06 अपै्रल 2012
संपादकीय
कमजोर दिल के बहुत से लोग घरों में टेलीविजन पर खबरें चलने ही नहीं देते। अपहरण करके हत्या, साजिश करके रिश्तेदार को मार डालने जैसी खबरों के साथ-साथ बलात्कार की ऐसी भयानक खबरें आती हैं कि इंसानियत नाम का एक प्रचलित शब्द पूरी तरह मुखौटे सा लगता है। लोग बात-बात में मानवीयता या इंसानियत का हवाला देते हैं। हकीकत तो यह है कि हर किस्म के जुर्म, हर किस्म के गलत काम इंसानियत का एक हिस्सा ही हैं, इनको अपने में शामिल न करके इंसान अपने-आपकी एक बेहतर तस्वीर पेश करना चाहते हैं जो कि सच नहीं है।
अभी उत्तरप्रदेश से कहीं से यह खबर आ रही है कि एक अनाथाश्रम की सात से नौ बरस की कई बच्चियों के साथ वहीं के एक चपरासी ने बलात्कार किया। अब इससे भयानक बात और क्या हो सकती है जिसे टीवी के परदे पर देखने के बाद, उसे महिलाओं और बच्चों से परे रखने की जरूरत लगती है। कुछ समय पहले की बात हमें याद है जब दिल्ली का आरूषि हत्याकांड खबरों में बहुत अधिक था और घरों में जब टीवी शुरू रहता था तब बच्चों और महिलाओं के कानों में वह बात पड़ती ही थी। वैसी हालत में कुछ बच्चियों की दिमागी हालत भारी तनाव से घिरी हुई थी कि क्या मां-बाप भी अपनी बेटी को मार सकते हैं? क्या घर के भीतर किसी बच्ची से ऐसा हो सकता है? इसके पहले निठारी कांड की जानकारियां इतनी भयानक थीं कि उसको छापने में डर लगता था। जब लोग सोच-समझकर इलाके की बच्चियों को झांसा देकर घर में ले जाते थे और मालिक-नौकर मिलकर उन बच्चियों से बलात्कार करते थे, उन्हें मार डालते थे, टुकड़े कर देते थे, कभी-कभी पकाकर खा लेते थे, और फिर पॉलीबैग में भरकर पीछे गली में फेंक देते थे। इन खबरों के बाद हमारे मन में जो सवाल उठते हैं वे बहुत साफ हैं, इंसानियत अपनी आज की प्रचलित फर्जी परिभाषा से परे तो है ही, वह कितने दूर है? दूसरी बात यह कि इस पूरी दुनिया में जिस ईश्वर की मर्जी के खिलाफ पत्ता भी न हिलने की बात सभी धर्मों के आस्थावान लोग मानते हैं और बताते हैं, ऐसी वारदातों के वक्त उस ईश्वर की मर्जी आखिर होती क्या है? एक मकान के पीछे की गली में एक के ऊपर एक ढेर बनती चली जाने वाली बच्चों की ऐसी लाशों को ऊपर से ईश्वर तो देखता ही होगा।
लेकिन चूंकि हमारी कोई आस्था ऐसे किसी ईश्वर पर नहीं है, और न ही हमारी आस्था इस पर है कि इंसानियत सिर्फ अच्छी बातों का एक गुलदस्ता है। इन दोनों को ही मानने वाले लोग तरह-तरह के जुर्म के खतरों को अनदेखा करते हैं। जब छोटे-छोटे बच्चों से बलात्कार किया जाता है तो ऐसा समाज उन बच्चों की जिंदगी के आखिर दिन तक के लिए एक नुकसान की गारंटी कर लेता है। उन बच्चों का भी नुकसान और समाज का भी नुकसान। जिस मासूम तन और मन को ऐसी ज्यादती झेलनी पड़ती है, उसके जख्म उसकी आखिरी सांस तक रिसते ही रहते हैं। जो भारत और उसकी सरकार इस बात को लेकर महीनों से चीख-पुकार मचा रहे हैं कि योरप का एक देश नार्वे, एक भारतीय परिवार के बच्चों को ठीक-ठाक रखरखाव न करने का आरोप लगाकर सरकारी हिफाजत में ले गया है, उस भारत के अपने बच्चों का अपने देश में क्या हाल है यह कदम-कदम पर दिख रहा है।
हमारा मानना है कि बच्चों के देहशोषण के हजारों मामलों में से शायद ही एक मामला पुलिस तक पहुंचता होगा। परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों के हाथों आसपास के छोटे बच्चे लुटते हैं। और उनके मुंह खोलने पर मां-बाप ही उन्हें चुप करा देते हैं, उन्हें अपने बच्चों से अधिक अपने आसपास के बड़ों पर भरोसा रहता है। लेकिन घर-परिवार की सुरक्षा से परे जो बच्चे फुटपाथों पर जीते हैं, रेलवे प्लेटफार्म पर रोजी कमाते हैं, और अनाथाश्रमों में रहते हैं, उन सबका बहुत बुरा हाल रहता है। अभी जो आंकड़े हैं उनके मुताबिक आबादी का एक फीसदी से अधिक हिस्सा ऐसा है जो कि बेघर बच्चों का है। ऐसे तमाम बच्चे बलात्कार का खतरा झेलते हैं, उसके तले जीते हैं। भारत की सरकारें और यहां का समाज इस तबके के लिए इतने बेपरवाह इसलिए हैं क्योंकि इन बच्चों का वोट नहीं है, और रिश्वत देने के लिए इन बच्चों के पास नोट नहीं है। लेकिन अपने-आपको एक जनकल्याणकारी लोकतंत्र कहने वाले भारत के लिए यह शर्म से डूब मरने की बात है कि अपनी आबादी के एक फीसदी ऐसे बच्चों के लिए उसके पास कोई योजना नहीं है और उनको बचाने की इस देश के पास कोई फिक्र भी नहीं है। जो समाज इन बच्चों की चर्चा करना नहीं चाहेगा, वह अपने भविष्य को एक खतरे में डालने का काम कर रहा है।

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