05 अपै्रल 2012
संपादकीय
आज देश में तकरीबन सभी जगह महावीर जयंती मनाई जा रही है। चूंकि जैन समाज के लोग व्यापार और उद्योग पर पकड़ रखते हैं, यह एक सफल समाज है, इसलिए यह सालाना जलसा काफी रंगारंग दिखता है। इसी तरह अलग-अलग संतों, महात्माओं, गुरूओं और ईश्वरों के लिए तय सालाना दिनों पर धूमधाम से समारोह होते हैं। इनकी रंगीनियों में और धूमधड़ाके में यह बात कहीं खो ही जाती है कि उनके नाम के साथ जो नसीहतें जुड़ी हैं, उनका क्या हाल है। भक्त और अनुयायी अपने गुरू या ईश्वर को तो मान रहे हैं, लेकिन उनकी कही बातों पर भी क्या वे चल रहे हैं? और अगर उनकी नसीहतों पर नहीं चल रहे, तो फिर उनकी पूजा और आराधना का क्या मतलब निकलता है?
यह बात सिर्फ जैन धर्म के लोगों के बारे में नहीं है। छत्तीसगढ़ में सतनामी सम्प्रदाय के गुरू घासीदास ने सच बोलने और शराब-मांस से दूर रहने की बहुत साधारण सी दिखने वाली नसीहतें दी थीं। लेकिन इस समाज के बड़े-बड़े नामीगिरामी लोगों को इन नसीहतों के ठीक खिलाफ काम करते देखा जाता है। गुरूनानक देव ने गुरूग्रंथ साहब में जिस उदारता से देश के बहुत से धर्मों और जातियों के संतों की बातों को शामिल किया था, वह उदारता देखते ही बनती है। सिख समाज के बनाने के पीछे एक सोच यह भी थी कि ये लोग समाज के बाकी तबके के लोगों की मदद करेंगे और उनकी हिफाजत करेंगे। आज भी पंजाब में बहुत से गैरसिख अपने एक बच्चे को सिख बनाने का काम करते हैं। किसी मनौती के तहत या किसी और वजह से ऐसा करने की परंपरा हमें किसी भी और धर्म में याद नहीं पड़ती। लेकिन जब पंजाब में आतंक का राज था, तो स्वर्ण मंदिर के भीतर से हथियारबंद आतंकी निकलकर छांट-छांटकर उन हिंदुओं को बस से निकालकर, कतार में खड़ा करके गोलियों से भून देते थे जिन हिंदुओं के संतों की बानी को गुरूनानक देव ने ग्रंथ साहब में सम्मान से शामिल किया था। हम अनगिनत मुस्लिम कवियों को देखते हैं, संतों और फकीरों को देखते हैं जिन्होंने कृष्ण के साथ अपनी मोहब्बत पर ढेरों लिखा है। जिस इस्लाम में मूर्ति पूजा या चित्र पूजा को गलत कहा गया है, जिस पर पूरी मनाही है, उसको उस इस्लाम के उपासक भी कृष्ण को लेकर, राम को लेकर कितना कुछ लिखते रहे। इसी इस्लाम को मानने वाले लोग सिख गुरूओं की सेवा में कैसे लगे रहे इसका लंबा इतिहास है। लेकिन आज गुरूनानक देव जैसी उदारता क्या सिख समाज में अधिक लोग दिखा पाते हैं?
जो हिंदू समाज राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहते हुए उसके नाम की माला जपता है, उसके बहुत से धार्मिक नेताओं और गुरूओं का हाल, इस समाज के स्वघोषित बहुत से हमलावर और साम्प्रदायिक चर्चित लोगों का हाल रावण से गया-गुजरा है। कृष्ण का नाम लेने वाले हिंदू समाज के धार्मिक ठेकेदार जिस तरह से पे्रम करने वालों पर जगह-जगह हमले करते हैं, उससे समझ आता है कि अपने ईश्वर की कही बातों, और अपने ईश्वर के जीवन की कहानियों पर उनका कितना भरोसा है, उनकी कितनी आस्था है। देश में अहिंसा को अपना एक धार्मिक और आध्यात्मिक सिद्धांत मानने वाले बहुत से ऐसे समुदाय हैं जो खुलकर कन्याभू्रण हत्या में लगे रहते हैं। किसी बकरे या मुर्गे को भी न मारने वाले, शाकाहारी और अहिंसक लोग जिस बेफिक्री से अजन्मी या जन्मी हुई बेटी को मार डालते हैं, वह देखते भी नहीं बनता है।
आज हम इस चर्चा को इसलिए कर रहे हैं कि बहुत से त्यौहारों को लेकर अब सिर्फ रीतिरिवाज और सामाजिक कार्यक्रम रह गए हैं, बढ़ते चल रहे हैं। समाज के कमजोर तबकों के लिए ताकतवर तबकों के बीच से जब तक रहम निकलकर नहीं आएगी और हाथ नहीं बंटाएगी तब तक उस ताकतवर तबके के धर्म का सम्मान भी नहीं बढ़ सकता। धर्म तो सैकड़ों या हजारों बरस पहले तय हो चुका एक दस्तावेज सा है। हर धर्म के ईश्वर की धारणा भी हजारों बरस पहले की बनी हुई है। उसका कोई नया सम्मान आज दुनिया तब तक नहीं कर सकती जब तक कि उन धर्मों को मानने वाले लोग अपना काम अधिक सम्मान के लायक नहीं करते। ईश्वर का सम्मान लंबे समय से तय है। ईश्वर अब आकर अपना खुद का सम्मान नहीं बढ़ा सकते। अब तो उनको मानने वाले लोग ही अपनी करनी से अपने ईश्वर या अपने गुरू की कथनी को सच या झूठ साबित कर सकते हैं। महावीर स्वामी ने जमाने पहले जो बातें सामने रखीं, आज अगर उनके उपासक उन बातों पर अमल करते हैं, तो महावीर स्वामी की दी हुई सीख असरदार दिखती है। ऐसा न होने पर ऐसा लगेगा कि उनकी कही बातों को उनके ही अनुयायी नहीं मानते। यह बात सभी धर्मों पर लागू होती है और जलसों की रंगीनियों से परे इस बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए।

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