पुलिस को पुलिस रहने दें


02 अपै्रल 2012
संपादकीय
भारत में वीआईपी कहे जाने वाले तबके के तकरीबन सोलह हजार लोगों की हिफाजत के लिए पचास हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। उनके लिए घोषित रूप से जितने लोग लगाए गए हैं, असल में उससे दुगुने लोग काम कर रहे हैं। यह जानकारी भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने दी है। केंद्र सरकार के इन आंकड़ों के बिना भी हम असल जिंदगी में अपने प्रदेश और अपने शहर में रोजाना यह देखते हैं कि किस तरह एक-एक सरकारी बंगले पर, एक-एक मंत्री, नेता और अफसर पर कितने वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी लगे रहते हैं। छत्तीसगढ़ में तो कुछ नेताओं के आसपास मंडराने वाले संदिग्ध और विवादास्पद लोगों को भी पुलिस की तरफ से बंदूकधारी हिफाजत मिली हुई है। 
कानून को लागू करने का जिम्मा जिस वर्दी पर है, जब उस वर्दी को पहने हुए लोग रात-दिन सत्ता पर सवार लोगों के इर्दगिर्द ड्यूटी करते हैं, तो सत्ता के भ्रष्टाचार के वे रूबरू गवाह भी रहते हैं, और धीरे-धीरे वे सत्ता की दलाली में भी दिलचस्पी लेने लगते हैं। यह तो बात हुई हिफाजत पाने वाले लोगों में से बेईमानों की। जो ईमानदार लोग सत्ता में हैं, उनकी हिफाजत को भी देखें तो वह भारी गैरजरूरी लगती है। बड़े बंगलों पर कुत्तों को घुमाने से लेकर बच्चों को खिलाने तक का काम सुरक्षा कर्मचारी करते हैं। बहुत सी जगहों पर टेलीफोन उठाने से पर्ची काटने तक का काम वे करते हैं और इन कामों का पुलिस के काम से कोई लेना-देना नहीं होता। नतीजा यह होता है कि धीरे-धीरे वे राजधानी या बड़े शहरों में अच्छी तरह बस चुके नाकाबिल वर्दीधारी रह जाते हैं जो साहबों और मंत्रियों के करीब रहते हुए मनचाही जगह पर अपनी पोस्टिंग पाते रहते हैं। 
यह पूरा सिलसिला एक महत्वपूर्ण महकमे के लोगों के बेजा इस्तेमाल का भी है और जनता के पैसों की एक बड़ी बर्बादी का भी है। जिस गरीब देश में जेल के कैदियों को अदालत तक ले जाने के लिए पुलिस कम पड़ती है और सबसे गरीब, सबसे बेसहारा कैदी अपनी संभावित सजा से अधिक दिन जेल में मुकदमे के दौरान ही काटने को बेबस होते हैं, वहां पर पुलिस का ऐसा बेजा इस्तेमाल उन कैदियों में से छूट जाने वाले लोगों की जिंदगी खत्म करने वाला भी है। पुलिस जिस काम के लिए बनी है, उससे परे जब वह तथाकथित महत्वपूर्ण, वेरी इम्पाटेंट पर्सन कहे जाने वाले लोगों के आसपास चपरासी और अर्दली जैसे काम में झोंक दी जाती है तो उसका भी मनोबल खत्म होने लगता है। अपनी वर्दी को लेकर और अपनी जिम्मेदारी को लेकर उनके मन जो गौरव रहना चाहिए, वह गायब हो जाता है क्योंकि जांच एजेंसियां और अदालतें तो वीआईपी-भ्रष्टाचार, वीआईपी-अपराध को बाद में देखती हैं, इनके साथ तैनात सुरक्षा कर्मचारी तो रात-दिन बैगों की आवाजाही देखते हैं, उसी गाड़ी में बैठे टेलीफोन पर होती हुई बातचीत को सुनते हैं। 
छत्तीसगढ़ को इस मामले में एक पहल करनी चाहिए। उसे पुलिस को तमाम गैरपुलिसिया काम से अलग करके, बेगारी के ऐसे कामों के लिए पुलिस से कम काबिलीयत वाले अर्दली तैनात करने चाहिए। रातों-रात तो लोगों के सामंती मिजाज खत्म हो नहीं सकते, इसलिए बिना अर्दलियों के बहुत से जूते बंध जाने की उम्मीद हम नहीं करते। जब तक देश में सत्ता के ऐसे बेगार-सुख पर कोई सजा तय नहीं होती तब तक सेवकों की एक ऐसी जमात के लिए लोगों को रोजगार मिलना चाहिए जो कि जनता को सस्ती पड़े, और जिसकी वजह से पुलिस खाली होकर अपना जरूरी काम कर सके। आज कागजों पर सुरक्षा कर्मचारियों की जो तैनाती है, असल में उससे दो गुना या और भी अधिक खाकी वर्दियां खादीधारियों के आसपास तैनात हमें ही दिख जाती हैं, उसके लिए संसद में किसी जानकारी के आने की जरूरत नहीं है। अर्दली तैनात करने की हमारी बात अलोकतांत्रिक लग सकती है, वह जनता के पैसों की अधिक बर्बादी भी लग सकती है, लेकिन पुलिस से इस तरह के काम करवाना उससे ही बंद हो पाएगा। 

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