20 अप्रैल 2012
केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि शिक्षा में सुधार और भ्रष्टाचार मिटाने उन्होंने 14 से भी अधिक विधेयकों के मसौदे तैयार किए है, लेकिन संसद को प्रभावित कर रहे निहित स्वार्थ उन्हें पारित नहीं होने देते। कपिल सिब्बल ने व्यवसाय के इरादे से शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को संस्थानों के लिए मंजूरी देने के लिए जहां राज्य सरकारों की आलोचना की वहीं यह भी कहा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो शिक्षा में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक कार्यक्रम में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि भारत को मजबूत बनाने की कोशिशों पर राजनीतिक दलों के सत्ता में बने रहने के स्वार्थ हावी हो रहे हैं। सिब्बल ने आरोप लगाया कि निजी शिक्षा संस्थान चलाने वाले ताकतवर लोग शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने वाले इन विधेयकों को अटका रहे हैं। इन्हें शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है, वे केवल पैसा कमाने इस क्षेत्र में आए है।
कपिल सिब्बल की इन बातों को देखें तो ऐसा लगेगा कि भारतीय लोकतंत्र की इस संसदीय हालत के बारे में नक्सली देश को बताते हुए बगावत की जमीन तैयार कर रहे हैं। आज जब देश में स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों का काम देखने वाले केंद्रीय मंत्री ही ताकतवर बाजार को इतना खतरनाक बता रहे हैं कि ये ताकतें संसद को प्रभावित करके विधेयक पास नहीं होने दे रही हैं, तो फिर नक्सली ही अगर इस देश के संसदीय लोकतंत्र को खारिज करते हैं, तो क्या गलत करते हैं? कपिल सिब्बल ने जो कहा है वह हमारे जैसे लोगों को लंबे समय से महसूस होते आया है और हम बार-बार यह लिखते भी हैं कि देश की संसद और विधानसभाएं जिस तरह से करोड़पतियों और अरबपतियों से भरती चली जा रही हैं, उनमें गरीब की फिक्र करने वाले लोग अब बच कितने गए हैं? बाजार की ताकतें न सिर्फ झारखंड से राज्यसभा की सीटें खरीदती हैं बल्कि और जगहों पर भी पार्टियों की टिकटें अपनी मर्जी के लोगों के लिए खरीदती हैं और चुनाव में उनके लिए जीत और हार भी खरीदती हैं। इसके बाद जैसा कि राडिया टेप से सामने आया, बाजार अपने खरीदे हुए सांसदों के लिए मंत्रालय भी खरीदता है और फिर उसके बाद पूरे देश को खरीद लेता है, आसमान की दूरसंचार तरंगों से लेकर, जमीन के नीचे की कोयला खदानों तक। जब पार्टी, सांसद-विधायक, संसद के सवाल-जवाब, संसद का मतदान, वहां विधेयकों की रफ्तार और फिर बने हुए किसी कानून का लागू होना और न होना, यह सब कुछ मंडी में टोकरों में सजे हुए हों, तो फिर इससे ज्यादा पंसदीदा नौबत बाजार के लिए और क्या हो सकती है?
जिन लोगों को सरकार, अदालत या लोकतंत्र के किसी भी और दायरे से कोई काम करना या करवाना होता है, उनकी बातों को सुनें तो ऐसे लोग सबसे अधिक खुश होते हैं कुर्सियों के बेईमान होने से। उन्हें यह भरोसा रहता है कि अगर कोई पैसा खा रहा है तो फिर काम तो हो ही जाएगा। एक केंद्रीय मंत्री जब सार्वजनिक मंच पर, उद्योग और व्यापार के एक संगठन में मंच और माईक से जब संसद की खरीदी-बिक्री के बारे में इस तरह साफ-साफ कह रहा है तो लगातार बेईमानी झेल रही जनता के मन की निराशा को एक सुबूत भी मिल जाता है। तमाम लोग यह देखते हैं कि किस तरह आज स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, इन तमाम जगहों पर सत्ता की ताकत और पैसों का बोलबाला रहता है। महाराष्ट्र के मामले तो रोज सामने आ रहे हैं कि किस तरह वहां मुख्यमंत्रियों और दूसरे ताकतवर मंत्रियों ने अपने-अपने स्कूल-कॉलेजों के लिए सरकारी जमीनों को जुटाया। कुछ समय पहले यह बात भी खुलकर सामने आई थी कि किस तरह महाराष्ट्र के ही मंत्रियों के स्कूल-कॉलेज और उनके विश्वविद्यालय लाखों रूपयों में सीटें बेचते हैं। आज भी वे सारे लोग मंत्री बने हुए हैं और महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक राज कर रहे हैं।
जब लोकतंत्र को हांकने वाले लोग अपने चक्कों तले कमजोर और गरीब लोगों के हकों को कुचलते हुए चलते हैं, और पैसे वालों को सब कुछ बेचते हुए चलते हैं तो लुटी हुई जनता का भरोसा लोकतंत्र से खत्म हो जाता है। भारत में आज नेता, राजनीति और अफसर, मीडिया जैसी तमाम ताकतों के लिए जनता के मन में नफरत इसीलिए बैठी हुई है कि उसे इस बात का पक्का भरोसा है कि भारतीय लोकतंत्र में हर ताकत अपने से कमजोर को लूटने के लिए ओवरटाईम कर रही हैं।
कपिल सिब्बल की पार्टी सात बरस से अधिक समय से देश को हांक रही है। उन्हीं की पार्टी के अर्जुन सिंह अपनी जिंदगी के आखिरी तमाम बरस देश की शिक्षा के मंत्री रहे, और उनके बाद से कपिल सिब्बल यह देख रहे हैं। इसके बाद भी अगर उनको देश के ताकतवर कारोबारियों की साजिश के सामने इतनी बेबसी लगती है, तो यह लोकतंत्र की नाकामयाबी का एक नमूना है। हमारा ख्याल है कि देश की राजनीतिक पार्टियों को, और दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कपिल सिब्बल की कही बातों पर आगे चर्चा करनी चाहिए, उस चर्चा के बिना बचा-खुचा लोकतंत्र खत्म हो जाना तय है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें