जिस दिन अरुंधतियों के बच्चों पर गोलियां चलेंगी, उस दिन मुंह खुलेगा?


14 अप्रैल 2012
संपादकीय
बस्तर में बुखार और मलेरिया के शिकार छोटे स्कूली बच्चों को उनके रिहायशी आश्रम से अस्पताल ले जा रही एम्बुलेंस पर नक्सलियों ने गोलीबारी की, और ऐसा बताया गया है कि बाद में यह चेतावनी देकर छोड़ा कि रात के वक्त एम्बुलेंस का इस्तेमाल न करें। देश भर में चल रही बहुत किस्म की खबरों के बीच इस घटना पर  किसी ने कुछ कहा नहीं या लिखा नहीं और बात आई-गई सी हो गई। लेकिन पूरे देश में जो आदिवासी इलाके सबसे बुरी तरह पिछड़े हुए हैं, जहां शहरी विकास के बिजली के तार भी कहीं पहुंचे हैं और कहीं नहीं पहुंचे हैं, जहां इलाज के बजाय मौत अधिक पहुंचती है, जहां सरकार की बंदूकों के मुकाबले नक्सलियों के गोला-बारूद अधिक काम करते हैं, वहां पर अब अगर बीमार आदिवासी को अस्पताल ले जाने के लिए जानी-पहचानी शक्ल वाली एम्बुलेंस पर भी नक्सली गोली चलाएंगे तो वे आखिर किस आदिवासी की भलाई का दावा करते हैं? 
पिछले बरसों के आंकड़ों को अगर देखें तो नक्सलियों के हाथों और नक्सल मोर्चो पर सबसे अधिक मौतें सिर्फ आदिवासियों की हुई हैं। पुलिस का मुखबिर होने का शक करते हुए नक्सली पूरे गांव की बैठक बुलाकर उसे जनसुनवाई का नाम देते हुए वहां पर परिवार और गांव के सामने बेकसूर निहत्थे का गला काटकर फेंक देते हैं, और इसे आदिवासियों के हितों के जनसंघर्ष का एक हिस्सा बताते हैं। अभी जो भयानक मामले सामने आ रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ में ही यह पता लग रहा है कि नक्सली घरों से लड़कियों को उठाकर ले जाते हैं, नक्सली बनाने के नाम पर उनको साथ रखते हैं, उनका देह शोषण करते हैं, उनके गर्भवती हो जाने पर उनका गर्भपात करवा देते हैं, या नक्सल-मर्दों की नसबंदी करवा देते हैं। ऐसे अनगिनत मामले वक्त-वक्त पर सामने आते और इन पर पीयूसीएल और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी और भयानक है। पुलिस पर लगे प्रताडऩा के एक दावे पर भी जो संगठन, जो चर्चित चेहरे, जो बड़े-बड़े भोंपू और पुरस्कृत लेखक सुप्रीम कोर्ट की इमारत को हिलाकर रख देते हैं, उनके माथे पर ऐसे नक्सल-जुल्मों से एक लकीर भी नहीं हिलती। इस देश की अरुंधतियों और नंदिनी सुंदरियों सहित बड़े-बड़े नामीगिरामी लोग ऐसे बलात्कारों और संगठित यौन-शोषण पर आराम से चुप बैठे हैं, और देश-विदेश में मीडिया से लेकर विश्वविद्यालयों तक जा-जाकर इस देश और यहां के प्रदेशों की सरकारों को कोस रहे हैं। इतिहास इस चुप्पी, इस साजिश और इस हिंसा को भी दर्ज कर रहा है। बड़े-बड़े शहरों में रहने वाले ऐसे मानवाधिकार आंदोलनकारियों और नक्सलियों के हिमायतियों के अपने बच्चे चूंकि शहरों में हिफाजत से हैं, उनकी स्कूल-बसों और जरूरत पडऩे पर उनकी एम्बुलेंसों पर कोई गोलीबारी नहीं होती इसलिए ऐसे बड़बोले हिमायती मंच और माईक पर नक्सली हिंसा की चर्चा भी किए बिना महज सरकार को कोसने का ओवरटाईम करते हैं। यहां पर हम यह याद दिलाना जरूरी समझते हैं कि भारत के नक्सल मोर्चे पर एक तरफ नक्सलियों के हिंसा के खुद के दावे हैं और दूसरी तरफ सरकार पर मानवाधिकार हनन के उनके लगाए हुए आरोप हैं। खुद का हिंसा का क्लेम और सरकार पर हिंसा का ब्लेम, यह सिलसिला दशकों से इस देश में चल रहा है और यहां का मानवाधिकार आंदोलन क्लेम को अनदेखा करके ब्लेम के बैनर बनवाकर अपनी दूकान चला रहा है।
छत्तीसगढ़ में हुए इस ताजा हमले से आदिवासियों की जिंदगी से छिन गए न्यूनतम अधिकारों की एक नई भयानक नौबत सामने आती है। दुनिया भर में घूम-घूमकर जो बिनायक सेन और जो अरुंधति राय भारत के देश-प्रदेशों की सरकारों को गालियां देते हैं, उनके मुंह भी ऐसी नक्सल हिंसा के वक्त नहीं खुलते। दुनिया के जो देश ऐसे लोगों को तरह-तरह के सम्मान और पुरस्कार देते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय संगठन ऐसे नक्सल हिमायतियों को मसीहा साबित करने पर जुटे हुए हैं, उनके अपने बच्चों की स्कूल बसों और अस्पताल ले जाती एम्बुलेेंसों पर जिस दिन गोलियां चलेंगी, उस दिन उन्हें समझ आएगा कि वैसे सम्मान जारी रखे जाएं, या बंद किए जाएं। हम छत्तीसगढ़ के भीतर भी शहरी लोगों के बीच आदिवासी इलाकों में चल रही ऐसी हिंसा के लिए जिस तरह की बेपरवाही देख रहे हैं वह बहुत भयानक है। आज चूंकि गोलियां जंगलों के आदिवासियों पर चल रही हैं इसलिए वहां से दूर बैठे शहरी छत्तिसगढिय़ों में कोई फिक्र पैदा न हो यह इंसानियत की तथाकथित प्रचलित परिभाषा के मुताबिक ठीक बात नहीं है। वैसे इस प्रचलित परिभाषा से परे इंसानियत असल में ऐसी ही है। 
नक्सलियों और उनके समर्थकों को शहरों के भीतर भी लोगों को सवालों के घेरे में लेना होगा, इसके बिना किसी दिन जब कोई शहरी आतंकी संगठन खड़ा होगा, तो उस दिन शहरियों को बचाने के लिए लोकतंत्र बचा भी नहीं रहेगा।

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