दिल्ली में कांगे्रस के ताबूत में ठुकी तीन और कीलें


17 अप्रैल 2012
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली में तीन नगर निगमों के चुनाव में कांगे्रस का सूपड़ा ही साफ हो गया है। तीनों पर भाजपा का कब्जा हो चुका है और कांगे्रस की बहुत शर्मनाक शिकस्त है। वहां पर शीला दीक्षित मुख्यमंत्री हैं, जिनके इलाके में यह चुनावी नतीजे सामने आए हैं। उनके बेटे संदीप दीक्षित भी दिल्ली से ही निर्वाचित सांसद हैं, और ये नतीजे इन दोनों को नुकसान पहुंचाने वाले तो हैं ही, देश भर में कांगे्रस की जो फजीहत लगातार चल रही है यह उसी सिलसिले की एक और कड़ी है।
दिल्ली के स्थानीय चुनावों का कोई बारीक विश्लेषण करना आज का यहां मकसद नहीं है, लेकिन देश की राजधानी का माहौल बाकी देश तक जरूरत से कुछ अधिक जाता है और यह कांगे्रस को खासा सदमा देने वाला दिन है। हम पिछले एक-दो बरस लगातार कांगे्रस की लीडरशिप, कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार, उसके प्रधानमंत्री और इन सबके कामकाज को लेकर लिखते आ रहे हैं कि कांगे्रस हाईकमान के हाथ से रस्सी फिसलती चली जा रही है। इसकी सरकार के मंत्रियों से लेकर इसके नेताओं तक, और सुरेश कलमाड़ी जैसे इसके खेल राजनीति के नेताओं तक, यह पूरा खेमा अलीबाबा की कहानी के चालीस चोरों जैसा दिख रहा है। कदम-कदम पर देश को जिस तरह निराशा हो रही है उसी का नतीजा है कि दिल्ली में कांगे्रस को लोगों ने बुरी तरह से खारिज कर दिया है। यह शहर देश की राजनीति से कुछ अधिक जुड़ा होता है क्योंकि यहां की सुबह सत्ता के कारनामों से रंगे अखबारों से शुरू होती है। और कांगे्रस ने बुरी तरह बढ़ी हुई महंगाई के साथ तरह-तरह की कालिख से काला हुआ अपना चेहरा लोगों को दिया, और लोगों ने उसे धकेल दिया। 
उत्तरप्रदेश और पंजाब, गोवा और डांवाडोल उत्तराखंड के नतीजों के बाद अब दिल्ली के म्युनिसिपल के नतीजे देश की जनता का रूख बता रहे हैं। जो शीला दीक्षित सत्ता में तीसरी बार लौटकर आई थी वे भी अपनी पार्टी के लोगों को जिताने की ताकत कम से कम म्युनिसिपल चुनाव में नहीं दिखा पाईं। कांगे्रस के पार्षद भाजपा से आधे से भी कम दिख रहे हैं, और यह एक ऐसा तगड़ा झटका है जिससे अगर अभी भी कांगे्रस की नींद नहीं खुली तो देश भर के अगले चुनावों में वह इसी तरह खारिज कर दी जाएगी। पूरी तरह से और बुरी तरह से भ्रष्ट सरकार देने वाली यूपीए की मुखिया कांगे्रस का भविष्य, उसके खानदानी चिराग राहुल गांधी को उत्तरप्रदेश ने जिस तरह वापिस घर भेज दिया है, उससे अब गांधी परिवार का वह चर्चित करिश्मा भी ढीला हो गया दिखता है। जहां राहुल, प्रियंका, और उनके बच्चे, सब कोई चुनावी मंच पर पेश कर दिए थे वहां भी अमेठी और रायबरेली में कांगे्रस को लोगों ने खारिज कर दिया था। यह तो इस पार्टी की अपनी बेशर्मी है कि उस बुरी तरह हार का ठीकरा भी लोग राहुल के सिर पर न फोडऩे देने के लिए अपने सिर सामने कर रहे हैं, लेकिन महीनों से उत्तरप्रदेश में राहुल की बयानबाजी लोग देख ही रहे थे। इसलिए लोगों को ऐसा कोई शक नहीं है कि वहां की हार किसकी हार थी।
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन में कुनबापरस्ती को पूरी तरह खारिज करना चाहिए वह चाहे गांधी परिवार की हो, दीक्षित परिवार की हो या फिर मुलायम सिंह के कुनबे की हो। दिल्ली में सत्ता पर काबिज कुनबे के लिए भी यह एक झटका है और चाहे यह शिकस्त कुनबापरस्ती की वजह से न हुई हो, हम कुनबापरस्ती को इन नतीजों से लगने वाले झटके को महत्वपूर्ण मानते हैं और इसे लोकतंत्र की तरफ एक कदम भी मानते हैं। हमारा ख्याल है कि इन चुनावी नतीजों से कांगे्रस के अगले चुनाव के आसार का ताबूत अब तीन और कीलें ठुकवा चुका है।

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