गरीब की लंगोटी धुनकर अपने लिए नर्म गद्दी!


13 अप्रैल 2012
संपादकीय
मानो महाराष्ट्र में कांगे्रस पार्टी से जुड़े हुए बड़े-बड़े मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की जमीन की हवस कुछ कम पड़ रही थी, एक नया मामला सामने आया है कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के लिए पुणे में फौज की पांच एकड़ जमीन अलग की गई है और वहां उनके लिए एक बंगला बनवाया जा रहा है ताकि रिटायर होने के बाद अपनी जिंदगी के अंत तक वे वहां रह सकें। इस बात पर फौजियों के एक संगठन ने विरोध जताते हुए यह कहा है कि जहां फौज के लोगों को ही रहने को जगह कम पड़ रही हो, फौजी मोर्चो से लौटने के बाद लोग अपने परिवार के साथ नहीं रह पा रहे हों वहां पर पांच एकड़ जमीन एक भूतपूर्व होने जा रही राष्ट्रपति के लिए इस तरह से अलग कर देना पूरी तरह गलत है। 
अभी जो जानकारी इस बारे में आई है उससे यह साफ है कि जमीन का ऐसा आबंटन राष्ट्रपति के भावी रिटायरमेंट के लिए किया गया है जिसमें जमीन का मालिकाना हक फौज का बना रहेगा, लेकिन राष्ट्रपति अपनी मृत्यु तक उस मकान में रह सकेंगी। भारत में भूतपूर्व राष्ट्रपति के लिए सरकार का यह नियम कि वे देश में कहीं भी दो हजार वर्गफीट का कोई भी सरकारी मकान छांटकर उसमें रह सकते हैं। अगर इससे बड़ा कोई मकान हो तो राष्ट्रपति एक कैबिनेट मंत्री के बंगले की भी पात्रता अपने कार्यकाल के बाद रखते हैं। पुणे में सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई जानकारी के बाद एक रिटायर्ड कर्नल, सुरेश पाटिल, ने यह आपत्ति दर्ज कराई है कि टेरीटोरियल आर्मी के आठ सौ जवान अभी पूना में तैनात हैं और उनके लिए यहां पर कुल चौदह मकान हैं। यहां पर इनकी पोस्टिंग कड़े मोर्चो वाली सरहदी तैनाती के बाद इसलिए होती है कि वे यहां अपने परिवार के साथ रह सकें। लेकिन चूंकि इनके लिए मकान ही नहीं हैं इसलिए वे एक-एक कमरों के झोपड़पट्टी जैसे मकान लेकर पुणे की फौजी छानवी के पास रहते हैं जहां पीने का पानी तक नहीं मिलता। ऐसे में प्रतिभा पाटिल जो कि भारतीय सेनाओं की मुखिया भी है। उन्होंने अपने-आपको दो लाख इकसठ हजार वर्गफीट जमीन आबंटित करवा ली है जहां पर पैंतालीस सौ वर्गफीट में उनका बंगला भी तकरीबन बनकर तैयार है। इन आंदोलनकारियों ने बताया है कि सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रपति के दफ्तर से निकाली गई जानकारी में राष्ट्रपति के पेंशन नियमों में यह लिखा हुआ है कि राष्ट्रपति का मकान दो हजार वर्गफीट से अधिक बड़ा नहीं होना चाहिए।
इस पूरे मामले में राष्ट्रपति भवन की दी गई सफाई किसी काम की नहीं लगती है और हम इस पूरे सिलसिले को फौज के एक मुखिया का एक भद्दा और हिंसक मजाक मानते हैं। यह पहला मौका नहीं है जब प्रतिभा पाटील और उनके परिवार के लोग किसी अप्रिय खबर के केंद्र में रहे हों। कभी उनका नाम किसी हत्या के मामले में जुड़ा तो अभी कुछ हफ्ते पहले प्रतिभा पाटिल के बेटे, महाराष्ट्र के कांगे्रस विधायक को चुनाव में दो करोड़ रुपए की नगदी के साथ जांच के घेरे में लिया गया था। राष्ट्रपति को आमतौर पर कड़ी आलोचना और बारीक जांच से बख्श देने का रिवाज रहते आया है, लेकिन हम इसको पूरी तरह गैरजरूरी और नाजायज मानते हैं। हमारा मानना है कि देश के कोई भी नागरिक किसी भी मामले में जवाबदेही से बरी नहीं किए जाने चाहिए। ऐसा होने पर लोकतंत्र की भावना खत्म हो जाती है और एक राजतंत्र विकसित होने लगता है। भारत में राजतंत्र और अंगे्रजों का शाहीतंत्र कभी खत्म हो भी नहीं पाया था। राष्ट्रपति भवन का तर्क बहुत खोखला है कि जमीन का मालिकाना हक फौज का बने रहेगा और राष्ट्रपति सिर्फ अपनी जिंदगी खत्म होने तक ही वहां पर रह सकेंगी। जहां फौजी जवान गुमटियों में जी रहे हैं, सीमा के कठिन और खतरनाक मोर्चो से वे आकर अपने परिवार के साथ न रह पा रहे हों, वहां पर एक ऐसी राष्ट्रपति के लिए फौज की जमीन के बीच पांच एकड़ अलग करना कहां जायज है, जिस राष्ट्रपति पर कोई खतरा भी न हो। 
इस देश में जनता और सत्ता के बीच का एक हैवानी फासला खत्म करने की जरूरत है। जिस हिंसक तरीके से लालबत्तियों वाली तानाशाही सड़कों और सार्वजनिक जगहों से जनता को कुचलते हुए चलती है, वह लोकतंत्र की भावना और उसके शब्दों, किसी भी हिसाब से ठीक नहीं है। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए, और ईश्वर पर कोई भरोसा न रहते हुए हमें कुदरत के इंसाफ पर पूरा भरोसा है। सेनाओं की मुखिया बनी हुई प्रतिभा पाटिल अगर जवानों के परिवार के साथ कुछ साल रहने का मौका भी दिलवाने के बजाय उनकी जमीन पर खुद अपना एक साम्राज्य खड़ा कर रही हैं, तो यह नैतिक रूप से पूरी तरह नाजायज है ही, इसके खिलाफ एक जनहित याचिका भी अदालत में लगनी चाहिए। और इन एकड़ों पर जितने छोटे जवानों के लिए मकान बन सकते थे, बनना चाहिए, उन सबकी आह ऐसी नाजायज रिहाईश को लगेगी ही लगेगी।
संसद से लेकर सरकार तक और अदालत से लेकर राष्ट्रपति भवन तक, जिस-जिसके हाथ में ताकत है वे लोग गरीब की लंगोटी को चीरकर, उसके धागों को धुनकर, उससे बनी रूई से अपने नीचे लगाने के लिए एक नर्म गद्दी बना रहे हैं। यह भी कोई लोकतंत्र है?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें