इंसानों में हीनभावना बेचने वाला सितारों पर टिका आक्रामक बाजार


25 अप्रैल 2012
संपादकीय
महिलाओं के कुछ भीतरी अंगों के लिए बनाई गई एक क्रीम की बहुत आक्रामक और अश्लील किस्म की मार्केटिंग और इश्तहारबाजी कल संसद में भी गूंजी। कुछ दिन पहले हमने इस बारे में खबर छापी भी थी और इस हमले के कुछ दूसरे पहलुओं को लेकर हम इस अखबार से शुरू करके इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों तक लगातार लिखते हैं। लेकिन बाजार की ताकत किसी भी सरोकार की ताकत से बहुत होती है और खासकर ऐसे मौकों पर जब सरोकारवादियों की अपनी विश्वसनीयता गड्ढे में रहती है तो फिर उनकी कही बात से जनमत पर क्या फर्क पड़ सकता है? 
पश्चिम के बाजार में पूरी दुनिया पर बार्बी नाम की एक गुडिय़ा को थोपकर बचपन से ही लड़कियों के मन में उनके बदन का एक असंभव सा आकार बिठा दिया है और ये लड़कियां बड़ी होने के बाद मरने तक उस असंभव को पाने के लिए संघर्ष करती रहती हैं। इस फेर में फैशन, खानपान, शरीर की कॉस्मेटिक सर्जरी, और तरह-तरह की दवाईयों, रसायनों और कॉस्मेटिक का इतना बड़ा बाजार खड़ा कर लिया गया है कि उसके इस्तेमाल के बिना दुनिया की अनगिनत महिलाओं को हीनभावना से उबरना मुमकिन ही नहीं लगता। भारत में जिस तरह से रंग को गोरा बनाने की क्रीम की मार्केटिंग हो रही है, उसके चलते अब शाहरूख खान जैसे फिल्म कलाकार पहलवानों तक को गोरा बनाने का बाजार खड़ा कर रहे हैं। अखबारों और पत्रिकाओं को देखें तो महिलाओं के शरीर के आकार को बदलने के लिए वे जालसाज और धोखेबाज कंपनियों के तेल और दवाओं के इश्तहार अपनी अक्ल को अलग रखकर छापते हैं, जिनके बारे में बच्चा भी यह समझ सकता है कि अखबार अपनी समझ और जिम्मेदारी को पन्ने पर की उतनी जगह के साथ-साथ बेचता है।
खासकर महिलाओं में हीन भावना खड़ी करके, उनका आत्मविश्वास तोड़कर अपने सामान बेचे जाते हैं और उनके खिलाफ जागरूकता का कोई अभियान भी नहीं चल पाता क्योंकि समाज में जिन सितारों की बात का असर हो सकता है वे भाड़े के भाटों की तरह सामान बेचने में लगे हैं। अभी पिछले कुछ दिनों से तो एक ऐसा क्रिकेट सितारा भी कोई फेयरनेस क्रीम बेचते दिख रहा है जिसके चेहरे पर धूप की कोई फिक्र दिखनी नहीं चाहिए थी। लेकिन जब कोई कामयाब हो गया है तो बाजार उसे भी हफ्ते भर में गोरा बनाकर दिखाने का झांसा देता है, और हमारा ख्याल है कि इसके खिलाफ धोखाधड़ी का एक ऐसा मामला भी बन सकता है कि ऐसे फिल्मी सितारे या ऐसे क्रिकेट सितारे कब हफ्ते भर में ऐसे गोरे हुए, कंपनी और वे इसे साबित करें।
महिलाओं के गुप्तांगों को अधिक आकर्षक रंग का बनाने वाली क्रीम का यह विज्ञापन भयानक है। हम भारत की संकीर्णता वाली परंपरागत सोच पर गए बिना भी अपनी खुद की बहुत उदार सोच, आधुनिक सोच के साथ में इस बात को भयानक पाते हैं कि बाजार इस तरह हमले कर सकता है, कर रहा है। यह ठीक है कि बाजार को बेचने की और ग्राहकों को उसे खरीदने की एक छूट लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत हमेशा बनी रहेगी, लेकिन इस अधिकार से परे हम इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समाज के लिए बहुत खतरनाक मानते हैं जो लोगों को अपने ही शरीर के बारे में नीची नजरों से देखने को मजबूर करता है। भारत में जिस तरह से कॉस्मेटिक सर्जरी को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह भी चिकित्सा विज्ञान की सुविधा न होकर बाजार की बहुत ही गैरजरूरी और हिंसक मार्केटिंग है। शरीर को लेकर एक खास रंग-रूप और आकार की तरफ बढ़ाते जाने का कोई अंत नहीं है। दुनिया ने माइकल जैक्सन को देखा है जो कि एक अश्वेत अफ्रीकन परिवार में अमरीका में पैदा हुआ और जो अपने बचपन की तस्वीरों में बहुत ही सुंदर और आकर्षक दिखता था। बाद में अपने ही चेहरे और शरीर से वह इस हद तक नाखुश रहा कि पूरी जिंदगी वह रंग बदलवाने, नाक का आकार बदलवाने में ऐसा लगे रहा कि आखिरी वक्त तक वह जीता-जागता भूतपे्रत सा लगने लगा था। उसी के दूसरे भाई-बहन जो कि प्राकृतिक रूप-रंग के साथ रहे, वे अभी तक बेहतर लगते हैं, हालांकि कि उनसे अमरीका के प्लास्टिक सर्जनों को करोड़ों नहीं मिल पाए।
भारत की संसद में यह फिक्र इसलिए मायने रखती है कि भारत का कानून किसी ऐसे सामान की मार्केटिंग को रोक नहीं सकता। लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग की अधिकांश आबादी वाले ऐसे देश में जनता के इतने बड़े तबके को एक हीनभावना में डालने की बाजारू साजिश पर काबू पाने का कोई तरीका निकालना चाहिए, चाहे वह तरीका कानूनी न होकर सामाजिक जागरूकता का ही क्यों न हो। जिस तरह दुनिया में हथियार के सौदागर देशों के बीच नफरत पैदा करके जंग के सामान बेचते हैं, जिस तरह आतंकियों के हमले बढ़ावाकर उससे पनपी दहशत के साए में सुरक्षा और निगरानी उपकरणों के व्यापारी अपनी दूकान सजाते हैं, उसी तरह फिल्मी सितारों को, क्रिकेट सितारों को भाड़े पर लेकर बाजार हीनभावना फैलाता है, और उससे उबरने के बाजारू झांसे बेचता है। 
हमारे हिसाब से इससे निपटने का एक जरिया यह हो सकता है कि ऐसे रंगभेदी सामान बेचने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार करने के बैनर देश के बाकी जिम्मेदार और समझदार लोग उठाएं।

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