07 अपै्रल 2012
संपादकीय
चीन में अभी एक ऐसा स्कूली बच्चा सामने आया है जिसने पिछले बरस एक आईपैड खरीदने के लिए इंटरनेट पर मानवअंग के सौदागरों के जाल में फंसकर अपनी किडनी बेच दी थी और उससे मिले तीन हजार डॉलर में से आईपैड और कुछ ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स सामान खरीद लिए थे। अब जब उसकी तबीयत खराब हुई तो घरवालों को यह पता लगा। चीन सरकार तक बात पहुंचने पर दो सर्जनों सहित पांच लोग गिरफ्तार किए गए हैं।
बाजार की हिंसक ताकतों के हमलावर प्रचार का नतीजा यह होता है कि इंसान सिर्फ ग्राहक बनकर बच जाते हैं। ऐसे ग्राहक नई चीज, अधिक चीजों, बेहतर चीजों की चाह में उसी तरह लगे रहते हैं जिस तरह एक साहूकार निन्यानवे के फेर में पड़े रहता है कि सौ पूरे होते ही उस पैसे को और ब्याज पर लगा दिया जाए। आज मध्यम वर्ग से ऊपर के सारे तबके ऐसे उपभोक्तावाद के शिकार हैं जिनके दिल-दिमाग में कंपनियां एक फर्जी जरूरत पैदा करती हैं, और इसके लिए मीडिया नाम के औजार को ये कंपनियां हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं। अब एक के बाद एक ऐसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं जिनमें मीडिया अपने-आपको, अपने समाचार और विचार की जगह को लगातार बाजार के हाथों बेचते चल रहा है। भारत के एक सबसे बड़े मीडिया घराने के, देश के सबसे बड़े अखबार में बाजार की बाजारू खबरों को, तस्वीरों को छपवाने के लिए रेटकार्ड बने हुए हैं और अभी कुछ हफ्ते पहले औपचारिक रूप से इस कंपनी ने एक अमरीकी अखबार के सवाल के जवाब में अपने इन तौर-तरीकों को मान भी लिया है।
अब जब बाजार और मीडिया दोनों मिलकर एक बहुत महंगी और हिंसा की हद तक अश्लील जीवनशैली को बढ़ावा देने में जुटे हुए हैं, फिल्म से लेकर क्रिकेट तक के सितारे महंगे सामानों को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं, तब ग्राहक रह गया इंसान आखिर कब तक विश्वामित्र की तरह का काबू कायम रख सकेगा? जब हर दूसरे-चौथे दिन कोई न कोई नया सामान, कोई न कोई नई सर्विस जब मेनका की तरह सामने एक मादक आईटम सांग करने लगे, तो ग्राहक को अपने-आप पर कितना काबू रह सकता है? नतीजा यह होता है कि मध्यम वर्ग या उससे ऊपर के तबकों के बहुत से बच्चे अपनी हसरतेें पूरी करने के लिए बहुत सी अनचाही और नाजायज बातों को भी करने लगते हैं। अपने आसपास के संपन्न तबके को देखते हुए उनके जैसे सामान लेने, उनकी तरह की फैशन करने के लिए बहुत सी लड़कियां गलत राह पर भी जाते दिखती हैं। ऐसा न करने वाले बच्चे भी अपने सीमित साधनों वाले मां-बाप से ऐसी उम्मीद करते हैं, ऐसे तनाव खड़े करते हैं कि अपनी सीमा के बाहर जाकर भी मां-बाप उनके लिए कुछ इंतजाम करने की कोशिश करते हैं।
बुद्ध, महावीर और गांधी के देश में इनकी दी हुई किफायत की, सादगी की, त्याग की सोच अब कहीं नहीं रह गई। अब सोच, किसी भी तरह की सोच, की कीमत एक सेंकंडहैंड सस्ते मोबाईल फोन जितनी भी नहीं रह गई। अब नई पीढ़ी बाजार के सामानों की नई पीढ़ी के साथ कदम मिलाकर चलती है जो कि हर बरस दो बरस में नई खेप उतार देती है। अभी पिछले बरस की ही खबर थी कि मध्यप्रदेश में एक जगह एक दूसरा मोबाईल फोन पाने के लिए शायद पांचवीं कक्षा के बच्चे ने जिद की, और पिता के डांटने पर आत्महत्या कर ली। और यह बात सिर्फ हिंदुस्तान में हो ऐसा भी नहीं है। अमरीका में शिकागो जैसे शहर के बारे में यह कहा जाता है कि वहां की कुछ गरीब बस्तियों की तरफ लोगों को महंगे मोबाईल फोन या महंगे आईपॉड लेकर नहीं जाना चाहिए। कुछ बरस पहले जब एक बड़ी मशहूर कंपनी ने बहुत महंगे जूतों का आक्रामक प्रचार किया तब वहां कुछ ऐसे कत्ल हुए जिनमें लोगों का गला काटकर कातिल सिर्फ उनके जूते उतारकर ले गए। अपनी जान दे देने, अपनी किडनी बेच देने या किसी और का गला काट देने जैसे काम अगर किसी एक सामान के लिए किए जाने लगें, और खासकर गैरजरूरी सामानों के लिए किए जाने लगें, तो यह बाजार के हिंसक प्रचार की एक बड़ी कामयाबी है। बाजार आज बच्चों से लेकर बड़ों तक यह बात पूरी तरह समझाते चलता है कि जिंदगी का मकसद नए से नया सामान, नए से नया बाजारू मजा है। आज चीन से ऐसा मामला सामने आया है, लेकिन हमें ऐसी एक भी वजह दिखाई नहीं पड़ती कि भारत में जहां पर बड़े-बड़े अस्पताल और बड़े-बड़े सर्जन लोगों को धोखा देकर उनकी किडनी निकालकर बेचने का धंधा करते आए हैं वहां पर आईपैड के लिए या किसी मोटरसाइकल के लिए ऐसा क्यों नहीं हो रहा होगा? आगे-पीछे यहां भी इस तरह की बात सामने आ सकती है, और आज भी ऐसी जांच की जानी चाहिए। लोगों को चेन्नई की उस बस्ती को नहीं भूलना चाहिए जहां का हर मकान किडनी बेचकर मकान पाने वालों का है और जहां हर घर में बदन पर लंबे-लंबे चीरों वाली तस्वीरें एक वक्त मीडिया की रिपोर्ट में सामने आई थीं। आज शायद मीडिया भी इन तस्वीरों के बजाय पांच सितारा अस्पतालों की तस्वीरें छापने में अधिक भरोसा करता है और करेगा। अंगे्रजी पढऩे वाले लोगों ने चिकित्सा विज्ञान पर काल्पनिक कहानियां लिखने वाले रॉबिन कुक के लिखे रोमांचक उपन्यास पढ़े होंगे जिनमें तरह-तरह के मेडिकल-जुर्म की कहानियां रहती हैं। आज का डॉक्टरी-बाजार देखें तो वे कहानियां अब फीकी लगने लगी हैं।


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