दवा की छोटी सी पर्ची, बड़ी सी दिक्कत


हमारे एक दोस्त को अभी एक दवाई खरीदने के लिए कुछ घंटे शहर के अलग-अलग इलाकों में  धक्के खाने के बाद भी दवा तो नहीं मिली, यह जानकारी मिली कि उस डॉक्टर के लिखे पर्चे की दवा खुद उसी के मेडिकल स्टोर में मिलेगी और उस नाम की दवा को कोई और दूकान नहीं रखती। शुरू के दो-चार मेडिकल स्टोर से दवा नहीं  निराशा मिलने के बाद लोगों के चेहरों से यह समझ में आने लगा था कि उस डॉक्टर का पर्चा देखते ही दूकानदार जान जाता था कि उस पर मेहनत करना बेकार है। 
बहुत से डॉक्टरों के पर्चे पर उनका नंबर देखकर दूकानदार अगर उन्हें फोन लगाने का हौसला करते भी हैं, तो भी व्यस्त डॉक्टर ऐसे किसी फोन को उठाते नहीं। 
जिस दवा की तलाश की बात हो रही थी उसके बारे में, चूंकि जमाना इंटरनेट का है इसलिए उस दवा के विकल्प ढूंढने के लिए जब दवा कंपनियों की वेबसाइट टटोली गईं तो पर्चे की एक-दो दवाओं के दूसरे ऐसे विकल्प तो मिले जो कि बेहतर कंपनियों के थे, एक-दो दवाओं के नाम पढ़ते ही नहीं बने, जाहिर था कि डॉक्टर की खुद की दवा दूकान ही उसे पढ़ पाती होगी। 
यह तो डॉक्टर और दवा का एक अलग गठजोड़ है। लेकिन इससे परे की एक बात यह है कि डॉक्टरों की लिखावट को पढऩा बहुत मुश्किल होता है, कई दूकानदार उसे नहीं पढ़ पाते और मरीज या घर के लोग तो और भी नहीं पढ़ पाते। ऐसे में दवा की खुराक और उसे कब लेना है यह जानना भी मुश्किल होता है। 
इसलिए अधिक जरूरी बात यह है कि जब भी कोई डॉक्टर आपको जांच या दवा का पर्चा लिखकर दे, उसी से अनुरोध करके दवाओं के तमाम नाम अंग्रेजी के कैपिटल अक्षरों में भी लिखवा लें। दवा कितने बार लेनी है इसे कुछ डॉक्टर अंग्रेजी के अंदाज में अक्षरों में लिखते हैं, उसकी जगह भी उन्हें निशान बनाकर लिखने को कहें ताकि कम पढ़े लोग भी समझ सकें। 
लगे हाथों एक बात यह भी कि दवा की स्ट्रिप पर पीछे जो एक्सपायरी डेट रहती है, उस हिस्से की दवा सबसे आखिर में निकालें, ताकि आखिर में बची गोलियों तक वह तारीख आपके पास सुरक्षित रहे। इसके अलावा दवा का जो ब्रांड नेम डॉक्टर ने आपको लिखा है, उसके साथ-साथ दवा का जेनरिक नाम भी आप लिखकर रख लें जिससे कि उस ब्रांड की दवा न मिलने पर या डॉक्टर की लिखावट समझ में न आने पर आप उस जेनरिक नाम वाली दूसरी दवा ढूंढ सकें। यह बात कुछ कम जरूरी या फालतू की लग सकती है, लेकिन जब घर में दवा एक्सपायरी डेट के बिना फेंकने की नौबत आती है तो आपका नुकसान होता है और आड़े वक्त जब आपको बाजार में घंटों दवा ढूंढनी पड़ती है तब मरीज के नाजुक वक्त का नुकसान होता है और आपके पेट्रोल का भी। 
जो लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं उनको बाजार में मिलने वाली दवाओं की लिस्ट की कुछ बहुत सस्ती किताबों में से एक-दो किताबें रखनी चाहिए ताकि घर पर वे ब्रांड नेम और जेनरिक नेम देख सकें, और यह भी देख सकें कि किस-किस कंपनी की एक ही दवा कितने अलग-अलग दाम की है। कुछ दवाएं एक अच्छी कंपनी 6 रूपए की बेचती है तो दूसरी कंपनियां उसे 26 और 36 रूपए में भी बेचती हैं।   आप अपने डॉक्टर से इन दोनों का फर्क बताकर पूछ भी सकते हैं कि क्या महंगी दवा लेना जरूरी है? 

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