28 अप्रैल 2012
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए बंगारू लक्ष्मण ने जिस तरह रिश्वत ली थी, उसके बारह बरस बाद अब सीबीआई कोर्ट ने उन्हें कुसूरवार ठहराते हुए 4 साल की कैद की सजा सुनाई। भाजपा के लिए यही एक बात राहत की थी, और है कि उसने इस स्टिंग ऑपरेशन के मीडिया में आने के तुरंत बाद अपने इस अध्यक्ष को पद से हटा दिया था। और उसके पास गिनाने को यह मिसाल हो सकती है कि कांगे्रस के लोग सारे स्टिंग ऑपरेशनों के बाद भी अदालती फैसलों तक पद पर जमे रहने पर अड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि बारह बरस पहले जब तहलका ने बंगारू लक्ष्मण सहित अटल सरकार के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज और उनकी घरेलू संगिनी, महिला मित्र जया जेटली के रक्षा मंत्री के सरकारी बंगले पर ही दलालों से सौदेबाजी के मामलों में हुए स्टिंग ऑपरेशन के बाद जॉर्ज का सरकार से और जया का पार्टी पद से इस्तीफा हुआ था।
पिछले एक दशक में भारत में बहुत से नेताओं को स्टिंग ऑपरेशनों के रास्ते सत्ता से बाहर जाते देखा है और अब तक यह बहस जारी ही है कि पत्रकारिता में स्टिंग ऑपरेशन कितने नैतिक हैं, और कितने अनैतिक। इनका कितना इस्तेमाल किया जाना चाहिए और कितना नहीं। आज इस मुद्दे पर लिखने की एक और वजह है कि पिछले कुछ हफ्तों से थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह के दफ्तर में उनसे बात करने वाले फौज के एक और रिटायर्ड आला अफसर पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने थलसेनाध्यक्ष को उनके दफ्तर में ही रिश्वत का प्रस्ताव रखा था। और अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि उस बातचीत की रिकॉर्डिंग सीबीआई को दी जा रही है। आरोपों के घेरे में जो रिटायर्ड अफसर है उसने यह सवाल उठाया है कि कोई सरकारी अफसर अपने दफ्तर में हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग कैसे कर सकता है?
ये दो मामले एक-दूसरे से कुछ अलग भी हैं, और इनका एक पहलू इनको एक जैसा भी बनाता है। अंगे्रजों के समय से चले आ रहे टेलीफोन के उस कानून का अब कोई मतलब नहीं रह गया है जिसके तहत फोन पर बातचीत को बिना बताए रिकॉर्ड करना लोगों के लिए जुर्म है, और सरकारी की कुछ एजेंसियों को इसके लिए अलग से इजाजत मिलने का इंतजाम है। टेक्नालॉजी ने अब जिन कानून को बेमायने बना दिया है उनमें टेलीफोन की रिकॉर्डिंग का कानून भी है, तब जबकि लोग अपने खुद के फोन पर की जा रही बातचीत को रिकॉर्ड करते हैं। अब यह मानकर चलना चाहिए कि अपने फोन से अपनी की हुई या पाई हुई किसी कॉल को रिकॉर्ड करना हर किसी का हक है और ऐसे फोन कॉल पर दूसरे सिरे पर जो हैं, उनको अपनी फिक्र खुद करनी चाहिए। दूसरी बात यह कि अपने दफ्तर में कोई किसी से कोई बात करते हुए उसकी रिकॉर्डिंग करते हैं, तो यह शायद शिष्टाचार के तौर-तरीकों के खिलाफ हो, इसमें हम न कुछ गैरकानूनी देखते और न ही अनैतिक। ऐसा करने से गलत कामों के बारे में बहुत किस्म की बातें होना ही खत्म हो जाएंगी। एक वक्त शायद ऐसा भी आ सकता है जब केरल के मुख्यमंत्री की तरह बहुत से नेता और अफसर अपने दफ्तर को लगातार इंटरनेट पर दिखाते रहेंगे, और उसमें भी हमें कुछ अटपटा नहीं लगेगा। लेकिन ये सारी बातें सरकारी और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के अपने खुद के बारे में हैं कि वे क्या-क्या कर सकते हैं जिससे कि सार्वजनिक जीवन में एक पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे।
लेकिन दूसरा सवाल यह है कि पत्रकारिता के काम में स्टिंग ऑपरेशनों की कैसी और कितनी मान्यता होनी चाहिए। यह मुद्दा अभी वक्त और टेक्नालॉजी पर तैर रहा है, लेकिन आज तक की अपनी समझ और सोच के आधार पर हम यह कहना चाहेंगे कि स्टिंग ऑपरेशन अगर किसी कानून को तोडऩे के लिए किए जा रहे किसी काम का भांडाफोड़ करते हैं, तो उसे सही मानना चाहिए, चाहे वे कुछ गलत तरीकों को इस्तेमाल करके ही क्यों न किए गए हों। दूसरी तरफ बहुत से स्टिंग ऑपरेशन ऐसे भी होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी के ऐसे मौकों को कैद कर लिया जाता है जो कि उनके लिए शर्मिंदगी पैदा करते हैं। ऐसे मामलों में हमारा सोचना है कि अगर ऐसे निजी पल किसी कानून को तोडऩे, सत्ता की ताकत का बेजा इस्तेमाल करने जैसी बातों वाले भी हैं, तो उस रिकॉर्डिंग के सार्वजनिक इस्तेमाल का एक तर्क बनता है। अभिषेक मनु सिंघवी के ताजा मामले में हमने यही लिखा कि अगर उनकी इस रिकॉर्डिंग में कोई ऐसी बात भी है कि वे देहसुख के एवज में किसी से ऐसा फायदा दिलवाने का वायदा कर रहे हैं जो कि उनके सरकारी या संसदीय ओहदे के इस्तेमाल से मुमकिन है, तो वे ऐसे निजी पलों के स्टिंग ऑपरेशन के लिए भी देश और कानून के प्रति जवाबदेह हैं। लेकिन अगर किसी की निजी जिंदगी का किसी कानून को तोडऩे या पद के बेजा इस्तेमाल से कुछ लेना-देना नहीं है तो उसे हम स्टिंग ऑपरेशन के लायक नहीं मानते, और अगर ऐसा स्टिंग ऑपरेशन हुआ भी है तो भी हम उसे मीडिया के इस्तेमाल का नहीं मानते।
कुछ बातें इन दोनों के बीच की हैं। जैसे नारायण दत्त तिवारी ने आंध्र का राज्यपाल रहते हुए वहां के बिस्तर का जिस तरह का असामाजिक और अनैतिक इस्तेमाल नियमित रूप से किया और जिस तरह से वे स्टिंग ऑपरेशन में कैद हुए, उसे हम सार्वजनिक महत्व का इसलिए मानते हैं कि वह एक मनोनीत पद के साथ जुड़ी हुई इस तरह की सहूलियत का राजभवन था जिसमें रहने वाले से कुछ सार्वजनिक मूल्यों को भी मानने की उम्मीद की जाती है। अपने निजी बंगले में रहने वाला कोई इंसान शराब पीकर वहां के आंगन में दौड़-भाग कर सकता है, लेकिन ऐसा हंगामा किसी बड़े पद पर बैठा हुआ व्यक्ति किसी सरकारी बंगले में करे तो उसे ठीक नहीं माना जाएगा। इसलिए कुछ बातें गैरकानूनी न होते हुए भी नाजायज होती हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका ख्याल रखना चाहिए। निजी और सार्वजनिक, सरकारी और गैरसरकारी, नैतिक और कानूनी, जैसे अलग-अलग पहलू स्टिंग ऑपरेशनों के साथ जुड़े हुए हैं और स्टिंग ऑपरेशनों से सामने आने वाले हर मामले को बारीकी से परखने की जरूरत है। दूसरी बात यह भी है कि स्टिंग ऑपरेशन करना एक बात है, और उसका सार्वजनिक इस्तेमाल करना एक दूसरी बात। किसी गैरकानूनी बात को कैद करने की उम्मीद में भी एक स्टिंग ऑपरेशन हो सकता है जो कि अंत में जाकर यह साबित करे कि इसमें किसी कानून को तोडऩा कैद नहीं हुआ है। वहां पर आकर मीडिया का यह तय करना शुरू होता है कि ऐसे स्टिंग ऑपरेशन का इस्तेमाल किया जाए या नहीं।
आखिर में हम यह भी कहना चाहेंगे कि कुछ स्टिंग ऑपरेशन ऐसे भी सामने आते हैं जिनमें किसी व्यक्ति को बहुत बुरी तरह लालच में घेरकर उससे गलत काम करवाने की बात मंजूर करवाई जाती है। हम बिना किसी आधार के एक साजिश के तहत लालच देकर किसी को कमजोर करने और फिर उसे कैद करके कुसूरवार ठहराने के भी खिलाफ हैं। स्टिंग ऑपरेशन किसी को भ्रष्ट करके फिर उसे भ्रष्ट साबित करने वाले नहीं होने चाहिए।

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