नक्सल मोर्चे पर छत्तीसगढ़ एक नई पहल करे


22 अप्रैल  2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नए बने जिले सुकमा के एक नौजवान आईएएस अफसर को जिले का पहला कलेक्टर बनने मिला तो यह बड़ा हादसा हो गया। कल जब देश में सिविल सर्विसेस दिवस मनाया जा रहा था उसी दिन छत्तीसगढ़ में इस तबके के एक अफसर का अपहरण हुआ। राज्य भर में शासन का सालाना ग्रामीण जनसंपर्क कार्यक्रम ग्राम सुराज चल रहा है और नक्सल इलाकों में भी सत्तारूढ़ जनप्रतिनिधि और अधिकारियों की आवाजाही पहले से घोषित कार्यक्रम के मुताबिक चलना तय था। ऐसे में नक्सलियों की दो दिनों में दो वारदातें बस्तर में ही हो गई हैं। पहले दिन एक विस्फोट से एक विधायक के काफिले पर हमला हुआ जिसमें तीन लोग मारे गए। और कल कलेक्टर का अपहरण हो गया जिसके साथ-साथ उनके दो सुरक्षा कर्मियों को नक्सलियों ने मार डाला। चूंकि नक्सली आए दिन लोगों को मार रहे हैं इसलिए आज उनके बारे में उस पहलू को लेकर लिखने का कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन एक आईएएस अधिकारी के अपहरण को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के सामने जो एक परेशानी खड़ी हुई है उस पर चर्चा करने की जरूरत है।
पाठकों को यह याद होगा कि बस्तर से लगे हुए उड़ीसा के कोरापुट जिले में एक विधायक के अपहरण को कई हफ्ते गुजर गए हैं। और राज्यों की एक गैरमौजूद सरहद के आरपार नक्सली सारे इलाके में आते-जाते रहते हैं और वारदात भी करते रहते हैं। इसलिए अगल-बगल के सुकमा और कोरापुट के इन दो अपहरणों के पीछे नक्सलियों का कोई एक दलम चाहे न भी हो, राज्य सरकार को घुटनों पर लाकर उनसे नक्सलियों और नक्सल-हमदर्दों को जेलों से छुड़वा लेने का उनका इसी महीने का उड़ीसा का अनुभव शायद छत्तीसगढ़ में भी हौसला बढ़ाने वाला रहा और यहां वे एक अफसर को उठा ले गए। अब केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच इस बात को लेकर पिछले एक पखवाड़े से यह मतभेद चल ही रहा है कि ऐसी नौबत आने पर नक्सलियों के सामने किस रफ्तार से घुटने टेके जाएं, उनकी कितनी मांगें मानी जाएं, कितने कैदियों को छोड़ा जाए। यह एक बहुत ही मुश्किल नौबत रहती है जब किसी बेकसूर की जिंदगी को बचाने के लिए कई संभावित कुसूरवारों को जेल से छोडऩा पड़ता है, या छोड़ा जाता है। हमने ऐसी ही नौबत से बचने के लिए इसके पहले भी इसी जगह अपनी बात लिखी थी कि राज्य सरकारों को ऐसी किसी नौबत को लेकर अपनी एक नीति पहले से बनानी चाहिए और पहले से उसकी घोषणा करनी चाहिए ताकि किसी बड़े व्यक्ति या किसी छोटे व्यक्ति के अपहरण के मामले में सरकार पर यह आरोप न लगे कि उसने छोटे को तो मर जाने दिया, और बड़े को बचाने के लिए कैदी छोड़े। हमारे कुछ जानकार दोस्तों का यह कहना है कि ऐसी कोई नीति दुनिया में कहीं भी नहीं बनाई जाती और वक्त आने पर ही अलग-अलग मामले में उसके महत्व के हिसाब से सब तय किया जाता है। लेकिन एक बार जब नक्सलियों या किसी भी दूसरे किस्म के अपराधियों के हाथ यह लग जाएगा कि वे किसी बड़े व्यक्ति का अपहरण करके बहुत से लोगों को छुड़ा सकते हैं, तो फिर यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, और लगातार अपराधियों को छोड़ते चले जाने से सुरक्षा बलों का हौसला भी पस्त होगा और उनकी मेहनत पर भी पानी फिरते रहेगा।
यहां पर हम छत्तीसगढ़ में खड़ी मौजूदा दिक्कत से थोड़ा सा परे की भी बात करना चाहते हैं क्योंकि इस घटना को सिर्फ एक घटना जैसा मानना ठीक नहीं होगा। छत्तीसगढ़ को इस मौके पर नक्सलियों से निपटने की पुलिस-नीति के साथ-साथ एक ऐसी राजनीतिक-नीति के बारे में भी सोचना होगा जिससे कि इसका कोई स्थायी हल निकल सके। लोगों को याद है कि पंजाब के आतंक के दिनों में जब अर्जुन सिंह वहां राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तो उन्होंने प्रदेश को एक राजनीतिक समाधान तक पहुंचाया था। और पंजाब के आतंक के खात्मे के इतिहास में उनका नाम दर्ज भी होगा। वहां पर उस दौरान भी पुलिस और शायद फौज की भी कार्रवाई चलती रही, लेकिन इलाज तो राजनीतिक ही हो पाया। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास आज यह एक मौका है जब वे अपनी सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों की जान बचाने के लिए, और राज्य के आधे से अधिक नक्सलग्रस्त इलाकों में लोकतंत्र की वापिसी के लिए नक्सलियों से बातचीत का एक रास्ता शुरू करें। एक तरफ पुलिस अपना काम जारी रख सकती है, लेकिन दूसरी तरफ बीच के कुछ भरोसेमंद लोगों को लगाकर बातचीत करनी ही होगी। सरकार अगर चाहे तो एक बड़ी फौजी कार्रवाई करके नक्सलियों का कुछ समय के लिए नुकसान तो कर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र, महाराष्ट्र, झारखंड और मध्यप्रदेश का जुड़ा हुआ सारा इलाका किसी भी फौजी कार्रवाई से जब नक्सलमुक्त कराने की बात होगी तो हजारों जान जाना तय सा होगा। इसलिए वह कोई विकल्प भारतीय लोकतंत्र के भीतर कभी भी नहीं हो पाएगा। रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, और एक-एक घटना के बाद, एक-एक व्यक्ति को छुड़ाने के लिए की गई बातचीत हमेशा ही सरकार को महंगी पड़ेगी। इसलिए आज छत्तीसगढ़ सरकार को एक नए रास्ते की तलाश शुरू करनी चाहिए, और जब देश का यह सबसे बड़ा आतंरिक खतरा केंद्र सरकार तक को असफल साबित कर चुका है, तब इसके समाधान के लिए पहल करने वाले का नाम इतिहास में दर्ज भी होगा।

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