गुफा की तरफ वापिसी?


29 अप्रैल 2012
संपादकीय
एक तरफ जब यूपीए सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि किस तरह आपसी सहमति से यौन संबंध बनाने की न्यूनतम उम्र सोलह बरस से बढ़ाकर अठारह बरस कर दी जाए तब दिल्ली की एक अदालत ने सांसदों से यह कहा है कि सामाजिक बदलाव को देखते हुए यौन संबंधों की उम्र के कानून पर विचार करना चाहिए क्योंकि आपसी सहमति वाले पे्रमी-पे्रमिकाओं से असहमत परिवार भी कानून की उम्रसीमा का इस्तेमाल करके पे्रम और सहमति को अपहरण और जबरदस्ती साबित करने लगते हैं।
दिल्ली की इस अदालत की महिला जज की यह राय तो आज देखने मिली लेकिन पिछले दो-तीन दिनों से जब से सहमति की न्यूनतम उम्र बढ़ाने की खबर आ रही थी, हम उससे असहमत थे। आज भारत जैसे देश में भी लड़के-लड़कियों की, सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक परिवक्वता कम उम्र में आ रही है। बच्चों के मां-बाप बनने की क्षमता अब तेरह बरस की उम्र में हो जा रही है और इस दकियानूसी समाज में ऐसे बच्चे किसी सेक्स-शिक्षा के बिना सिर्फ पोर्नोग्राफी के सहारे वयस्क बातों को समझते हैं। ऐसे में न तो शरीर की जरूरतों को और न ही भावनाओं को बहुत जिम्मेदारी के साथ समझना हो पाता है। लेकिन एक दूसरी बात यह है कि ऐसा लड़के और लड़कियों, दोनों के साथ होता है। वे परिपक्व हो जाते हैं, लेकिन उतनी जिम्मेदारी उनकी रोज की जिंदगी में कई बार नहीं रहती जितनी कि एक पीढ़ी पहले के मां-बाप उसने उम्मीद करते हैं। ऐसे में पे्रम-प्रसंग में आमतौर पर कानून का लड़के के खिलाफ इस्तेमाल होता है और सहमति से भी घर से दूर चले जाने पर अपहरण और आमतौर पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए लड़के को बंद कर दिया जाता है और लड़की को मां-बाप के हवाले कर दिया जाता है जिनसे कि वे अपने पे्रम को लेकर असहमत भी रहती है। भारत में आमतौर पर पे्रम के खिलाफ इतना बागी माहौल रहता है कि कोई लड़की खुलकर अपनी पसंद अपने मां-बाप से कह सके ऐसा बहुत ही छोटे फीसदी परिवारों में हो पाता है।
ऐसे में जब आपसी सहमति से देहसंबंध बनाने की उम्र सोलह से बढ़ाकर अठारह करने की बात हो रही है तो बलात्कार और अपहरण के आरोपों के लिए दो बरस और बढ़ जाएंगे। जब तक किसी ताकत के इस्तेमाल से जबरदस्ती न हो तब तक आपसी सहमति से सोलह बरस की उम्र में हुए संबंधों में किसी एक साथी को कुसूरवार ठहराना ठीक नहीं लगता। आज तो जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय एकता के लिए अंतरजातीय और अंतरधर्मीय शादियों को बढ़ावा देना चाहिए और इसके लिए पे्रम-संबंधों को एक कानूनी सुरक्षा भी देनी होगी। समाज तो अपनी जाति और धर्म व्यवस्था को कायम रखने के लिए हर किसी किस्म की मोहब्बत पर उसी किस्म की ज्यादती करते रहेगा जिस किस्म की ज्यादती सलीम और अनारकली पर हुई थी, लेकिन कानून को लोगों को हिफाजत देनी होगी। आज अठारह बरस की उम्र में भारत के लोग अपनी सरकार चुनते हैं, लेकिन वे अपना पे्रम-साथी या जीवन-साथी नहीं चुन सकते। यह सिलसिला पूरी नौजवान पीढ़ी को कई किस्म के मानसिक तनाव और कुंठाओं का शिकार बनाकर रख देता है और आज के माहौल में जो सांस्कृतिक उदाहरण दूसरे उदार और विकसित देशों से भारत तक पहुंचते हैं वे भारत के नौजवानों को अपनी मर्जी और पे्रम का रास्ता भी दिखाते हैं। अब अठारहवीं सदी की बातों से चिपककर जीने वाला भारतीय पाखंड इस देश को एक उत्साह से भरी नौजवान पीढ़ी नहीं दे पाएगा। हमारा बहुत साफ मानना है कि हर पीढ़ी को उसके वक्त के मुताबिक काफी कुछ आजादी देने की जरूरत है।
जब भारत का सुप्रीम कोर्ट यह तय कर चुका है कि वयस्क लड़के-लड़कियां अगर साथ रहते हैं तो उसमें कोई बात अनैतिक नहीं है और शादी करना कहीं जरूरी नहीं है, तब भी इस देश की पुलिस हर राज्य में किसी होटल में ठहरे हुए लड़के-लड़कियों को परेशान करने या उनसे उगाही करने में लगी रहती है और इसके लिए वेश्यावृत्ति को रोकने के लिए बने एक कानून का बेजा इस्तेमाल करती है। तो एक तरफ मां-बाप अपहरण और बलात्कार के कानून का बेजा इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ पुलिस इस तरह के कानून का। भारत के आज के समाज में हमउम्र लड़के-लड़कियों के बीच सोलह बरस की उम्र के बाद आपसी सहमति से, बिना जबरदस्ती बने देह-संबंधों को गलत करार देने वाला कानून बहुत ही गलत है। और अब जो चर्चा है वह इसे बढ़ाकर अठारह बरस तक ले जाने की है जिससे कि लड़कियों के मां-बाप तरे एकबारगी खुश हो सकते हैं लेकिन यह फैसला दकियानूसी होगा और नौजवान पीढ़ी की मानसिक सेहत के खिलाफ होगा। इस पर समाज के खुले दिमाग के लोगों को आज चर्चा करनी होगी वरना गुफा की तरफ वापिसी वाला यह कानून समाज का नुकसान करेगा।

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