26 अप्रैल 2012
संपादकीय
गुजरात दंगों की सुनवाई, महाराष्ट्र में आदर्श जैसे दर्जनों घोटाले, दिल्ली में चौरासी दंगों पर सीबीआई की रिपोर्ट, उत्तरप्रदेश में करीब तीन हजार करोड़ का शौचालय घोटाला उजागर, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में अपहरण के बाद नक्सलियों से समझौते की बातचीत, देश भर में बोफोर्स का भूत एक बार फिर हवा में छाया, और देश की अदालतों ने सत्ता के बेजा इस्तेमाल के अनगिनत मामले। छत्तीसगढ़ में जिस तरह जिंदल जैसे ताकतवर कारखानेदारों की करतूत राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कोयला खदान की मंजूरी खारिज करते हुए जिंदल के खिलाफ लिखी है, वैसा हाल देश में कुछ और जगहों पर दूसरे कारखानेदारों का भी है।
इतिहास में बोलचाल की जुबान में जो भारत सोने की चिडिय़ा कहलाता था, आज ऐसा लगता है कि जिस-जिस के हाथों में औसत से कुछ अधिक ताकत है, उनके नाखून इंसानी जरूरतों से कहीं अधिक तेज हैं, जिनके दांत पका हुआ खाने के इंसानी रिवाज के मुकाबले चीरकर खाने लायक बड़े और कड़े हैं, वे सब इस चिडिय़ा को झिंझोड़कर कच्चा खा रहे हैं। भारत एक वक्त ऐसी राजशाही से उबरा था जो कि एक बीवी की याद में ताजमहल बनवाता था, गरीबों का हक खाकर। फिर अंगे्रजों के उस राज से उबरकर यह लोकतंत्र खड़ा हुआ जो कि लंदन के भले के लिए इस देश को लूटता था। कुछ राजा इस देश के ही अपने लुटेरे थे, कुछ मुगल बाहर से आए हुए थे और अंगे्रज एक सदी से अधिक के लिए यहां फौजी हुकूमत चलाते रहे। लेकिन आज तो लोकतंत्र के आने के बाद, जनता के चुने हुए लोग देश और जनता के साथ वह सुलूक कर रहे हैं जिसके लिए आज दिल्ली में अधिक कड़ी सजा की बात केंद्रीय मंत्रिमंडल करने जा रहा है। एक तरफ सोने की चिडिय़ा को लोग नोंचकर कच्चा खा रहे हैं, दूसरी तरफ जिसे भारतमाता कहते हैं उसके साथ बलात्कार कर रहे हैं। और ऐसे लोगों में से हजार में से एक दो कानून के शिकंजे में अगर फंसते भी हैं, तो भी उसके पहले तक वे आधी या चौथाई सदी तक पुलिस की सलामी पाते रहते हैं। अभी उत्तरप्रदेश के एक ताजा मंत्री को देखें तो जेल में कैद काटने के लंबे तजुर्बे के चलते उन्हें जेल मंत्री बनाया गया।
यह लोकतंत्र आज ओडिशा और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की रहम पर चलने वाले कई इलाकों में स्थगित और निलंबित सा है। आज से रायपुर में सरकार और नक्सलियों के बीच एक बातचीत शुरू होनी है जिसमें छत्तीसगढ़ के एक अगवा अफसर की रिहाई की कोशिश सरकार की तरफ से होगी। दूसरी तरफ कल और आज में नक्सलियों के पसंद के वार्ताकार, मध्यप्रदेश के एक भूतपूर्व आईएएस अफसर और बस्तर में कलेक्टर रहे हुए डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा के बयान अगर देखें तो ऐसा लगता है कि गांधी की खादी में एक नक्सली बिना बंदूक थामे ऐसे अपहरण को सही ठहरा रहा है। हम अभी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा की लोकतंत्र पर से इस अनास्था को पूरी तरह खारिज करने में इस कॉलम की आज की जगह खराब करना नहीं चाहते। लेकिन आज की समझौता-वार्ता ऐसी अनास्था के माहौल के बीच ही होने जा रही है जो कि नक्सलियों के हमदर्द कहे जाने वाले डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा तक सीमित नहीं है। और छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र निर्वाचन से बनी हुई सरकार से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक, सभी लोकतांत्रिक ताकतों को आज यह सोचने की जरूरत है कि देश-प्रदेश में किन बातों के चलते नक्सल हिंसा की जगह बनी और उनकी ताकत इस हद तक पनप चुकी है कि वे इस देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दिए जा चुके हैं।
आज की यह बातचीत तो एक अफसर की रिहाई तक शायद रह जाए, लेकिन इसके बाद क्या होगा? इसके बाद कल भी नक्सलियों के हथियारबंद-राज के इलाके में कोई न कोई दूसरा अफसर तैनात होगा, वहां फिर ऐसी नौबत आएगी कि फिर किसी को उठाकर नक्सली सरकार से सौदेबाजी की नौबत लाएंगे और जेलों से अपने साथियों को छुड़वाएंगे। यह सिलसिला सरकार कब तक बर्दाश्त कर पाएगी? और आज तो एक बड़ा अफसर है, कल छोटे-छोटे कई सरकारी कर्मचारी अगवा हो सकते हैं, परसों ओडिशा की तरह कोई विधायक या सांसद भी अगवा हो सकता है और सरकार क्या पूरी जिंदगी नक्सलियों के वार्ताकारों से बातचीत में इतना वक्त बर्बाद करती रहेगी? इसलिए आज की इस बातचीत के बाद की बात को हम यहां छेडऩा चाह रहे हैं। जब तक इस देश में सोने की चिडिय़ा को ढाबे की मुर्गी की तरह नोंचना जारी रहेगा, तब तक नक्सली बने रहेंगे, जमे रहेंगे। जब तक देश की तमाम राजधानियों में तेज नाखूनों और बड़े दांतों वाले हर तबके के ताकतवर लोग अपनी हिंसक नीयत के साथ देश पर जुल्म और ज्यादती करते रहेंगे, तब तक ऐसे अपहरण की जमीन बनी ही रहेगी। इस सिलसिले को बस्तर और ओडिशा की सरहद पर नहीं रोका जा सकेगा, न ही इसे झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र, मध्यप्रदेश और बिहार में रोका जा सकेगा। आज तो गुरिल्ला युद्ध की जरूरतों के मुताबिक नक्सल दस्ते जंगलों के आदिवासी इलाकों में ही हैं। लेकिन उनके लिए पढ़े-लिखे, शहरी, सवर्ण और संपन्न तबके में समर्थन देखना हो तो देश के एक सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू की मिसाल देखी जा सकती है जहां पर कि बस्तर में पौन सौ सिपाहियों के एक मुश्त मारे जाने पर खुशियां मनाई गई थीं। जिस दिन देश ने ताकतवर तबकों के जुल्म के खिलाफ, उनकी लूट के खिलाफ शहरों में लोग कानून अपने हाथ में ले लेंगे, उस दिन जंगलों के गुरिल्ला युद्ध की जगह कोई दूसरा तरीका इस्तेमाल होने लगेगा, और उस दिन शायद आज की तरह की बातचीत की जगह भी नहीं बचेगी। इसलिए इस बातचीत के प्रसंग से परे हम आज यहां यह फिक्र जाहिर करना चाहते हैं कि मौजूदा रिहाई में कामयाबी मिलने के साथ-साथ लोकतंत्र को अपने घर के भीतर बैठकर यह सोचना पड़ेगा कि वह अपनी नीयत की हिंसा को किस तरह काबू करे और तब कहीं जाकर वह नक्सलियों की हिंसा की नीयत पर सवाल खड़े कर सकेगा। आज का मौका इस टेबिल से परे के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का भी है। लोकतंत्र में अदालतें एक कुसूरवार को सजा देने की हालत में उस वक्त पहुंच पाती हैं जब हजारों कुसूरवार पकड़ और सजा से बच चुके होते हैं। ऐसे हजारों को सजा देने के लिए कानून में अपने हाथ में लेने की नौबत नहीं आने देनी चाहिए।

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