मिला था, वे अब इस समस्या से पैदा खतरों को सुलझाने के लिए बातचीत की मेज पर आमने-सामने बैठेंगे। है न हैरानी की एक अजीब बात?

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