19 अप्रैल 2012
संपादकीय
भारत ने आज अपनी एक ऐसी मिसाइल को आजमाया है जो पांच हजार किलोमीटर तक जा सकेगी। इससे चीन और पाकिस्तान सहित आसपास के तमाम देशों तक उसकी पहुंच बढ़ गई है और शायद अधिक वक्त नहीं लगेगा कि पड़ोस के ये दोनों देश इसके मुकाबले की ताकत पाने में जुट जाएंगे, या कि पा चुके होंगे, या पाने के करीब होंगे। हम अभी इस मुद्दे का कोई फौजी विश्लेषण नहीं करना चाहते कि भारत की फौजी जरूरतें क्या हैं और किसी लड़ाई की नौबत आने पर उसे किस-किस तरह से तैयार रहना चाहिए। दीवार पर लिखी हुई इस बात पढऩे और समझने के लिए किसी अधिक समझ-बूझ की जरूरत नहीं है लेकिन दीवार के आरपार देखने के लिए एक समझ जरूर लगेगी लेकिन उस समझ को रोकने में दुनिया के जंगखोर लोग और जंग के सौदागर, सभी लग जाएंगे। इसलिए आज की बात फौजी तैयारियों और जंग की जरूरतों से परे यह सोचने की है कि किस तरह हिंदुस्तान इस उपमहाद्वीप के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में हथियारों की कमी की तरफ बढ़ सकता है, और ऐसा माहौल बना सकता है कि बाकी लोग भी एक-दूसरे की देखा-देखी हथियारों की दौड़ में शामिल न हों। गांधी ने एक वक्त कहा था कि आंख के जवाब में आंख ले लेने की सोच एक दिन पूरी दुनिया को अंधा बनाकर छोड़ेगी। हथियारों की लड़ाई आज वही नौबत ला चुकी है कि भारत और पाकिस्तान की सरहद के दोनों तरफ करोड़ों की आबादी कुपोषण की शिकार है, भूख से मारी जा रही है, नर्क और जहन्नुम सी जिंदगी जी रही है और हथियारों के मुकाबले में लगी हुई है। आज अगर कोई यह सोचे कि मिसाइलों का यह मुकाबला महज मिसाइलों तक जाकर रूक जाएगा, तो वैसा भी नहीं है। आज इन मिसाइलों के मुकाबले में दूसरे देश मिसाइलें बनाने में लग जाएंगे, फिर इन मिसाइलों से बचने की तकनीक, और इन मिसाइलों को खत्म करने की तकनीक बनाने में दुनिया की हथियार कंपनियां कमाई करने लगेंगी और यह सिलसिला तब तक चलते रहेगा जब तक तमाम आंखें नहीं फूट जाएंगी। फिर एक दिन अमरीका जैसा दुनिया का दादा स्टारवार जैसी एक ऐसी तकनीक लेकर आ जाएगा जिससे कि आज ढाई हजार करोड़ रूपए में बनी भारत की बनी यह मिसाइल अंतरिक्ष से ही वार करके पल भर में खत्म कर दी जाएगी।
इस मुकाबले का कभी कोई अंत नहीं होगा क्योंकि सरकारों और कारोबारियों की एक मोटी कमाई जंग के मुकाबले से जुड़ी होती है और भाड़े के चारण और भाट वीररस गाकर, या किसी दूसरे मुखौटे के पीछे से एक दहशत फैलाकर जंग का खतरा बताते चलेंगे और दुनिया की भूख की कीमत पर मिसाइलें बनती चलेंगी। हम यह सोचते हैं कि यह ढाई हजार करोड़ रूपया अगर भारत और पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते बेहतर करने पर खर्च होता तो जंग का मुकाबला आगे बढऩे की नौबत भी नहीं आती। आज तो यह सिलसिला बच्चों के मुंह से दूध और रोटी छीनकर बढ़ते चल रहा है। फौज और सरकार की सोच तांगे के घोड़े की ढंकी हुई आंखों की तरह बिल्कुल तंग नजरिए की होती है। और बाजार की जेब में जीता मीडिया भी जंग के बिगुल बजाने में लगा रहता है। ऐसे में अमनपसंद लोगों की आवाज कुचल दी जाती है, जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्तों की चाह रखने वाले लोग रात-दिन मेहनत भी करते हैं, और अपने-अपने देशों के युद्धोन्मादी लोगों की गालियां भी खाते हैं। पड़ोसी देश को दुश्मन मानकर चलने वाले लोग अपने देश के अमनपसंद लोगों को गद्दार भी मानते हैं क्योंकि साधारण समझ रखने वाले लोगों को फौजी तैयारी देशप्रेम लगती है।
गरीबी के शिकार दो देश अगर सरहद पर तनाव घटाकर अपने लोगों को बेहतर जिंदगी दे सकते हैं, तो यह उतना आसान चुनावी नारा नहीं बन सकता जितना कि जंग के माहौल में कोई बात बन सकती है। दूसरी बात यह कि गरीबों के दानों में बेईमानी करना थोड़ा मुश्किल होता है, और फौजी सामानों की खरीदी किस तरह आसानी से महंगी और बेईमान की जा सकती है यह भी सबका देखा हुआ है। भारत और पाकिस्तान जंग के सौदागरों के कारोबार के खरीददार बने हुए एक अंधे मुकाबले में लगे हैं और मिसाइलों की मार का यह मुकाबला ठीक वैसा ही है जैसा कि दो बच्चों के बीच पेशाब की धार दूर तक ले जाने का मुकाबला होता है।
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