18
अप्रैल 2012
संपादकीय
एक सेक्स सीडी को लेकर दिल्ली उबल रही है। एक नामी-गिरामी कुनबे के दूसरी पीढ़ी के देश के सबसे महंगे वकीलों में से एक, कांग्रेस सांसद और प्रवक्ता, अभिषेक मनु सिंघवी को किसी महिला वकील के साथ दिखाने वाली सीडी की सनसनी, कोल्ड ड्रिंक की ताजा खुली बोतल की तरह राजधानी में बिखरी हुई है। सिंघवी की अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगा दी है क्योंकि यह तर्क पेश किया गया था कि सिंघवी के भूतपूर्व ड्राइवर ने उन्हें धमकाने, ब्लैकमेल करने और बदनाम करने की नीयत से इस कथित खुफिया रिकॉर्डिंग में सिंघवी का कथित सेक्स दिखाने की बात कही है।
इस मामले पर सिंघवी के चालचलन और उनकी नैतिकता पर हमें कुछ नहीं लिखना है। इस चर्चित सीडी में उनके साथ दिखती महिला भी अधेड़ है और ये संबंध बिना जोर-जबरदस्ती, आपसी सहमति के लगते हैं। इनको लेकर सिर्फ इनके परिवारों को शिकायत हो सकती है, लेकिन इसमें पहली नजर में गैरकानूनी नहीं है। एक सांसद और पार्टी प्रवक्ता के लिए यह हरकत शर्मनाक है और पार्टी के लिए भी, लेकिन इससे परे की एक बात पर चर्चा अधिक जरूरी है।
ऐसा बताया जा रहा है कि इस रिकॉर्डिंग में जो महिला वकील पहचान में आ रही है, वह किसी अदालती दर्जे के पद पर अपनी नियुक्ति की बात कर रही है और उसे सिंघवी की तरफ से यह आश्वासन दिया जा रहा है कि उन्होंने इसकी सिफारिश कर दी है, और उसकी नियुक्ति हो जाएगी। यह बात गौरतलब है कि सिंघवी संसद की एक कमेटी के अध्यक्ष भी हैं जो कि न्यायिक जवाबदेही तय करने वाले विधेयक को तय कर रही है। ऐसे में कानून मंत्रालय से लेकर दूसरी अदालती संस्थाओं तक उनकी कुछ अधिक पहुंच भी होगी। ऐसे में सिंघवी का किसी को नियुक्ति का भरोसा दिलाकर उससे देहसुख का फायदा पाना अगर सच है, तो यहां पर उनकी संसदीय जिम्मेदारियों और उनके निजी चाल-चलन के बीच एक टकराव खड़ा हो जाता है। हम ऐसी ही संभावना या आशंका को ध्यान में रखकर इस मुद्दे पर आज यहां एक सैद्धांतिक चर्चा कर रहे हैं, जो कि हो सकता है कल सिंंघवी के मामले पर लागू न भी हो। लेकिन इससे इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि अपने किसी सरकारी, संवैधानिक, संसदीय या सार्वजनिक पद पर बैठे हुए लोगों का कैसा आचरण भारत जैसे लोकतंत्र में मंजूर या बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
लोगों को याद होगा कि वाइट हाउस में एक बहुत जूनियर प्रशिक्षणार्थी मोनिका लेविंस्की के साथ संबंधों को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को अमरीका के इतिहास के सबसे शर्मनाक सेक्स-हादसे का सामना करना पड़ा था और वहां की संसद में महाभियोग भी झेलना पड़ा था क्योंकि उन्होंने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया था। कांगे्रस पार्टी, भारत सरकार और संसद, इन सबको सिंघवी के नाम के साथ जुड़े हुए इस मामले की हकीकत सामने आ जाने के साथ-साथ यह देखना होगा कि कहां-कहां पर अपने पद की ताकत के बेजा इस्तेमाल का मामला बनता है। यह बहुत तकलीफदेह बात है कि भारतीय लोकतंत्र में कभी किसी विधानसभा के भीतर विधायक और मंत्री अश्लील फिल्में देखते पकड़ाते हैं तो कहीं और किसी दूसरे तरह का सेक्स कांड होता है। लोग हंसी-मजाक में यह बात कहते हैं कि अगर व्यस्त जीवन और काम के बोझ के चलते ताकतवर लोगों को देह-सुख की जरूरत होती है तो उन्हें मामूली से खर्च पर ऐसे देशों में चले जाना चाहिए जहां पर कानूनी रूप से यह बाजार में मौजूद है। जब संबंध बनाना किसी तरह की निजी बेबसी हो तो भी सार्वजनिक जीवन के लोगों को सावधान रहना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि सिंघवी के नाम से जुड़ा यह कांड बाकी लोगों को भी सावधान करेगा क्योंकि आजकल कुछ हजार रूपयों में ही ऐसे खुफिया कैमरे और माईक्रोफोन बाजार में गली-गली मिलते हैं जिनसे किसी के भी निजी जीवन को दुनिया के सामने रखा जा सकता है।
कांगे्रस पार्टी के लिए यह एक भारी तकलीफ और शर्मिंदगी का मौका है, हम इस मौके पर सिर्फ इतना चाहेंगे कि निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन में बंटे हुए इस मामले के पहलुओं को अलग-अलग करके तौल लेना चाहिए और जितना मामला निजी है उसे छूना नहीं चाहिए और जितना मामला पद के प्रभाव के बेजा इस्तेमाल का है, उसे छोडऩा नहीं चाहिए।

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